Sunday, May 17, 2020

अम्मा...


आज 25 साल हो गए। आज ही का दिन था, जब चटक गर्मी में डामर की पिघलती सड़क पर नंगे पैर अम्मा को लेकर हम सब अपने उस खेत की तरफ जा रहे थे, जहां अंतिम संस्कार होता है। 
अम्मा...हमारी यादों की अम्मा को बिछुड़े आज पूरे 25 साल हो गए। लॉकडाउन तो अभी कोरोना के कारण है। 1995 की उस 17 मई के आसपास हम सब... अम्मा के दुलारे अलग-अलग जगह लॉक ही थे। दीदी दिल्ली, मैं बिलासपुर, गुड्डू भोपाल, पिताजी और भैया के साथ अम्मा गांव में। अलगाव से जुड़ाव के रास्ते पर चलने वे निकली थीं। पिताजी का अपनी मिट्टी में लौटने का सुख, अपने बचपन और यौवन के साथियों के साथ गांव के विकास की ललक में अम्मा ने भी बच्चों की जगह अपने पति की सेवा को चुना था। उस दौर में वाशिंग मशीन से कपड़े धोने वाली अम्मा गांव जाकर हाथ से कपड़े फीचने लगीं। शहर में ट्यूबलाइट, सीलिंग फैन और कूलर का सुख भोगने वाली अम्मा गांव में लाइट की अनिश्चितता के बीच शाम होते ही लालटेन के कांच साफ करने लगीं। हाई शुगर पेशेंट होने के बाद भी अपना ध्यान रखने के बजाए गांव वालों और रिश्तेदारों के सुख में सुख देखने लगीं। इस सुख की आपाधापी में अम्मा की दवाई-गोलियां कहीं पीछे छूट गई। डायबिटीज का लेबल कितना बढ़ा, अनुभव करने के बाद भी वे बता न सकीं। बुंदेलखंड की पंगत में आलू, भात और लड्डू का आग्रह भी न ठुकरा पाई। 
शायद इस खुशी में कि दो-चार दिन बाद ही गांव से फिर शहर में बसना है। अपने परिवार के साथ उस घर में जिसकी गृहस्थी उन्होंने सजाई थी। लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था। अम्मा बस में बैठ झांसी के लिए निकलीं, जहां से बिलासपुर की ट्रेन पकड़नी थी। रास्ते में डायबिटीज कमाल दिखा गई। शायद घर जाने की खुशी में उन्होंने कुछ खाया न था। बेहोश हो गईं। आनन-फानन में डॉक्टर को दिखा झांसी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराई गईं। शाम को शुगर कंट्रोल हुई, होश आया तो भरोसा दिलाया आज की ट्रेन चूक गई। कल की पकड़ लेंगे। 
अगली सुबह जब भैया दवाई लेने गया। पिताजी डिस्चार्ज की पूछने। अम्मा के बिस्तर पर उनका भाई ही था...और वे चली गईं। ट्रेन पर दूसरे दिन भी उन्हें भरोसा न था। यह अम्मा की सरलता और सहजता ही थी कि उनकी अपनी संतानों के अलावा वे सब झांसी या गांव के आसपास मौजूद थे। जो उनके मायके के कुटुंबी थे या ससुराल के। बहू अर्चना भी पास ही अपने मायके ललितपुर में थी।
पास था तो सबसे छोटा बेटा भैया। गुड्डू ने शताब्दी पकड़ी। हमने रात की गाड़ी, क्योंकि बिलासपुर से और कोई साधन था ही नहीं। 
जेवरा गांव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी के भी घर रात और अगली सुबह चूल्हा नहीं जला। सब इकट्ठे हुए। शांत, शीतल, स्निग्घ आभा बिखेरती अम्मा को पल-दो पल ही देख पाए और चल दिए उन्हें विदा करने। 
अम्मा आज भी वैसी ही याद आती हैं। सभी को उनकी अपनी यादों की अम्मा। पिताजी की जीवन साथी, बच्चों की मां, भाई की भोली बहन, बाकी रिश्तेदारों की अपनी-अपनी यादों की अम्मा। हमारे बच्चों के लिए कौतुहल का विषय अम्मा। हमाई केसर, हमाई केसर कह कर उनके बचपन से लेकर अंत समय तक के किस्से सुनाने वाले भी अब अपने अपने समय पर चले गए। जब भी जाओ गांव की औरतें भी उन्हें याद करती हैं। रह गई हैं तो यादों की अम्मा। घर में, गांव में और मन में...अम्मा। 

(नोट-अम्मा की स्मृति में आज इतना ही... शेष जब लिखा जा सके)

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