रतलाम चुनाव में सट्टा बाजार कांग्रेस को 30 पैसे का भाव दे रहा था तो बीजेपी को एक रूपया 20 पैसे। परिणाम आया तो सट्टा बाजार राजनीतिक पंडितों पर भारी पड़ा। यह पहली बार नहीं है कि सटोरियों का अनुमान सही बैठा हो। यह तो बार-बार की बात है।
सूचना क्रांति के इस युग में जब हर हाथ में स्मार्ट फोन और फोन में इंटरनेट पहुंच चुका है। जब चुनाव मैदान के साथ साथ वॉर रूम में लड़े जाते हैं और हर तबके, हर कुनबे के वोट का हिसाब रखा जाता है...तब कैसे चुनावी आंकलन की कोई वैज्ञानिक पद्धति नहीं जानने के बावजूद सटोरिये सही बैठते हैं। उन्होंने न तो चुनाव प्रबंधन सीखा है और न ही एक्जिट पोल या प्री पोल का कोई सिस्टम उनके पास है। फिर कैसे कोई सातवीं पास या मामूली ग्रेजुएट किसी पार्टी का भाव तय कर लेता है। भाव का अनुमान भी ऐसा कि बिल्कुल सटीक बैठे। यह कोई क्रिकेट का खेल नहीं है कि किसी सितारा खिलाड़ी के पांचवी गेंद पर आउट होने का भाव लगाने के लिए उसे पहले से खरीद लिया जाए। या फिर कैच छोड़ने का एडवांस में सेटलमेंट कर लिया गया हो। न जी न ये इलेक्शन का खेल सटोरिये तो कभी नहीं खरीद सकते....हाल-फिलहाल तो इसकी उम्मीद नहीं है, पर दांव यहां भी सटोरियों का ही भारी पड़ता है। आखिर क्यों?
मध्यप्रदेश में 12 साल पहले लगातार दो बार मुख्यमंत्री रहने वाले दिग्विजय सिंह उन दिनों गर्वोक्ति भरते थे कि चुनाव प्रबंधन से जीते जाते हैं। एक बार उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया होगा, लेकिन इस बात पर उनकी आलाेचना करने वाली बीजेपी ने इलेक्शन मैनेजमेंट का अपना ऐसा तंत्र खड़ा किया कि वह लगातार तीसरी बार मध्यप्रदेश में सरकार ही नहीं चला रही। इलेक्शन स्पेशलिस्ट बन गई है। उपचुनाव जीतना हो या नगर निगम चुनाव बीजेपी का प्रबंधन हर बार सफल होता दिखता रहा है। रतलाम-झाबुआ के उपचुनाव में बीजेपी का प्रबंधन फेल हो गया। प्रबंधन फेल और पास होता रहे अपनी बला से। हमें तो चौंकाया है सट्टा बाजार ने। आखिर उसके पास ऐसा कौन सा मैकेनिज्म है जो सही अनुमान लगा लेता है! क्या तरीका है! क्या सट्टा खेलने वाले और खिलाने वाले भी पोलिंग बूथ पर या बस्तियों में जाकर मतदाताओं का मानस टटोलते हैं! नहीं ना...! फिर वो कैसे सटीक परिणान आंक लेते हैं और चुनावी पंडित लाखों करोड़ों रूपए लेने के बाद भी रिजल्ट आने तक संशय में रहते हैं। नाकाम भी होते हैं। आखिर कौन सी तकनीक है सट्टेवालों की? बीकानेर में बादल बरसे तो नाली बहेगी या नहीं....? इसी पर करोड़ों रुपए का सट्टा लग जाता है। क्रिकेट का सट्टा तो वर्ल्ड फेमस है। भारत में हर किसी "हट के" चीज पर शर्त या सट्टा खेला जा सकता है। ये जितना सच है उतना ही सच यह भी है कि सट्टेबाज - खाईवाल कभी घाटे का दांव नहीं लगाते। चुनावी परिणाम के मामले में उनका आकलन बाजार करने आने वाले लोग होते हैं। चाय पान की गुमटी पर खड़े लोग उन्हें चुनावी नब्ज बताते हैं। और परिणाम 100% सही आता है।
इसके उलट राजनीतिक दल जिन एजेंसियों की मदद लेती हैं वो वैज्ञानिक ढंग से सर्वेक्षण करती हैं। लोगों से प्रश्नावली भरवाती हैं। गणित के फार्मूले लगा कर अपना आकलन बिठाती हैं। और कभी पास तो कभी चारों खाने चित्त होती रहती हैं। तो क्यों नही राजनीतिक दल भी चुनावी विश्लेषकों और सर्वे करने वालों की जगह सटोरियों की मदद लेते। क्यों बेकार में मोटी रकम बर्बाद करते हैं। सीधे सीधे सट्टा बाजार के भाव देख लें अनावश्यक खर्चा बच जाएगा। या फिर सट्टा बाजार में ही कोई अनुसंधान कर लें। उसकी मदद से चुनावी ऊंट अपनी करवट बिठाने का प्रबंध कर ले। रतलाम का परिणाम तो यही इशारा कर रहा है। क्या विकल्प अपनाना है ये चुनाव लड़ने और लड़ाने वालों को सोचना है! लेकिन एक बात तो तय है कि आम आदमी की नब्ज नेता, सर्वेक्षण वालों से बेहतर वो समझते हैं जो किसी पर 30 पैसे का भाव लगाते है तो किसी दूसरे का 1 रुपया 20 पैसा।

2 comments:
चुनावी सट्टे का तो नहीं पता परन्तु वैसे तो सट्टा शुद्ध गणित हैं. कई साल पहले कुछ साप्ताहिक समाचार पत्र पड़े थे जो ब्लैक में बिकते थे. बड़ा मजेदार खेल हैं और राजनैतिक पार्टी यदि निष्पक्ष एजेंसी को नहीं चुन सकती तो ये अच्छा तरीका हो सकता हैं.
यही गणित। प्रबंधन के माहिर विशेषज्ञों पर भारी पड़ता अकुशल लोगों का कुशल गणित ही तो सवाल खड़े करता है।
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