हर कम्प्यूटर का अपना अलग कन्फिगरेशन होता है
और समय के साथ उसका साफ्टवेयर अपडेट होता है, तो कभी हैंग भी। कम्प्यूटर पर ज्यादा सर्फिंग की और सही
एंटीवायरस नहीं रखा तो वायरस की मार से उसका इन्फेक्टेड होना भी स्वाभाविक है। अपनी
तेज रफ्तार जीवन शैली और कम्प्यूटर का कथित एडिक्शन होने के कारण दिगंबर अखाड़ा के
संत नामदेव त्यागी का नाम ही कम्प्यूटर बाबा हो गया। वे भी खुद को इसी नाम से
पुकारा जाना पसंद करते हैं क्योंकि यह उन्हें अलग पहचान देता है।
कम्प्यूटर बाबा की महत्वाकांक्षा का संपूर्ण
परिचय इतने शब्दों में ही समाहित हो सकता है। लेकिन नहीं, कम्प्यूटर चलाते-चलाते
बाबा समय के साथ इतने लय-ताल में हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
की नर्मदा सेवा यात्रा की कमजोर नस ऐसी पकड़ी कि उन्हें ही चकरघिन्नी बना रखा है। कभी
कम्प्यूटर बाबा को साधने के लिए बड़े और नामी संत-महात्माओं की मदद लेने की चर्चा
होती है तो कभी बाबाओं का जमावड़ा लगा कर प्रशस्तिगान कराना पड़ रहा है। लेकिन ‘त्यागी’ बाबा हैं कि
कम्प्यूटर के शुद्ध हिंदी नाम संगणक जैसे ही अबूझ बने हुए हैं। वे अहसास करा रहे
हैं कि क्षणिक लाभ के लिए बैरागी बाबाओं से नजदीकी और सत्ता की राह दिखाने के
कितने फायदे हैं और कितना ज्यादा नुकसान है।
सिंहस्थ
के दौरान अपनी नाराजगी और मान-मनौव्वल से चर्चित हुए कम्प्यूटर बाबा की सियासत कथा
महज छह माह पुरानी है। पहले सधे हुए अंदाज में बाबा ने नर्मदा सेवा की असलियत
खोलने का दम भरा तो उनके साथ चार और संतों को तत्काल नर्मदा की सेवा के लिए बनी एक
समिति का सदस्य बना कर शिवराज ने राज्यमंत्री दर्जा और इस दर्जे की तमाम सुख
सुविधाएं तोहफे में दे दीं। सत्ता का साथ मिला तो महत्वाकांक्षाओं ने ऐसी उड़ान भरी
कि बाबा को चुनावी अखाड़ा दिखने लगा। उनका कम्प्यूटर राजनीति का दुर्गम प्रमेय नहीं
तोड़ पाया तो बाबा को मंत्री दर्जे और सरकार प्रेम से ही विरक्ति हो गई। उन्होंने
फिर दम भर दिया नर्मदा की असलियत उजागर करने का। इंदौर में बाबा का सरकार विरोधी
धार्मिक मंच सजने से पहले ही उनके साफ्टवेयर को डिकोड करने और वायरस का तोड़
निकालने के जतन होने लगे थे। इसी कड़ी में गत दिवस भोपाल में हुई संत सभा में साधु
संतों ने शिवराज का ऐसा यशोगान किया कि राजवंशी परंपरा लोगों को याद आ गई। शिवराज
के 13 साल के कार्यकाल में धर्म और समाज के लिए हुए कार्यों को गिनाने के लिए बनाए
गए कीर्तिपत्र के लिए संतों को आठ पेज भी कम लगने लगे थे। संत परंपरा के इन सियासती
साधकों में उस मुख्यमंत्री के साथ सेल्फी खिंचाने की होड़ लगी रही, जो उनकी
चरणवंदना करता है।
सवाल यह है कि क्या एक कम्प्यूटर बाबा इतने
सक्षम हैं कि सरकार उनसे धर्मभीरू होने की पराकाष्ठा से भी आगे बढ़ कर भयग्रस्त है।
जब बाबा ने विरोध का बिगुल फूंका तो शांत करने मंत्री दर्जा और शॉल श्रीफल थमा दिया
और आंख मींच लीं। बाबा फिर रुष्ट हुए और अबकी नहीं मानेंगे, लगा तो उनके मुकाबले
संतों की संगोष्ठी उतार दी। सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रमों में मुख्य मंच के
आसपास बने चबूतरेनुमा मंच पर पूरे समय शोभा के फूल बनने वाले ये संत महात्मा क्या
समाज सुधारक संतों का प्रतिनिधित्व करते हैं? ‘सबका
साथ सबका विकास’
का नारा बुलंद करने वाली पार्टी के नेता क्यों इनको साधना से भटका कर सियासती मोहरे
बनाते हैं ? ‘काम बोलता है’ तो फिर इन
लटकों झटकों की जरूरत क्यों पड़ती है। क्यों कोई बाबा कभी सरकार विरोधी और कभी
अचानक सरकार भक्त हो जाता है !
और क्यों समय के साथ उसे नेताओं की भक्ति से विरक्ति हो जाती है। नेता और संतों का
यह मेल-बेमेल गठबंधन क्या उचित है, यह मतदाताओं को ही तय करना होगा। 
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