Saturday, October 10, 2020

अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसके माता-पिता ने। अशोक की किस्मत भी सम्राट अशोक जैसी थी, पूरी न सही कुछ तो थी ही। सम्राट अशोक को कलिंग युद्ध के बाद शोक हुआ और इस अशोक को एफडीआई एवं मॉल संस्कृति आने के बाद। 
आज अशोक रह-रह कर याद आ रहा है। नजरें तो उसे पिछले आठ-दस दिन से तलाश रही थी, लेकिन उसका ठीहा या कहें दुकान बंद थी। सोचा हमेशा की तरह कोई काम होगा या हमारी दिनचर्या में बदलाव के कारण उस खास समय दुकान बंद मिलती है। हकीकत कुछ और थी। ऐसी कि दिल में नश्तर की तरह चुभ गई। ये नश्तर मोहल्ले के हर घर में कुछ मिनट का सन्नाटा खींच गया। जवान होती दो बेटियों का पिता अशोक, जो न जाने कितने दर्द सहन कर रहा था, दिल का दौरा नहीं झेल पाया। अशोक गया नहीं उसकी हत्या हुई है और हत्यारे हैं हम..! जी हां हम। अशोक मरा नहीं उसे मारा गया है। उसे दिल का दौरा पड़ा नहीं। उसके दिल को इतना कमजोर कर दिया गया कि वो उसका शोक नहीं सह सका। भगवान शंकर की तरह अकेले हलाहल पी रहा अशोक चला गया... बिना किसी प्रतिवाद और बिना कोई शोर-शराबे।  
25 साल से जाने पहचाने अशोक की कहानी कुछ यूं है। जब हम उस नई कॉलोनी में निवास करने पहुंचे थे, तब घर से थोड़े फासले पर एक गुमटीनुमा दुकान में अशोक ने अपना शंकर किराना स्टोर खोला था। वक्त और जरुरत के मुताबिक उसमें प्रॉविजन स्टोर, फोटोकॉपी और आइसक्रीम पार्लर भी जुड़ता गया। कारोबार बढ़ने के साथ छोटी सी छह-बाई-छह फीट की तिकोनी दुकान एक से दो हुईं और फिर अचानक दुकान में सामान कम और खालीपन ज्यादा हो गया। 
जिस शंकर की दुकान (अशोक का मोहल्ले में प्रचिलित नाम) से घर का पूरा राशन आता था, कॉलोनी आबाद होने पर उससे धीरे-धीरे कब किनारा कर लिया गया, पता ही नहीं चला। वजह थी वॉलमार्ट का बेस्ट प्राइज, रिलायंस, बिग बाजार और ऑनडोर जैसे सस्ता सामान बेचने वाले बड़े स्टोर्स का मकड़जाल। इसका खुलासा भी एक शाम अशोक से बात करने पर ही हुआ। कभी रोज सुबह और शाम शंकर की दुकान पर कुछ न कुछ खरीदने की आदत इन मॉल्स ने खत्म कर दी। आलम यह हो गया कि घर से डिमांड आई अनिक का घी ले आओ... दुकान पर पूछा तो अशोक ने कहा- अमूल और सांची वाला घी है, लेकिन चाहिए अनिक था सो आगे बढ़ गए। कुछ इसीतरह हम सब लोगों ने मिलकर मोहल्ले की दुकान को उजाड़ कर दिया। 
दुकान में खालीपन बढ़ा तो फोटोकॉपी और आइसक्रीम जैसे टोटकों के बाद अशोक की पत्नी ने एक हिस्से में लेडीज टेलरिंग का काम शुरु कर लिया कि कुछ तो आमदनी में इजाफा हो। पाप अशोक ने भी किया था। वक्त के साथ बदलते ग्राहकों की मानसिकता न भांप पाने का पाप! कभी इसी दुकान के दम पर उसने कॉलोनी में मकान खरीदा था। वक्त ने करवट ली तो उसे बेच कर दूर सस्ता मकान लेने किसी बिल्डर के फेर में पड़ गया। नया मकान सालों देरी से मिला और रकम जाम होती गई। पुराने मकान का मुनाफा परिवार की जरुरतों और दुकान को संभालने में लग गया। चिंता और अवसाद से उपजता है मधुमेह। सो अशोक भी डायबिटीज और हाई ब्लडप्रेशर की बीमारी का शिकार हो गया। उसका चेहरा चुगली करता था कि शारीरिक बीमारी से ज्यादा धंधा मंदा होने और उधारी चुकाने की बीमारी बढ़ चुकी है, लेकिन शंकर की तरह वो अकेले विषपान करता रहा... कभी इनका जिक्र नहीं किया। 
कभी बातचीत में उसे खोलने की कोशिश भी की तो सिर्फ इतना ही कहा कि अब लोग थोक के भाव घरेलू सामान लेने लगे हैं इसलिए दुकान में सामान कम कर दिया। जवानी जिस काम में लगा दी उसे छोड़कर दूसरा काम करना अब संभव भी नहीं था इसलिए ग्राहकों को लुभाने के लिए प्रयोगों का दौर चलता रहा। जिस शंकर की दुकान पर मोहल्ले की महिलाएं कभी रात के अंधेरे में भी सामान लेने सहज चली जाती थीं, अब दिन में भी कोई नहीं जाता। वो अशोक ही था, जिसने महिलाओं को देखते हुए सिगरेट, गुटखा जैसी चीजों को बेचना बंद कर दिया था। वक्त बदला तो चार लोगों को दुकान पर खड़ा करने का सहारा यही चीजें बनीं। 
कई बार सोचा, घर में बात भी की, लेकिन जमी नहीं कि कम से कम छोटा सामान अशोक की दुकान से ही लिया जाए। कोरोना की महामारी ने जरुर कुछ दिन की रौनक लौटाई, जब लॉकडाउन में बाजार बंद थे। कुछ दिन बाद ही बिग बाजार जैसों की होम डिलेवरी ने फिर शंकर की उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया... और अशोक ने अचानक बिना बताए अलविदा कह दिया। 
अशोक तब गया जब दिल्ली में “बाबा का ढाबा” बेजार होने का वीडियो देख सैकड़ों लोग ढाबा चलाने वाले बुजुर्ग कांताप्रसाद की सहायता को जुट गए और महज 12 घंटे में ढाई लाख रुपयों की आर्थिक मदद खड़ी हो गई। हमारा अशोक वैसा खुशकिस्मत नहीं था। वो मारा गया हमारे कारण। वो मारा गया एफडीआई के तहत आए वॉलमार्ट के कारण। उसकी जान गई बिग बाजार से सस्ता माल खरीदने की हमारी लोलुपता से। सवाल गूंज रहा है कि लोकल फॉर वोकल के नारे के बीच बड़े किराना कारोबारियों की सस्ती दुकान ने गली-मोहल्लों के और कितने अशोक को हमसे दूर किया? गुनहगार वे नहीं जो लोकल की बात कर कैपिटलाइजेशन को तरजीह देते हैं। गुनहगार हैं हम लोग, जो मॉल में तो तिगुने दाम पर एक शर्ट पर एक मुफ्त शर्ट बिना मोल-भाव खरीद लेते हैं, लेकिन सब्जी वाले से एक किलो आलू का भी भाव-ताव करते हैं। 
ऐसे तमाम अशोक को श्रद्धांजलि के साथ यह उम्मीद कि फूड ब्लॉगर गौरव वासन की तरह कोई तो सामने आए और गली-मोहल्ले के इन दुकानदारों की तकलीफ उजागर करे। कोई तो वसुंधरा तन्खा शर्मा उस दर्द को ट्वीट करे और लक्स साबुन की बट्टी अथवा गोल मिठाई पर सिर्फ 10-15 पैसे के मुनाफे पर परचून और किराना दुकान चलाने वाले, गली के मोची और दर्जी की किस्मत बाबा के ढाबा की तरह फिर चमकने लगे।

Sunday, May 17, 2020

मध्यप्रदेश में कोरोना पर्यटन क्यों नहीं...?


आपदा पर्यटन प्रेमी सरकार से आरामतलब कमलनाथ के सवाल पूछने के मायने


- प्रभु पटैरिया 
देश में लॉक डाउन को 53 दिन  पूरे हो गए हैं। अब 18 मई से इसका चौथा चरण आने को है, लेकिन अभी तक सियासी कोरोना पर्यटन शुरु नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ?  इस सवाल का जवाब घर में भी घोषित-अघोषित मास्क लगाए बैठे लोग जानते हैं। नहीं जानते हैं तो सिर्फ कमलनाथ। 
मध्यप्रदेश में 15 महीने मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ ने आम जनता के ह्रदय में चुभ रहा सवाल पूछा है कि कोरोना संकट से मध्यप्रदेश को उबारने के लिए बने मंत्रिमंडल का कोई सदस्य अब तक किसी भी कोरोना प्रभावित जिले अथवा प्रभावितों के बीच (कोरोना पर्यटन पर) क्यों नहीं पहुंचा? लॉकडाउन में जनता को हो रही तकलीफ को देखने का साहस क्यों मुख्यमंत्री या उनका कोई मंत्री नहीं जुटा पाया? 
पहली नजर तो क्या किसी भी नजर में कमलनाथ का सवाल जायज लगता है, लेकिन क्या करें, दूसरे की जान से ज्यादा अपनी जान की फिक्र सभी को होती है। सो सेनिटाइज बंगलों में भी जो लोग मास्क और दस्ताने पहन कर बैठते हों। मंत्रालय में इन अस्त्र-शस्त्र के साथ भरपूर सोशल डिस्टेंसिंग रखते हों। रुबरु मीटिंग की जगह वीडियो कांफ्रेंसिंग करते हों, वे क्यों कर सड़क पर सैकड़ों किमी पैदल चल रहे मजदूर और मजबूर के बीच जाकर अपनी जान का जोखिम लेंगे? कैसे कोरोना हॉटस्पॉट इंदौर या भोपाल की सड़कों पर घूमेंगे?  उनकी सुरक्षा का प्रोटोकॉल आड़े आए उससे पहले कोरोना का डर रास्ता रोक लेता है। 
जनता के प्रति जवादेह सरकार से कमलनाथ का सवाल इसलिए भी जायज लगता है क्योंकि मध्यप्रदेश में वो किसान का बेटा शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री है, जिसे जनता के सुख-दुःख के आगे अपना कोई सुख-दुःख दिखाई नहीं देता। 13 साल की पिछली भाजपा सरकार में शिवराज का वल्लभ भवन से ज्यादा वक्त प्रदेश के दौरों में बीता। कहीं ओला गिरे, अगले दिन किसानों को दिलासा देने ओले की मार से पटी फसल पर शिवराज हाजिर। कहीं पाला पड़ा तो दिलासा देने खेत की मेड़ पर मामा का उड़नखटोला उतर पड़ता था। वर्षा का कहर हो या सूखे की चपेट अथवा कोई दुर्घटना सांत्वना देने और ढाढस बंधाने मुख्यमंत्री पीड़ितों के बीच होते थे। पेटलावद में बारुदी विस्फोट से 88 लोगों के जान गंवाने की घटना कौन भूल सकता है। दिवंगतों के परिजनों की नाराजगी की तमाम प्रशासकीय आशंका को परे धर शिवराज दुःखी लोगों के साथ सड़क पर बैठे दिखाई दिए थे। उनके इस अपनत्व भाव ने लोगों को बड़ी राहत दी थी। और तो और मंदसौर गोलीकांड में अपनी ही सरकार के अफसरों की लापरवाही पर क्षोभ जताने वे उपवास पर बैठ गए थे। कौन भुला सकता है कि किसान हितैषी मुख्यमंत्री का उपवास तुड़वाने मृतक किसानों के परिजन मंदसौर से साढ़े 300 किमी का सफर कर भोपाल तक दौड़े चले आए थे। 
इतने रहमदिल शिवराज आपदा में फंसे आम आदमी को लेकर कभी निर्दयी नहीं हो सकते। कोई तो मजबूरी उन्हें मंत्रालय से मॉनिटरिंग तक बांध कर रखे है। वर्ना यह संभव ही नहीं कि प्रदेश का गरीब कड़क धूप में सड़कों पर तड़पता रहे और वे वीबी-2 के वातानुकूलित कक्ष में बैठे रहें। 
शिवराज की मजबूरी समझ आती है, लेकिन उनका क्या जिन्हें जिले आवंटित हैं। वे मंत्री जो कोरोना से निपटने संभाग प्रभारी बनाए गए। मुख्य सचिव सहित वे आला अफसर जिन्हें जिलों की कमान दी गई। वे क्यों अपने प्रभार के जिलों में नहीं गए? क्या उन्हें कोरोना पर्यटन नापसंद है या फिर मुख्यमंत्री के निर्देश का पालन वे जरुरी नहीं समझते? कमलनाथ ने यह बात तो सही पूछी है। 
शिवराज की हिमायत नहीं। मुख्यमंत्री खुद न जा पा रहे हों तो मंत्री और आला अफसरों को मजदूरों के सेवा कार्य की निगरानी के लिए भेजना चाहिए। इसके बावजूद शिवराज और उनकी टीम का इस संकटकाल में मौके पर न जाना फिर भी समझ आता है कि वे मंत्रालय से भी निर्देश, आदेश और मॉनिटरिंग कर रहे होंगे। आखिर 8 करोड़ जनता की सेवा की जिम्मेदारी उनके कांधों पर है। इसलिए तमाम सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद कोरोना संक्रमण का खतरा उठाना उनके लिए संभव न होगा। लेकिन कमलनाथ और उनकी कांग्रेस की क्या मजबूरी है? विपक्षी दल के नेता और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते वे जा सकते हैं। इंदौर के उन इलाकों में जाएं जहां लोग राशन के लिए लाइन लगा रहे हैं। महाराष्ट्र सीमा की बड़ी बिजयासन जाएं जहां प्रवासी मजदूर आ रहे हैं। बैतूल या छिंदवाड़ा की सड़कों पर उनकी पीड़ा सुनें, सहायता दें। किसने रोका है? उन तमाम कमियों को देखें, जिनके बारे में बिना मौके पर जाए वे अपने बयान में लिख रहे हैं। देखें क्या वाकई शिवराज सरकार ने प्रदेश को भगवान भरोसे, अपने हाल पर लावारिस छोड़ दिया है? अपनी संवेदनशीलता दिखाएं और शिवराज सरकार की असंवेदनशीलता उजागर करें। 
हमने शिवराज के 13 साल और मुख्यमंत्री कमलनाथ के 15 महीने का शासन देखा है। इसलिए आज शिवराज सरकार को आइना दिखा रहे कमलनाथ से एक सवाल बनता ही है। क्या मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ किसी ओला पीड़ित किसान के खेत पर गए थे? किसी घटना, दुर्घटना में पीड़ित के परिजनों से मिलने उनके घर पहुंचे थे?  विपक्षी विधायक रहते हुए भी शिवराज हर ऐसे मौके पर मौजूद थे। अब वह अवसर और परीक्षा कमलनाथ के  लिए है। दूसरों को राह दिखाने से पहले वे खुद उस मार्ग पर चल कर दिखाएं। पहुंचें लॉकडाउन की मार झेल रहे लोगों के बीच। दूसरे को अपने घर बैठकर टार्च दिखाने के बजाए वे खुद मैदान में आएं। हो सकता है कि उनके इस तरह जनता के बीच जाने के बाद सरकार चलाने वालों का कोरोना खौफ भाग जाए और वे भी उनका अनुसरण करते दिखें। कमलनाथ याद रखें कि उनकी इस सदाशयता पर कोरोना पर्यटन का लेबल लगा कर उपहास नहीं उड़ाया जाएगा। स्वागत ही होगा।

अम्मा...


आज 25 साल हो गए। आज ही का दिन था, जब चटक गर्मी में डामर की पिघलती सड़क पर नंगे पैर अम्मा को लेकर हम सब अपने उस खेत की तरफ जा रहे थे, जहां अंतिम संस्कार होता है। 
अम्मा...हमारी यादों की अम्मा को बिछुड़े आज पूरे 25 साल हो गए। लॉकडाउन तो अभी कोरोना के कारण है। 1995 की उस 17 मई के आसपास हम सब... अम्मा के दुलारे अलग-अलग जगह लॉक ही थे। दीदी दिल्ली, मैं बिलासपुर, गुड्डू भोपाल, पिताजी और भैया के साथ अम्मा गांव में। अलगाव से जुड़ाव के रास्ते पर चलने वे निकली थीं। पिताजी का अपनी मिट्टी में लौटने का सुख, अपने बचपन और यौवन के साथियों के साथ गांव के विकास की ललक में अम्मा ने भी बच्चों की जगह अपने पति की सेवा को चुना था। उस दौर में वाशिंग मशीन से कपड़े धोने वाली अम्मा गांव जाकर हाथ से कपड़े फीचने लगीं। शहर में ट्यूबलाइट, सीलिंग फैन और कूलर का सुख भोगने वाली अम्मा गांव में लाइट की अनिश्चितता के बीच शाम होते ही लालटेन के कांच साफ करने लगीं। हाई शुगर पेशेंट होने के बाद भी अपना ध्यान रखने के बजाए गांव वालों और रिश्तेदारों के सुख में सुख देखने लगीं। इस सुख की आपाधापी में अम्मा की दवाई-गोलियां कहीं पीछे छूट गई। डायबिटीज का लेबल कितना बढ़ा, अनुभव करने के बाद भी वे बता न सकीं। बुंदेलखंड की पंगत में आलू, भात और लड्डू का आग्रह भी न ठुकरा पाई। 
शायद इस खुशी में कि दो-चार दिन बाद ही गांव से फिर शहर में बसना है। अपने परिवार के साथ उस घर में जिसकी गृहस्थी उन्होंने सजाई थी। लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था। अम्मा बस में बैठ झांसी के लिए निकलीं, जहां से बिलासपुर की ट्रेन पकड़नी थी। रास्ते में डायबिटीज कमाल दिखा गई। शायद घर जाने की खुशी में उन्होंने कुछ खाया न था। बेहोश हो गईं। आनन-फानन में डॉक्टर को दिखा झांसी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराई गईं। शाम को शुगर कंट्रोल हुई, होश आया तो भरोसा दिलाया आज की ट्रेन चूक गई। कल की पकड़ लेंगे। 
अगली सुबह जब भैया दवाई लेने गया। पिताजी डिस्चार्ज की पूछने। अम्मा के बिस्तर पर उनका भाई ही था...और वे चली गईं। ट्रेन पर दूसरे दिन भी उन्हें भरोसा न था। यह अम्मा की सरलता और सहजता ही थी कि उनकी अपनी संतानों के अलावा वे सब झांसी या गांव के आसपास मौजूद थे। जो उनके मायके के कुटुंबी थे या ससुराल के। बहू अर्चना भी पास ही अपने मायके ललितपुर में थी।
पास था तो सबसे छोटा बेटा भैया। गुड्डू ने शताब्दी पकड़ी। हमने रात की गाड़ी, क्योंकि बिलासपुर से और कोई साधन था ही नहीं। 
जेवरा गांव के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी के भी घर रात और अगली सुबह चूल्हा नहीं जला। सब इकट्ठे हुए। शांत, शीतल, स्निग्घ आभा बिखेरती अम्मा को पल-दो पल ही देख पाए और चल दिए उन्हें विदा करने। 
अम्मा आज भी वैसी ही याद आती हैं। सभी को उनकी अपनी यादों की अम्मा। पिताजी की जीवन साथी, बच्चों की मां, भाई की भोली बहन, बाकी रिश्तेदारों की अपनी-अपनी यादों की अम्मा। हमारे बच्चों के लिए कौतुहल का विषय अम्मा। हमाई केसर, हमाई केसर कह कर उनके बचपन से लेकर अंत समय तक के किस्से सुनाने वाले भी अब अपने अपने समय पर चले गए। जब भी जाओ गांव की औरतें भी उन्हें याद करती हैं। रह गई हैं तो यादों की अम्मा। घर में, गांव में और मन में...अम्मा। 

(नोट-अम्मा की स्मृति में आज इतना ही... शेष जब लिखा जा सके)

Saturday, May 16, 2020

उपचुनाव से पहले भाजपा में चुनौती का दीपक



भाजपा प्रदेश नेतृत्व को हाटपिपल्या के पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री दीपक जोशी को शुक्रवार के दिन प्रदेश कार्यालय तलब करना पड़ा। दीपक से उनके बयान को लेकर कैफियत मांगी गई, जिसमें उन्होंने कहा था कि “उनके पास सारे विकल्प खुले हुए हैं।” विकल्प अकेले दीपक के सामने ही नहीं हैं, विकल्प उन 22 विधानसभा क्षेत्रों में भी हैं, जहां से भाजपा के प्रत्याशियों को हरा कर विधायक और मंत्री बने कांग्रेस नेता सत्ताबदल की चौसर पर अपनी विधायकी दांव पर गंवाने के बाद एक बार फिर मैदान में होंगे। सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने इन्हीं रणबांकुरों को बागी बनने से रोकने की है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा और प्रदेश संगठन महामंत्री सुहास भगत के इस ऐलान के साथ कि सिंधिया खेमे के सभी पूर्व विधायक पार्टी प्रत्याशी होंगे और उन्हें जिताने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ पार्टी के हारे हुए प्रत्याशियों को मेहनत करनी है, असंतोष खदबदाने लगा है। मंत्री और विधायक पद बलिदान कर भाजपा को सत्ता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले इन पूर्व विधायकों के इस त्याग का मोल चुकाना भाजपा की मजबूरी है। पार्टी कार्यकर्ता भी इसे महसूस करते हैं। सभी जानते हैं कि इन बलिदानियों को कमल निशान के साथ चुनाव में उतारना पार्टी के लिए अहसान उतारने जैसा पावन कार्य है। इस सबके बावजूद जिस तरह से कोरोना काल में भाजपा की मान्य परंपरा को दरकिनार कर वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए उनकी उम्मीदवारी का ऐलान किया गया उसे लेकर नाराजगी है।

नाराजगी का प्रथम मुखर स्वर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के संत नेता स्वर्गीय कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी के रुप में सामने आया। जोशी की पीड़ा है कि उन्हें उनके अपनों ने ही चक्रव्यूह में घेर का चुनाव हराया था। पराजय के बाद भी पूर्व मंत्री होने के बावजूद पार्टी कार्यक्रमों में उनकी उपेक्षा, तिरस्कार किया जाता रहा। ऐसे में जब उन्हें भाजपा में अपने खेलने के लिए कोई मैदान नहीं दिख रहा तो सामने से मिल रहे अच्छे मैदान के प्रस्ताव को कैसे नजरअंदाज करें। सियासत में पाला बदल का एक बड़ा कारण यही आत्मसम्मान है।

 मध्यप्रदेश ही नहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में खासा मुकाम रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी एक लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद उन्हीं सब परिस्थितियों का सामना कर दलबदल करना पड़ा, जिसे दीपक जैसे नेता झेल रहे हैं। जब सिंधिया का कदम जायज और स्वागतयोग्य है तो उनका क्यों अस्वीकार्य हो जाता है?

हाटपिपल्या में मनोज चौधरी को भाजपा का टिकट जो स्थितियां बना रहा है, कमोबेश वही परिस्थितियां ग्वालियर में प्रद्युम्न सिंह तोमर के सामने पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया के कारण हो सकती हैं। गोहद में रणवीर सिंह जाटव को भी पूर्व मंत्री और भाजपा के अनुसूचित जाति वर्ग के नेता लाल सिंह आर्य को लेकर ऐसी समस्या हो सकती है। सांची में डॉ प्रभुराम चौधरी के आगे उनके सदाबहार प्रतिद्वंदी डॉ गौरीशंकर शेजवार और उनके पुत्र को लेकर भी वही चुनौती सामने आ सकती है। सुरखी में शिवराज सरकार में मंत्री बन चुके गोविंद सिंह राजपूत के चुनावी भाग्य का फैसला करने में इस जिले से भाजपा कोटे से बनने वाले मंत्री और पूर्व विधायक का योगदान होगा। यदि दोनों प्रमुख दावेदारों में से कोई भी मंत्री बनने से चूका को उनकी टीम राजपूत को विरोधी दल का मान कर उनकी जड़ों में मट्ठा डालने में जुट सकती है। ये दोनों मान भी गए तो बाकी दावेदारों के लिए भी यह अवसर बुरा नहीं होगा। प्रदेश की उपचुनाव वाली 24 विधानसभा सीटों में से 22 पर यह बगावत और भितरघात का यह वायरस मौजूद है। फर्क बस इतना है कि कहीं वह एक्टिव दिख रहा है तो कहीं उसे माकूल मौसम का इंतजार है। 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा प्रदेश नेतृत्व इस स्थिति से अनजान नहीं हैं, लेकिन उनकी मजबूरी है कि सत्ता सुख भोगना है तो इस वायरस का इलाज करना होगा। संक्रमण की गति को देखते हुए उसके मुकाबले की योजना बनानी होगी। किसी को दुलार-पुचकार कर तो किसी को पद-प्रतिष्ठा देकर और किसी को घुड़की या निष्कासन का भय दिखा कर बगावत की इस बीमारी का इलाज करना होगा। चुनाव करीब आने के पहले ही वीडी शर्मा और सुहास भगत ने घाव को कुरेद कर उसके उपचार की शुरुआत कर दी है। 

विश्लेषणइसी की प्रतिक्रिया में दीपक जोशी सामने आए और उन्हें मनाने का जतन भी तुरंत कर लिया गया। प्रदेश नेतृत्व से मुलाकात के बाद जोशी का बयान – “भाजपा में था, भाजपा में ही रहूंगा और क्षेत्र में भाजपा की ही जीत होगी।” बताता है कि आने वाले दिनों में कुछ और नेता इस तरह के बयान दीनदयाल परिसर में खड़े होकर देते दिख सकते हैं। उनके सीने में भाले की तरह धंसे सिंधिया समर्थकों को लेकर उनका और उनके कार्यकर्ताओं का क्या रुख होगा, असलियत चुनाव में ही दिखेगी। उनके सामने कांग्रेस का वैसा ही प्रलोभन होगा, जैसा कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के समय निर्दलीय सहित अन्य दलों के विधायकों के सामने रहा होगा। अपने विजेता प्रत्याशी विरोधी दल के हाथों गंवा चुकी कांग्रेस के लिए किसी नए की तुलना में भाजपा के पराजित उम्मीदवार कई क्षेत्रों में ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं। आखिर वह भी तो अपनी सत्ता वापस पाने के लिए चुनाव मैदान में उतर रही है। इसलिए भाजपा के बागी की टीम के साथ कांग्रेस का गठजोड़ चुनाव को रोचक बना सकता है। मुकाबले के लिए भाजपा के पास भी सत्ता की चाशनी के साथ अपने कार्यकर्ता, सिंधिया गुट के नेताओं के समर्थक और खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया का ग्लैमर होगा। फिर भी भाजपा की चिंता पुरानों को थाम कर रखने और संतुष्ट करने की है। चुनाव से पहले उन पराजित नेताओं को संगठन, निगम-मंडल में एडजस्ट किया जा सकता है, जो पार्टी लाइन को शिरोधार्य करें। इसके बावजूद अपनों के भितरघात का खतरा बना ही रहेगा। 24 जिलों में युवा अध्यक्ष देकर एक अलग तरह के असंतोष का खुद कारण बनने वाले भाजपा के नए नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह इन हालातों से कैसे निपटता है।

Sunday, May 10, 2020

ब्यूरोक्रेसी में कमलनाथ टॉनिक: शिवराज का दृष्टि दोष या नेत्र ज्योति प्रक्षालन!



- खांचों में बंटी आस्था वाली प्रशासनिक सर्जरी 

15 महीने की कमलनाथ सरकार ने वो कमाल किया, जो शिवराज सिंह चौहान की 13 साल की सरकार में नहीं हो सका था। इन कांग्रेसी पंद्रह महीनों में ऐसा क्या हुआ कि चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान की आंखों से मोतियाबिंद जैसा जाला हट गया और उन्हें ब्यूरोक्रेसी की हर परत दिखने लगी।

सियासतदानों के दृष्टि दोष और नेत्र ज्योति के बीच काफी फर्क होता है। आमतौर पर किसी करीबी, सलाहकार या सहयोगी का चश्मा उन पर चढ़ा होता है। इसी चश्मे से वे लोगों को देखते हैं। उनकी परख करते हैं। अच्छे-बुरे की समझ इसी चश्मे के लेंस से उन्हें नजर आती है। 
होता यह है कि सरकार बदलने के साथ लूप लाइन में रखे हुए कोई सीनियर ब्यूरोक्रेट नई सत्ता के "संजय" बन जाते हैं। उन्हीं की आंखों से सिंहासन पर आरुढ़ व्यक्ति अपनी प्रशासनिक व्यवस्था रचता है। पिछली सरकार के करीबी अफसर प्रमुख पदों अपदस्थ किए जाते हैं और नए बैठाए जाते हैं।

 दिसंबर 2018 में सत्तासीन होते ही कमलनाथ ने भी यही किया था। उनके संजय बने थे सुधि रंजन मोहंती, जो 15 साल की बीजेपी सरकार में निर्वासन जैसी स्थिति से कई बार दो-चार हुए थे। कमलनाथ ने मोहंती को अपना मुख्य सचिव बनाया और मंत्रालय से लेकर जिलों तक अफसरों का रंग देख कर उनकी पदस्थापना होने लगी। 

किसी के दुर्भाग्य तो किसी के सौभाग्य से 15 महीने में ही सत्ता बदल हो गया। वही शिवराज फिर  सिंहासन पर आसीन हो गए, जो इससे पहले 13 साल तक रहे थे। शिवराज ने आते ही सबसे पहले लूप लाइन से निकाल कर इकबाल सिंह बैंस को मुख्य सचिव बनाया। प्रशासन में छुटपुट बदलाव किए। बीती रात उन्होंने अपनी शैली से उलट एक झटके में 50 आईएएस अफसर इधर से उधर कर दिए। इस बदलाव की सबसे बड़ी विशेषता वही है, पिछली सरकार के विश्वस्त अफसरों को लूप लाइन में डालना।

 शिवराज की इस जमावट का पेंच यह है कि जिन अफसरों पर महज 15 महीने तक मंत्रालय के सुल्तान रहे कमलनाथ और मोहंती का खास होने का लेबल लगाया गया है, वे सभी 13 साल तक शिवराज की आंखों के भी तारे रहे हैं। सिर्फ    एम. गोपाल रेड्डी जैसे इक्का दुक्का अफसरों को छोड़ दें तो बाकी सभी के उत्कर्ष की कहानी शिवराज सरकार के कांधे पर सवार होकर ही लिखी गई है।

शिवराज सिंह और इकबाल सिंह बैंस को हमेशा खटकते रहे एम. गोपाल रेड्डी के सिर महज आठ दिन के चीफ सेक्रेटरी का ताज बिठाने के लिए उनके दोस्त मोहंती ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले मुख्य सचिव पद छोड़ा था। बैंस के उन्हीं बैचमेट गोपाल रेड्डी को डेढ़ साल बाद वापस राजस्व मंडल भेजने का निर्णय लेने में सरकार को डेढ़ महीना लग गया। गोपाल रेड्डी जैसे अफसरों से यह व्यवहार तो समझ आता है, वे नापसंद थे और अभी भी हैं, लेकिन उनका क्या जो शिवराज की पसंद हुआ करते थे? उन्होंने ऐसा कौन सा कमलनाथ छाप टॉनिक पिया था, जिसके दाग छुप ही नहीं रहे।

 प्रमुख सचिव डॉ राजेश राजोरा, मनु श्रीवास्तव, पी. नरहरि जैसे अफसर पिछली सरकार में शिवराज सरकार की आंखों के तारे रहे थे। अब वही कांटा बन गए। अपर मुख्य सचिव आईसीपी केशरी, जे. एन. कंसोटिया, प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव आदि अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त है, जो दोनों सरकारों में काबिल माने गए। सबसे बड़ा उदाहरण प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल हैं। वे लंबे समय तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के प्रमुख सचिव रहे। कमलनाथ ने भी उन्हें इसी पद पर बनाए रखा। शिवराज फिर मुख्यमंत्री बने तो चीफ सेक्रेटरी बदलने के बाद पहला आदेश उन्हें ही मुख्यमंत्री कार्यालय से हटाने का हुआ था। 

कहा जा रहा है, यह प्रशासनिक फेरबदल चीफ सेक्रेटरी इकबाल सिंह बैंस का है। अफसरों की पोस्टिंग उनकी मर्जी से हुई। मेन स्ट्रीम में लौटे अफसर उनके समर्थक हैं। लूप लाइन में पटके गए अधिकारियों पर मोहंती का लेबल बताया जा रहा है। हकीकत में उन पर भी लेबल शिवराज ही है। बस नजर का फर्क हो गया है। कमलनाथ सरकार की नजर में चढ़ने का खामियाजा उन्हें शिवराज की नजर से उतरने के तौर पर झेलना पड़ रहा है। तो क्या अब अफसर भी किसी ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखा कर काम दिखाने या अकर्मण्यता ओढ़ने का फैसला करें। जिससे सरकार बदलने पर उनकी कर्मण्यता को किसी सियासी तराजू पर न तौला जाए।

Friday, January 24, 2020

लाट साहब!! गुस्सा जायज पर आप भी डकैतों का साथ देने वालों का सजदा छोड़ें

राजगढ़ में एक अशोभनीय बयान ने एलीट ब्यूरोक्रेसी की डिग्निटी को जगा दिया। आमतौर पर सोशल प्लेटफार्म पर गरिमामय आचरण वाले आईएएस अफसर इससे इतना आहत हुए कि 4dignity मुहिम छेड़  कर भरपूर मुखर हो गए। अनुभवी हों या जमीनी हकीकत से पहली बार  साबका वाले अथवा फील्ड पोस्टिंग की बाट जोह रहे नए अफसर, सभी खुल कर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर गंदी सोच वाला बयान देने वाले नेता के खिलाफ उबल पड़े। लेकिन जरा सोचिए, जिनके सम्मान में इन्हें कुर्सी छोड़ कर खड़े होने का नियम और परंपरा है, उनके प्रति इनकी ये क्या भाषा है। क्या मसूरी की प्रशिक्षण अकादमी में यह भी सिखाया गया है।  
गुना कलेक्टर भास्कर लाक्षाकार ने सबसे तीखा और वाजिब रिएक्शन दिया है। युवा कलेक्टर ने फेसबुक पर लिखा है- "ये डकैत आपके (कलेक्टर) बारे में  न्यायाधीश बने फिरते हैं। जिसका जो मन आता है आप पर (आप यानी अफसर, कलेक्टर या एसपी ही नहीं छोटे साधारण कर्मचारी तक इसमें शामिल हैं) आरोप लगा कर हें-हें ठें-ठें कर निकल जाता है। ये उन लोगों के पक्ष में सीना ठोक कर झूठ बोलते हैं और आपको कोसते हैं, जिनकी दिनदहाड़े की डकैती और घपलेबाजियां सारा शहर जानता है।"
तन्वी हुड्डा हों, सोनिया मीणा या फिर  रघुराज राजेंद्रन सबको बयान पर इतना गुस्सा आ रहा है कि वो अपनी डिग्निटी के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की डिग्निटी भूलने को बेकरार हैं। 
बढ़िया है बाबू जी! बाबू शब्द ब्यूरोक्रेसी के लिए दशकों से इस्तेमाल हो रहा है। सम्भवतः अंग्रेजों के समय से जब लगान इत्यादि राजस्व संग्रहण के लिए इस सर्विस का गठन हुआ था। गुस्सा आना भी चाहिए, लेकिन सिर्फ एक पक्ष पर? घटिया मानसिकता वाले बयान पर नाराजगी जायज है, लेकिन क्या मध्यप्रदेश में कोई ऐसा अफसर भी है, जिसने राज्य मंत्री पद पर रहते समय सामने पड़ने पर बद्रीलाल यादव को सलाम न ठोका हो? यदि है तो गुस्सा जायज है। साल भर पहले तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान या मंत्री रहे उनकी पार्टी नेताओं की जी हजूरी न की हो? आपने अपनी डिग्निटी के लिए तमाम सियासी बिरादरी को डकैत और घपलेबाज का तमगा देकर उनकी डिग्निटी को चुनौती दी है। अब आप कैसे वर्तमान सत्ताधारी नेताओं के सम्मान में मुश्कें कस कर सजदा करेंगे? इनमें से कुछ अभी भी माफियामुक्त अभियान में किसी माफिया की पैरवी कर रहे होंगे। कोई किसी बेशकीमती जमीन को हथियाने दबाव डाल रहा होगा। किसी को रेत के अवैध खनन की वैधता बरकरार रखनी होगी। बहुतेरे काम अफसर नेताओं के इशारे अथवा दबाव/प्रभाव में करते हैं। 
आपकी ही बात को सच मानें तो नेता कोई भी हो वो वही सब कृत्य करता है, जो खामियां आपने गिनाई हैं। सत्ता तो आनी-जानी है। आज जो आसीन हैं, कल विपक्ष में रह कर ऐसे ही आपको गरिया रहे थे। कल फिर सत्ता से हटेंगे तब भी उनका वही व्यवहार नहीं होगा इसकी कोई गारंटी दे सकता है! "शुद्ध के लिए युद्ध" छेड़ना है तो कसम उठाएं कि नेताओं के कहने पर कोई नियम विरुद्ध कार्य नहीं करेंगे, न होने देंगे। डकैत हितैषी और डिग्निटी पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले किसी नेता का कुर्सी छोड़ कर स्वागत नहीं करेंगे।
 लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही रीति है कि उसमें सभी तरह के लोग बिना किसी छन्ने के ऊपर तक पहुंच जाते हैं। आप लोगों ने एक तराजू पर सारे सियासी मेंढ़क तौलने का दुस्साहस दिखाया है। हो सकता है ये अभी इसे पचा जाएं, मौका मिलने पर भंजाएंगे जरूर। 
चर्चा-विमर्श कलेक्टर मैडम के परफॉर्मेंस पर भी किया जाना प्रासंगिक होगा। क्या आईएएस एसोसिएशन ने यह पड़ताल करने की आवश्यकता समझी कि एक कलेक्टर वो भी महिला को क्यों इस तरह भीड़ में प्रवेश कर मारपीट करनी पड़ी? जबकि पर्याप्त पुलिस बल और पुरुष अधिकारी उनके साथ थे। क्या जिले में कलेक्टरी का यह नया गुर लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी मसूरी में सिखाया जाने लगा है? यदि ऐसा है तो CAA के समर्थन और विरोध में देश भर में हो रहे प्रदर्शन के दौरान उन जिलों के कलेक्टर क्यों इस तरह पुलिस को परे रख खुद नहीं जूझे? 
कई रिटायर्ड और कलेक्टरी के अनुभवी इन सर्विस अफसर उनके इस बर्ताव से सहमत नहीं हैं। मंत्रालय में कलेक्टर निधि निवेदिता के इस रूप को लेकर चर्चाओं का दौर चल रहा है। एक सीनियर अफसर का तर्क है कि मैडम को खुद हाथ खोलने के बजाए पुलिस को हुक्म देना था। कलेक्टरी का मतलब भी यही है। जिलाधीश के पास कानून-व्यवस्था संभालने से लेकर पूरे जिले की व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन के लिए असीमित अधिकार और अमला होता है। मीटिंग, मॉनिटरिंग और निर्देश देना, अमल कराना उसके रसूख को बढ़ाता है। तो क्या राजगढ़ की पुलिस या निचला अमला कलेक्टर की अनसुनी कर देता,जो वो खुद दुर्गा अवतारी भूमिका में आ गईं! 
भूतपूर्व मुख्य सचिव विजय सिंह के साथ काम कर चुके एक अफसर कलेक्टर के व्यवहार को बचकाना बताते हुए कहते हैं कि कई अफसर तमाचा मारने वाले रहे हैं। खुर्राट अफसर विजय सिंह ने भी उनके सामने जबलपुर की पोस्टिंग के दौरान हाथ साफ किए थे। एक किस्सा किसी आदिवासी ग्रामीण हाट का है, जहां कोई व्यापारी खुली दवाइयां बेचता था। सिंह साहब ने सिरदर्द की गोली मांगी तो देखा बक्से में एंटीबायोटिक्स भी है। चटाक से गाल बजा दिया। जूनियर ने पूछा पुलिस को दे देते मारा क्यों? जवाब मिला- अब जिंदगी भर वो ये गलती नहीं करेगा। पुलिस से छूट जाता तब भी दवाई ही बेचता।
दूसरा किस्सा ठस लोगों की धरती मुरैना का है। एक साहब की पोस्टिंग हुई तो लोगों ने सलाह दी थप्पड़बाजी करने वाले को ही वहां के लोग काबिल अफसर मानते हैं। साहब ने भी राह चलते एक गांववाले का गाल लाल कर दिया। साथ चल रहे सुरक्षा कर्मी ने समझाया, हम किस लिए हैं। आप निर्देश दीजिए पीटने का काम हमारा है। यदि पलट कर वो युवक मार देता तो क्या स्थिति बनती? 
पलट कर मारने का यही सवाल राजगढ़ में भी था। हजारों की भीड़ में यदि कोई कलेक्टर के साथ बदतमीजी कर देता तब..? पुलिस और उनके गार्ड क्या करते! फायर खोलते या भागते? दो-चार को यदि गोली या लाठीचार्ज से घातक हानि पहुंचती तब...। मंदसौर कांड नहीं दोहराया जाता। उस स्थिति में जो आज कलेक्टर का पक्ष ले रहे वे क्या कहते? ब्यूरोक्रेसी घटिया बयानबाजी की खूब निंदा करे, लेकिन अपने गिरेबान में भी झांक कर देखे। यह नेताओं के गलत निर्देश न माने तो डकैत और घपलेबाज रहेंगे ही कैसे?  यह अपनी डिग्निटी खुद मेंटेन करे तो किसी की हिम्मत नहीं होगी उन पर सवाल उठाने की। क्या हर बार राजनीतिक इशारे पर या किसी के खिलाफ मीडिया ट्रायल पर मुखर होने वाला आईएएस एसोसिएशन सालाना जलसे की तरह इन बिंदुओं पर भी चिंतन करेगा?

Wednesday, November 13, 2019

बड़ी अजीब बेरोजगारी है....


आज एक महिला आई और बोली- आपके संस्थान में कोई बैकऑफिस वर्क हो तो काम करना चाहती हूं। कुछ दिन पहले एक युवक आया था, बोला- मेरे पास स्कूटर है, कोई भी काम हो तो बताएं। कम्प्यूटर में दक्ष महिला तो समझ आई, लेकिन स्कूटर का नौकरी से क्या ताल्लुक? बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऑटोरिक्शा, ट्रैक्टर आदि के सहारे काम की तलाश तो सुनी थी, लेकिन स्कूटर से? सवाल खड़ा हुआ तो पूछ भी लिया। युवक ने बताया वो पहले कपड़े की दुकान पर काम करता था। मालिक ने मंदी की आड़ में छंटनी कर दी। काम के दौरान ही बैंक से कर्ज लेकर स्कूटर खरीदा था। अब वही साधन है जिसके जरिए नौकरी की जुगाड़ है ताकि किश्त पटती रहे और घर चलता रहे।

ये स्थिति क्यों है? आखिर क्यों है ऐसी बेरोजगारी?
"खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए, हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में।" अदम गोंडवी की कविता की इन लाइनों सी है आज ये युवाओं की आस। 
ट्विटर हो या फेसबुक... पीएससी समेत संविदा शिक्षक से लेकर तमाम भर्ती परीक्षाओं का इंतजार कर रहे बेरोजगारों की पोस्ट देखिए तो महसूस होता है कि युवा कितने अधीर हैं। कोई दो साल से तैयारी कर रहा है तो किसी को पांच साल हो गए इंतजार करते-करते। सरकारें बदल गईं, लेकिन भर्ती तो दूर इसकी परीक्षा की तारीख घोषित नहीं हो रही। ये स्थिति तब है जब किसी शॉपिंग मॉल या बाजार की तर्ज पर हर छोटे-बड़े शहर में शिक्षण संस्थान चल रहे हैं। आईआईटी से इंजीनियर बनाने की फैक्ट्री राजस्थान के कोटा में है तो आईटीआई एवं मैनेजमेंट से लेकर डॉक्टरी और हर तरह की विशेषज्ञता पढ़ाने वाले संस्थानों की देश में कोई कमी नहीं है। कम्प्यूर के सॉफ्टवेयर एवं हार्डवेयर से लेकर एथिकल हैकिंग तक सिखाने वाले संस्थान तंग गलियों तक हैं। प्रायमरी से लेकर हायर सेकेण्डरी तक के कोचिंग इंस्टीट्यूटों की भरमार है। किसी राज्य में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से भी ज्यादा स्किल डेवलपमेंट के साधन और सुविधाएं उपलब्ध हैं।
स्किल डेवलपमेंट! इसी शब्द पर सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार हो या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार। सबकी जुबान पर यह जुमला है। बेरोजगारों की तादाद हर साल बढ़ती जा रही है और न तो उन्हें स्किल मिल रहा और न ही डेवलपमेंट हो रहा है। मध्यप्रदेश में 11 माह पहले सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने स्किल डेवलपमेंट के साथ ही मुख्यमंत्री युवा स्वाभिमान योजना का ख्वाब दिखा कर ऑनलाइन पंजीयन कराए। जिन ट्रेड में रोजगार को देने की बात की गई उसमें ढोर चराने से लेकर बैंड बाजा बजाने तक की ट्रेनिंग शामिल थी। रोजगार नहीं मिलने पर इन प्रशिक्षित युवाओं को बेरोजगारी भत्ते की तर्ज पर हर माह राशि मिलने का प्रावधान था। पता नहीं यह योजना कहां गुम हो गई? पिछली भाजपा सरकार में भी युवाओं को नौकरी का सुनहरा सपना दिखा कर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से लेकर न जाने क्या-क्या जतन किए गए, सब मृगमरीचिका ही साबित हुए। पिछली सरकार की आरक्षण संबंधी अदालती चुनौती के फेर में भर्ती परीक्षाएं अधर में गईं सो अलग। इनकी तो ठीक है, हर साल दो करोड़ नए रोजगार देने का प्रधानमंत्री का पिछली सरकार का वादा भी पकौड़ा और चाय व्यवसाय की भेंट चढ़ गया। मेक इन इंडिया प्रोडक्ट की भीड़ में मेड इन इंडिया युवा बेरोजगार ही रह गए हैं। नए युवाओं को रोजगार नहीं और जो रोजगार से लगे थे वे छंटनी के शिकार हो रहे हैं। मल्टीनेशनल्स से लेकर परचून और गारमेंट शॉप तक यही स्थिति है। कोई तो बताए इस स्थिति में युवा क्या करें? कहां जाएं? किससे मांगे रोजगार?

Tuesday, October 15, 2019

सरकार.., अब वक्त है रगों से लिपटे विषधरों को धरने का





सोचा था, ‘वक्त है बदलाव का’ के साथ मध्यप्रदेश में बदला हुआ वक्त दिखेगा। प्रदेश में भ्रष्टाचारमुक्त ईमानदार प्रशासन नजर आएगा। राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं का वक्त जरूर बदला है, लेकिन अफसरशाही का समय नहीं बदला है। याद कीजिए शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान लोकायुक्त जैसी जांच एजेसियां मुंह अंधेरे किसी अफसर या पटवारी तक के घर छापा मार कर करोड़ों रुपयों की अनुपातहीन संपत्ति उजागर करती थीं। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस वाली सरकार आने के बाद भी वक्त ठहरा हुआ सा ही है। 




लोकायुक्त की विशेष स्थापना पुलिस ने आज इंदौर में पदस्थ आबकारी विभाग के एक सहायक आयुक्त के ठिकानों पर छापामारी की तो वक्त का पहिया पुरानी जगह पर ही स्थिर मिला। शराब से सरकारी खजाना भरने वाले इस महकमे के आलोक कुमार खरे के भोपाल, इंदौर, रायसेन और छतरपुर के सात ठिकानों पर एक साथ की गई इस कार्रवाई में 100
कोठी 
करोड़ से अधिक की संपत्ति का खुलासा हुआ है। आलीशान फार्महाउस, लेविश बंगले और दर्जन भर लग्जरी गाड़ियों के साथ 21 लाख रुपये नगद की शुरूआती बरामदगी ने हलचल मचा दी है। महज लाख-सवा लाख रुपये महीना वेतन पाने वाला कोई अफसर दो दशक की अपनी नौकरी में इतना माल-असबाब बटोर कर मजे से मनचाही पोस्टिंग लेता रहा और निजाम आंखें बंद किए बैठा रहा
! अभी तो लॉकर खुलना और दस्तावेजों की पड़ताल होना शेष है, पता नहीं वे काली कमाई के इस कुबेर का कितना खजाना उगलेंगे? मजे की बात यह है कि अपनी अवैध कमाई को वैध बनाने का जो तरीका खरे ने ईजाद किया था, वह कई नेताओं का भी पसंदीदा है। खरे की पत्नी रायसेन में फलों की खेती करतीं थीं और अपने इनकमटैक्स रिटर्न में उससे मोटी आय का रिटर्न फाइल करती थीं।

आबकारी महकमे में आलोक कुमार खरे अकेले कमाऊ पूत नहीं हैं। गुजरात से लेकर अन्य राज्यों में अवैध मदिरा की तस्करी का स्वर्ग कहे जाने वाले इंदौर संभाग में पदस्थ कई अफसर खरे से भी ज्यादा मालदार मिल सकते हैं। बस
भोपाल के गोल्डनसिटी जाटखेड़ी स्थित बंगला
उनकी तरफ नजर घुमाने की देर है। मालवा की इसी धरती पर आबकारी विभाग के कई बड़े घोटाले उजागर हो चुके हैं। दो साल पहले उजागर हुए 42 करोड़ के घोटाले में जिन अफसरों की मिलीभगत से फर्जी बैंक चालान के जरिए राज्य सरकार को चूना लगाया गया था, वे तमाम अफसर जांच के बीच ही दोबारा इंदौर में पोस्टिंग पा गए। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब इस घोटाले की क्या परिणति होगी। भोपाल से लेकर ग्वालियर और अन्य जिलों तक आबकारी महकमे में कई घोटाले जब-तब सामने आए और जांच के नाम पर दबा दिए गए। जिन अफसरों पर इनके दाग लगे वे
‘ दाग अच्छे हैं ’ चरितार्थ करते हुए ‘सफेदी की चमकार’ को मात देते हुए फिर फील्ड में अपनी और अपने आकाओं की जेबें भरने में जुटे हैं। कितने नाम गिनाए जाएं। इंदौर घोटाले की आंच में झुलसे अफसर पिछली भाजपा सरकार की आंखों के तारे थे तो नई सरकार के लिए भी वे सुरमा साबित हो रहे हैं। सहायक आयुक्त खरे के आलोक में देखा जाए तो सिर्फ आबकारी ही नहीं कई विभागों को सफाई की जरूरत है, लेकिन सत्ता पर बैठे लोग सफाई के सिर्फ नारे बुलंद कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहे हैं, असली सफाई से उन्हें परहेज है।

पुनश्च प्रदेश के घोटालेबाजों और काले धन के कुबेरों की बात करें तो अब बयानबाजी होने लगी है कि खरे ने यह अकूत संपत्ति पिछली सरकार के दौरान अर्जित की थी। नई सरकार में तो उन पर लोकायुक्त का शिकंजा कसा है। सरकार को अभी सिर्फ नौ माह ही हुए हैं आदि, इत्यादि। पन्ने पलटें तो ऐसा ही बयान पिछली सरकार के दौरान उस वक्त सत्ताधारी
दल के नेताओं का होता था कि कमाई तो उनसे पहले की सरकार की है, उन्होंने घोटालेबाजों पर छापे डलवाए हैं। नौ
फार्म हाउस
माह में बयानवीर भले बदल गए हों, लेकिन बयानों का स्वर वही है। सरकार को वाकई प्रशासन और व्यवस्था में स्वच्छता अभियान चलाना है तो तमाम दागी अफसरों को किनारे धरें और उनकी संपत्ति की जांच कराएं, फिर चाहे वह कोई भी हो। अकेले इस अभियान से इतनी काली कमाई राज्य सरकार के खजाने में आ सकती है कि उसे मुख्यमंत्री युवा स्वाभिमान योजना चलाने के लिए बाजार से कर्ज नहीं लेना पड़ेगा। संदूकों और जमीन में गड़ा खजाना निकला तो प्रदेश में निवेश बढ़ाने मैग्नीफिसेंट एमपी जैसे आयोजन कर उद्योगपतियों की चिरौरी करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। वक्त इन मुद्दों पर भी विचार करने का है....इसलिए थोड़ा वक्त शासन-प्रशासन की रगों से लिपटे इन विषधरों को पकड़ने के लिए भी निकालिए सरकार!



Friday, June 14, 2019

तन्खा जी, मोदी ने ऐसा तो नहीं कहा था...


दिग्विजय सिंह से सीखें पराजय के बाद भी डटे रहना


ये क्या! देश के जाने माने वकील, राज्यसभा सांसद और मध्यप्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता विवेक तन्खा ने यह क्या कह दिया! ‘जब चुनाव मोदी के नाम पर हुआ है और कही भी लोकल सांसद प्रत्याशी का कोई महत्व या नाम नहीं लिया गया तो अपेक्षा मोदी जी से होगी। वोट उनको दिया तो काम की उम्मीद किससे करें?’ सौ फीसदी सही कथन है तन्खा जी आपका!

राज्यसभा सदस्य के तौर पर और उससे भी पहले से आपने जबलपुर में बहुत काम किया है। ट्विटर पर जब आपने मोदी को लेकर अपनी यह राय व्यक्त की तो आपके समर्थन में कई लोगों ने जबलपुर में हुए कार्य गिनाए हैं (कुछ लोगों
ने आपकी कमियां भी बताई हैं)। आपने भी अपने द्वारा कराए गए कार्यों का भरपूर जिक्र किया है। लेकिन इतना नैराश्य...इतनी हताशा क्यों? जब जनता ने देश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है तो स्वाभाविक है वे देशवासियों के लिए काम करेंगे ही। आपकी तरह आम मतदाताओं की भी अपेक्षा उनसे ही है। लेकिन आपको पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता दिग्विजय सिंह से सीखने की जरूरत है। भोपाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतना अभेद्य किले में सेंध लगाने जैसा होने के बावजूद उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री कमल नाथ की चुनौती स्वीकार की, बल्कि चुनाव जीतने के जितने जतन किए जा सकते थे, वो सभी किए। पराजय के बाद भी वे भोपाल में सक्रिय हैं और चुनाव के दौरान जारी किए गए भोपाल के अपने विजन डॉक्यूमेंट को पूरा कराने के प्रयास में जुटे हैं। राजनीति भी क्रिकेट के खेल जैसी है। जीत-हार इसमें लगी रहती है, लेकिन कोई खिलाड़ी प्रेक्टिस या मैच इस डर से नहीं छोड़ता कि वो हार रहा है या हार जाएगा।


पब्लिक प्लेटफॉर्म पर आपने जो अपने मन की बात कही है, उसकी उपज संभवतः आपकी प्रयागराज यात्रा है। आपने ही ट्वीट कर बताया था कि ‘कुछ दिन पूर्व इलाहबाद अब प्रयागराज जाने का मौका मिला। अच्छा महसूस हुआ। इलाहबाद एक बदला शहर नजर आया। कुंभ के कारण उसका रूप ही बदल गया है। सड़क, फ्लाईओवर, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन इत्यादि बदल गए हैं। जबलपुर को भी ऐसे कायाकल्प की जरूरत है। मोदी सरकार से कुछ ऐसी अपेक्षा जबलपुर को भी है।’ इस ट्वीट पर आई प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रिया में आपने जबलपुर में स्वयं के योगदान को रेखांकित करने के साथ ही जबलपुर के विकास का जिम्मा ही मोदी को दे दिया। जैसा कि आपका ट्वीट कहता है। जबलपुर में पेटीएम बैंक का ऑफिस खुलवाया, सांसद निधि का पारदर्शिता के साथ जन कल्याण के लिए सदुपयोग। ज्यादातर वंचित बस्तियों में बोरवेल खुदवाए। अस्पतालों में मरीजों की जांच के लिए मशीनें दीं। जबलपुर दक्षिण में चुनाव से कुछ माह पहले विधायकों की सिफारिश पर एक करोड़ की लागत के छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स मंजूर कराए। जबलपुर में कमल नाथ कैबिनेट की मीटिंग कराई और 2700 करोड़ रुपये के कई कार्य मंजूर कराए। पांच करोड़ की लागत से ब्लड बैंक बनवाए। वाकई जैसा आपने बताया है- आपने जबलपुर के लिए  और बहुत कुछ किया है। लेकिन यह आत्मचिंतन कैसा है कि ‘इतना कुछ करने के बाद भी अगर मैं जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया तो पता नहीं इसका आकलन कैसे करूं।’

पराजय के कारणों की पड़ताल हो। आत्मचिंतन करें अच्छी बात है। इस सब के बाद भी जनसेवक को पहले से ज्यादा जोश से जनता के लिए जुटना चाहिए। आपको लगातार दो चुनाव में पछाड़ने वाले और जबलपुर की हर छोटी-बड़ी समस्या पर ‘यह मेरा विषय नहीं है’ नारा बुलंद करने वाले राकेश सिंह हो सकता है इस बार मोदी मैजिक के सहारे जीत गए हों। ये मैजिक हर बार तो चलेगा नहीं। मोदी है तो हर काम मुमकिन हो यह भी संभव नहीं है। इसलिए जबलपुर की चिंता करिए। उसे मोदी के सहारे मत छोड़िए। नहीं तो....!

Saturday, April 27, 2019

कौन खाएगा खजुराहो के खजूर- अमानगंज की बेटी या एबीवीपी के विष्णु?


दस्यु सम्राट ददुआ का बेटा भी रोचक बना रहा बुंदेलखंड का मुकाबला

अमित शाह बढ़ा गए भाजपाइयों का हौसला, पत्नी के लिए नातीराजा का जोर



मध्यप्रदेश में सबसे गर्म तासीर वाले खजुराहो का मिजाज इन दिनों मौसम की ही तरह गरम है। लोकसभा चुनाव में इस सीट पर इस बार मुकाबला खासा रोचक होने की वजह भी खास हैं। खजुराहो पैलेस निवासी अमानगंज की बेटी और पन्ना एवं राजनगर की बहू महारानी कविता सिंह की मोदी वाले अंडर करंट के साथ पन्ना के अपने अस्थायी ठिकाने को परमानेंट ठौर में तब्दील करने का दम भरने वाले विष्णुदत्त शर्मा से टक्कर है। इस सीधे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के जतन में जुटे दस्यु सम्राट ददुआ के बेटे वीर सिंह भी खजुराहो के राजनीतिक तापमान को बढ़ा रहे हैं।
कविता का मायका, राव साहब का घर
शुरूआत करते हैं कविता सिंह के मायके से। पन्ना से अमानगंज के रास्ते पर द्वारी गांव से करीब
कविता सिंह
पांच किमी दूर है उनका मायका भड़ार। प्रधानमंत्री सड़क से मुख्य मार्ग से जुड़ा भड़ार मजरा-टोला है। गांव की शुरूआत होती है राव साहब शंकर प्रताप सिंह के हवेलीनुमा घर से। घर के दरवाजे पर कांग्रेस का एक झंडा लगा है तो आंगन में खड़ी जेसीबी
, बोलेरो और हार्वेस्टर उनकी संपन्नता की गवाही दे रहे हैं। इमली का पुराना झाड़ और फलों से लदा आम का पेड़ आंगन को पुरसुकून ठंडक देते हैं। राव साहब अमानगंज में बेटी के लिए प्रचार पर निकले थे। पूरे गांव में सिर्फ कांग्रेस के ही झंडे हैं और गांव वाले अपनी बेटी,बहन और बिन्नू राजा (कविता सिंह) को ही शतप्रतिशत वोट जाने की कसमें खाने के साथ भाजपाराज में गांव के अविकसित ही रह जाने की दुहाई दे रहे थे। लेकिन इसके उलट गांव के खपरैल घरों के बीच झांकते बिना रंगे पक्के मकान और हर घर में शौचालय यहां मोदी की दो योजनाओं का स्वत: ही प्रचार कर रहे हैं। समस्याओं की पूछो तो हैंडपंप पर स्नान करते लोग भी पानी का दूसरा कोई इंतजाम नहीं होने की बात कहते हैं। गांव की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी युवती शीलम गिरी, जो पन्ना में बीएससी फाइनल की स्टूडेंट हैं और रोज बस से कॉलेज जाती हैं। पांचवी तक के स्कूल को देख कर बताती हैं कि मिडिल स्कूल की जरूरत है, पानी का स्थाई इंतजाम और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी चाहिए। बिन्नू राजा के साथ सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ चुके रमेश दुबे उनकी व्यवहारकुशलता, मिलनसारिता और कुशाग्र बुद्धि के किस्से सुनाते हैं। कविता सिंह यदा-कदा गांव आती हैं। कुछ ऐसे महिला-पुरूष मिले जिन्होंने बिन्नू राजा को बचपन में गोद में खिलाया तो कुछ बच्चे वो हैं जो उनकी गोद में खेले हैं।
कविता के गांव भड़ार का प्रायमरी स्कूल
अमानगंज से दूर पन्ना में पोस्टर लगे हैं पन्ना की भानेज बहू कविता सिंह को जिताएं। पन्ना की बहू इसलिए क्योंकि खजुराहो वाले नाती राजा कुंवर विक्रम सिंह पन्ना राजघराने के भांजे हैं। यानी कांग्रेस प्रत्याशी ससुराल राजनगर, मामा गांव पन्ना और मायका अमानगंज (गुन्नौर विधानसभा) में रिश्तों के दम पर भारी दिख रही हैं। कमजोर भाजपा प्रत्याशी विष्णुदत्त शर्मा भी नहीं लगते। महज एक सप्ताह पहले ही उम्मीदवारी मिलने के बाद उन्होंने पन्ना में मुकाम बनाया है। गुटों में बंटी भाजपा के अधिकांश नेता मन से या बेमन से उनके लिए मैदान में हैं। जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष रहे संजय नगाइच और पन्ना विधायक बृजेंद्र प्रताप सिंह आपसी खटास भूल कर उनके लिए काम करे रहे हैं। जिलाध्यक्ष सदानंद गौतम के हाथ में कमान है तो एबीवीपी की टीम भी अपने लीडर के लिए जुटी है। अपनी सभाओं में विष्णुदत्त शर्मा यानी कार्यकर्ताओं के वीडी भैया इस क्षेत्र से अपनी नातेदारी बताने से नहीं चूकते। छतरपुर जिले में ही रावत परिवार उनकी ससुराल है और स्वर्गीय केदारनाथ रावत प्रदेश की कांग्रेस सरकार में राजस्व मंत्री रहे हैं। एबीवीपी के महाकौशल क्षेत्र के संगठन मंत्री होने के नाते उनका यहां किया गया काम और जुड़ाव उनकी मदद कर रहा है। पहचान का संकट उन्हें भी नहीं दिखता। छतरपुर विश्वविद्यालय बनाने के लिए किया गया उनका संघर्ष और उसमें योगदान देने वाली टीम प्राणप्रण से उनके लिए जुटी दिखती है।
वीडी शर्मा
छतरपुर, पन्ना और कटनी जिले तक फैले इस संसदीय क्षेत्र में दोनों उम्मीदवारों के पैर किसी एक जगह नहीं टिक रहे। 
वीडी शर्मा सुबह खजुराहो तो रात को बहोरीबंद में होते हैं। बहोरीबंद के करीब 80 गांवों का केंद्र कहे जाने वाले बाकल में भी उनकी सभा में भीड़ जुटती है। जब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रेय देते हुए भारत की अस्मिता और राष्ट्रवाद की बातें करते हैं तो ताली बजती है। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक से पाकिस्तान और आतंकवादी कैंप पर बम गिराने की बात पर तो खूब तालियां मिलती हैं। यहीं एक स्थानीय पत्रकार वीडी से सवाल करता है कि भाजपा ने अभी तक बाहरी उम्मीदवार ही दिए, जो चुनाव जीतने के बाद फिर नहीं आते। विष्णुदत्त का जवाब सुनिए- मैं इतना यहां रहूंगा कि आप ही कहने लगेंगे कभी कहीं जाते क्यों नहीं हैं। खुद को बाहरी कहने पर वे इस क्षेत्र से अपने जुड़ाव के सबूत देने लगते हैं। दो दशक में इस क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में अपनी मौजूदगी और यहां के लिए छात्रों के संगठन बतौर किए गए कार्य उनकी वो थाती है, जिसका जवाब सवाल पूछने वाले के पास भी नहीं होता। विष्णुदत्त शर्मा को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राजनगर की जनसभा में भविष्य का बड़ा नेता यूंही नहीं बताया था, उन्हें मिल रहा भाजपा कार्यकर्ताओं का समर्थन साबित करता है कि प्रदेश भाजपा के महामंत्री के तौर पर वे अभी भी इतने बड़े नेता है कि विधायक रह चुके नेता भी उनसे सीधे तौर पर कुछ कहने में संकोच करते हैं। पार्टी के भीतर की गुटबाजी की शिकायत लोग इसीलिए उनसे करने में परहेज कर रहे हैं।
दूसरी तरफ कविता सिंह के लिए उनकी कांग्रेस की टीम और पति विक्रम सिंह नाती राजा को मिलने वाला जनसमर्थन है। राजनगर के साथ अमानगंज में उनका पलड़ा भारी बताया जाता है। पन्ना में भी उन्हें अच्छा रिस्पांस होने की बात कही जा रही है। कटनी जिले के विधानसभा क्षेत्रों में वीडी का पलड़ा भारी दिखता है। विजयराघवगढ़ के भाजपा विधायक संजय पाठक कहते हैं- कटनी से एकरफा लीड मिलेगी, बहोरीबंद में भाजपा प्रत्याशी के आगे रहने का दावा वहां हाट-बाजार के लोग भी करते हैं, लेकिन इसी बीच बहोरीबंद से दो बार विधायक रहे नीशीथ पटेल की कांग्रेस में वापसी समीकरण बदलने का कांग्रेसी जतन क्या गुल खिलाएगा, अभी कहा नहीं जा सकता।
सपा उम्मीदवार वीर सिंह अखिलेश यादव के साथ
इस क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवार वीर सिंह भी हैं, जिन्हें बहुजन समाज पार्टी का समर्थन हासिल है। सवर्णों के आंदोलन का असर तो यहां नहीं दिखता, लेकिन ओबीसी को एकजुट करने के प्रयास चल रहे हैं। इनकी काट के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों जुट गए हैं। भाजपा से तो पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री उमा भारती वीडी के लिए तीन-चार सभाएं लेने आने वाली हैं।
बहरहाल खजूर के जंगल की वजह से खजुराहो नाम पाने वाले विश्व धरोहर वाले इस क्षेत्र में सैलानियों की गाडिय़ों से ज्यादा यदि किसी की आमदरफ्त है तो वह है प्रचार वाहनों की। गांवों में एलईडी वाले रथ घूम रहे हैं तो चोंगे लगे वाहन भी और बुंदेलखंड का परंपरागत दीवार लेखन तो है ही। खजुराहो के पुराने नतीजे भाजपा की तरफ इसके झुकाव और बाहरी पर भरोसे की गवाही देते हैं। इस बार मुकाबला बेटी-बहू और बाहरी का है। वो बाहरी जो क्षेत्रवासियों को कहीं से भी बाहरी नहीं लगता है।


Monday, March 18, 2019

चौकीदार-चौकीदार भाई-भाई...!


ऊ शाब हम छुट्टी पर जा रहा हूं...ये मेरा भाई अब आएगा...। आमतौर पर महीने में एक बार बख्शीश लेने के लिए दिन में आने वाले मोहल्ले के चौकीदार ने एक बार फिर उजाले में आकर अपना गुजारिश भरा फरमान सुनाया और दस रुपये के नोट के साथ सलाम ठोक कर चला गया। चौकीदार....रोज रात में सीटी बजाता और लट्ठ जमीन पर पटक कर अपनी आमद का अहसास कराने वाला चौकीदार कब बदल गया... इसका खुलासा दो-चार महीने बाद हुआ, जब पुराना चौकीदार लौट कर नहीं आया और नए ने उसकी जगह स्वयं को स्थापित कर लिया। क्या देश को चलाने वाले राजनीतिक चौकीदार भी ऐसे ही बदलते हैं?
‘चौकीदार चोर है’, ‘मैं भी चौकीदार’, ‘चौकीदार फिर से’...जैसे ट्विटर और इंस्टाग्राम आदि सोशल प्लेटफार्म पर चल रहे ‘चौकीदार’ कैंपेन के बीच मोहल्ले का चौकीदार बार-बार फ्लैशबैक में घूम रहा है। दुबला पतला लेकिन तना हुआ। रात में साइकिल तो दिन में पैदल घूमता। गोरखा टोपी और कमर में लटकती खुखरी के साथ चौकीदार होने का ‘आधार कार्ड’ दिखाते उस आदमी का नाम पूछने की जरुरत कभी नहीं पड़ी। शहर बदला या फिर मोहल्ला...चौकीदार रात में सीटी की गूंज के साथ अपने होने का अहसास कराता रहा। स्कूल के दिनों में चौकीदार ही वो अलार्म घड़ी था जो मुंह अंधेरे चार बजे उठाने का काम करता था। परीक्षा की तैयारी शुरू करने के साथ सबसे पहले चौकीदार को ही ताकीद किया जाता था- सुबह इतने बजे जगा देना। मजाल है जो टाइम इधर से उधर हो जाए। जब तक कमरे की रोशनी खिड़की से बाहर नहीं दिखती, वो घर के सामने ही लट्ठ पटकता ‘जागते रहो’ की गूंज लगाता रहता। उठने के संकेत मिलते ही फिर अपने रुटीन पर गायब होने वाला चौकीदार पंद्रह मिनट या आधे घंटे बाद फिर फेरी लगा कर पक्का कर लेता था कि लाइट जला कर हम दोबारा सो तो नहीं गए। अबकी बार वो तभी लौटता जब खिड़की या रोशनदान से मुंह दिखाई के साथ दो-चार बातें न हो जाएं।
वो चौकीदार चोर है....! यह शक का कीड़ा उसी समय कुलबुलाता जब मोहल्ले के किसी सूने घर में चोरी हो जाए और आस-पड़ोस के लोग कहें कि रात में सीटी नहीं सुनाई दी। कोई कहता, साढ़े 12 बजे पहला फेरा लगाने के बाद से उसकी आवाज नहीं आई। किसी को तीन बजे उसके घर के पास आहट मिली थी। इतनी गवाहियों के बावजूद उसका घर या नाम लोगों को मालूम नहीं होता। पुलिस भी सबसे पहले चौकीदार को ही थाने में बिठा कर रखती, कई बार उसकी पुलिसिया आव-भगत भी होती थी। लेकिन वो अपनी बेगुनाही गिनाते हुए फिर चौकीदारी करता रहता। पुलिस की डायल 100 के रात में बजते हूटर और मोटरसाइकिल पर देर रात घर के सामने से गुजरते हवलदारों की तेज आवाज में  आपसी ‘श्लील’ बातचीत के बीच चौकीदार की सीटी कब बजना बंद हो गई पता ही नहीं चला। अब कोई उसे महीने की तीस रातों के जागरण के दस रुपये नहीं देना चाहता। चौकीदार भी अपना मेहनताना बढ़ाने लगा तो अगली बार ले जाना की झिड़की के साथ उसकी लाठी की धमक ही मोहल्ले से विलुप्त हो गई। रही सही कसर, घर में पाले जाने वाले विदेशी नस्ल के कुत्तों और सीसीटीवी कैमरों ने पूरी कर दी। जब घर-घर चौकीदार बैठा है तो बाहरी चौकीदार को पैसे देने की क्या जरूरत?
 लेकिन ये क्या? साल 2014 से चौकीदार नई भूमिका में आ गया है। ऐसा आया कि अब देश का प्रधानमंत्री जोर-जोर से खुद को चौकीदार बता रहा है। उसने सत्ता से जिन्हें बेदखल किया, वो तमाम लोग दोबारा सिंहासन बत्तीसी अर्जित करने के लिए चौकीदार को चोर बता रहे हैं। चौकीदार भी बदल गया है, वो ‘जी शाब’ वाला नहीं है। वो जो सरेआम धमकियां देता है। हुंकार लगाता है। अब सवाल यह है कि सत्ता चलाने वाला चौकीदार होता है तो उससे पहले के सभी नेता भी चौकीदार ही हुए। वार्ड का पार्षद हो, क्षेत्र का विधायक या फिर सांसद ये भी चौकीदार ही हैं। जब इतने चौकीदार भरे पड़े हैं, फिर क्यों जनता के हक और सरकार के खजाने से चोरी हो रही है? क्यों बोफोर्स से लेकर राफेल विमान खरीदी में और पाताल से लेकर आकाश तक चोरी के आरोप इन्हीं चौकीदारों पर लगते हैं? चुनाव लड़ते समय चौकीदार साइकिल की कीमत वाली जिस खटारा कार को अपनी बताते हैं, उसमें मोहल्ले के चौकीदार की तरह वे कभी  सवारी करते क्यों नहीं दिखते? राजनीतिक चौकीदारों के पास लग्जरी गाड़ियां कहां से आती हैं? सरकारी तौर पर मिलने वाली उनकी हवाई यात्रा से कई गुना ज्यादा यात्राएं वे बिजनेस क्लास में कैसे कर लेते हैं?
लौटें फ्लैशबैक में....मोहल्ले का चौकीदार जब गांव जाता था तो जिसे अपना भाई बता कर चौकीदारी सौंपता था उससे अपनी टेरेटरी वापस लेने लौटता नहीं था। कई बार तो पुराना चौकीदार नई बनी कॉलोनी में अपनी नई चौकीदारी जमाते दिख जाता। लगता था जैसे काशी और प्रयागराज के पंडों की तरह उसने भी अपने यजमान दूसरे को सौंप दिए हों। यदि नए चौकीदार के एरिया में चोरी हो जाए और शक उसी पर हो तब पुराना चौकीदार बिरादर के निर्दोष होने का भरोसा दिलाने घर-घर फेरे लगाता दिखता था। मजाल है कि कभी किसी चौकीदार ने अपनी बिरादरी के किसी दूसरे चौकीदार पर चोर होने की तोहमत लगाई हो। लगाता भी क्यों, यह उसके पेशे और पीढियों से कमाई गई ईमानदारी की दौलत का सवाल जो था। भरोसे की इसी फसल के दम पर कई दशकों से वो लोग दूर देश से आकर यहां गुजर-बसर करते हुए अपने परिवार के लालन-पालन का प्रबंध कर रहे थे। उन्हीं की तरह भरोसा  देश की जनता ने राजनीतिक चौकीदारों पर किया। हर पांच साल में किया। फिर क्यों आज के नए चौकीदार अपनी ही बिरादरी वाले को चोर की नजर से देखते हैं? किस पर एतबार करें और किस पर न करें! आज वाला चौकीदार पुराने को चोर कह रहा है और पुराना नए को। कहीं ऐसा न हो जाए कि लोगों का पूरी चौकीदार बिरादरी से ही भरोसा उठ जाए और ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की जगह देश में नया मुहावरा सुनने मिलने लगे ‘चौकीदार-चौकीदार मौसेरे भाई।‘


Wednesday, January 23, 2019

व्हाट्स हैपनिंग....शिवराज जी!


सरकार गई तो फिर ये भावांतर और बैसाखी राग क्यों ?


'मध्यप्रदेश में कुछ अजीब हुआ। वोट शेयर भाजपा का ज्यादा रहा, हालांकि कांग्रेस की कुछ सीटें ज्यादा आईं और फिर एक मजबूर और लंगड़ी सरकार बना ली गई। सरकार हम भी बना सकते थे, लेकिन हमने फैसला किया कि शानदार बहुमत से सरकार बनाएंगे, ऐसी मजबूर सरकार नहीं।'
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में इतवार को युवा संकल्प रैली में यह शिवराज

सिंह चौहान का संबोधन था। संबोधन कहें कि पीड़ा अथवा टीस! हो सकता है कि 13 साल के मुख्यमंत्री की कुर्सी का हैंगओवर उन्हें बार-बार ऐसे बयान देने पर विवश कर रहा हो।

जो भी हो अब पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके शिवराज विरोधी दल यानी सत्तारुढ़ कांग्रेस पर जितने हमलावर हैं, उससे कुछ कम प्रहार उनके अपने दल पर भी नहीं हैं। यह भी हो सकता है कि आज भी वे यही भ्रम पाले हों कि मध्यप्रदेश भाजपा में वे ही एकमात्र सर्वमान्य नेता हैं। उनके बोल पर पार्टी बोलेगी और उनकी चाल ही चलेगी। शायद यही विश्वास उन्हें उस राह चला रहा है, जिस मार्ग वे चलते दिखते हैं।
क्यों ना, चौहान साहब कपिल देव या गावस्कर की तरह बड़ा दिल दिखा कर कहें कि मध्यप्रदेश की पिच पर उन्होंने वो रिकॉर्ड कायम किया है जिसे कोई और नहीं तोड़ सकता। अब नए खिलाड़ियों को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन राजनीति भी आज का क्रिकेट हो गई है। पॉवर, पैसा और ग्लैमर इतना ज्यादा है कि कोई दूसरे के लिए जगह छोड़ना ही नहीं चाहता। अब देखो ना! शिवराज के मध्यप्रदेश न छोड़ने के ऐलान को अनसुना कर केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। यहां भाजपा विधायक दल का नेतृत्व करने का जिम्मा अनुभवी विधायक और लगातार 15 साल मंत्री रहे गोपाल भार्गव को सौंपा। अब असली विपक्ष का नेता कौन? प्रतियोगिता चल रही है। पंद्रहवीं विधानसभा के शुरूआती सत्र में यह साफ-साफ दिखी। जब पूर्व मुख्यमंत्री नए नेता प्रतिपक्ष को ओव्हरलेप करते दिखे, यहां तक कि सदन में विपक्ष की पहले नंबर की कुर्सी पर भी वे आसीन रहे। यह खींचतान अभी भी दिख रही है। शिवराज और गोपाल भार्गव में ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ का खेल चल रहा है। कमलनाथ सरकार को घेरने दोनों समानांतर बयानबाजी कर रहे हैं। गेहूं के समर्थन मूल्य को लेकर दोनों की ‘अपनी ढपली अपना राग’ है।
शिवराज ने एक कदम आगे बढ़ कर उस भावांतर भुगतान योजना को बंद न करने के लिए कमलनाथ को चिट्ठी लिख डाली, जिससे उनकी पार्टी ही सहमत नहीं थी। विधानसभा चुनाव की अपनी शताधिक सभाओं में शिवराज ने शायद ही कहीं भावांतर का जरा सा भी जिक्र किया हो। अंदर की खबर थी कि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पार्टी ने ही इस योजना का गुणगान करने से उन्हें रोका था, क्योंकि भावांतर से वोट के बाजार में भाजपा का भाव गिरने का अंदेशा था। भाजपा उस योजना के क्या लाभ गिनाती, जिससे तत्कालीन मुख्यमंत्री खुद अपनी पार्टी को सहमत नहीं कर पाए थे। इसे फायदे का सौदा बताने के लिए कृषि विभाग के उन्हीं प्रमुख सचिव राजेश राजौरा को दीनदयाल परिसर में भाजपा की बैठक में प्रजेंटेशन देना पड़ा था, जिनकी सलाह पर कमलनाथ सरकार इससे पल्ला झाड़ने की तैयारी कर रही है। शिवराज का राग भावांतर क्या फिर से उन्हें उसी मुकाम पर पहुंचा सकता है, जिसकी तमन्ना है। लोकसभा चुनाव की मजबूरी में फिलहाल तो नए नवेले कृषि मंत्री सचिव यादव को इस योजना पर अपना स्टैण्ड बदलना पड़ा और इससे शिवराज सिंह का सीना 56 इंच का हो रहा है, लेकिन भावांतर से किसान खुश थे तो वे शिव-राज में इसके खिलाफ क्यों थे?
जहां तक मजबूर सरकार की जगह मजबूत सरकार देने की उनकी मंशा है तो फिर क्यों भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष के चुनाव तक शक्ति परीक्षण की मांग की थी और सरे बाजार अपनी भद्द पिटवाई थी। लंगड़ी सरकार की बैसाखी उनके पास है तो व्यापक प्रदेश हित में क्यों उसे घर में रख कर चुप बैठे हैं? सच यह है कि बैसाखी ही नहीं सहारे की एक लाठी भी भाजपा से अभी दूर है। ट्विटर के जिस ‘व्हाट्स हैपनिंग’ शब्द पर चौहान जोर दे रहे हैं क्या वही शब्द उनसे नहीं पूछ रहा है कि व्हाट्स हैपनिंग....ये क्या हो रहा है...! तेरह साल पहले ‘चूको मत चौहान’ कह कर शिवराज को दिशा दिखाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा भी अब नहीं हैं, जो कह सकें ‘सब्र करो चौहान’। अब तो खुद शिवराज को देखना होगा वे किस ट्रैक पर हैं और उनके साथ रेस में कौन-कौन है।

                                                                                                ( दैनिक सच एक्सप्रेस का स्तंभ-अनकही)

Thursday, January 17, 2019

यूंही ‘किसान-नाथ’ नहीं बने कमलनाथ


आवरण बदलने का यह खेल अनूठा है। सालों लग जाते हैं लोगों को अपनी एक इमेज बनाने में और बदलने में। महज दो घंटे में कोई अचानक उद्योगपति से किसान बन जाए...! यह कमाल किया है कमलनाथ ने। चालीस साल के अपने राजनीतिक जीवन में कमलनाथ की पहचान उनका बड़ा उद्योगपति होना ही रही है। डेढ़ माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 13 साल के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर भाजपा का छोटा-मोटा प्रवक्ता तक उन्हें इंडस्ट्रलिस्ट ही बोलता था। कांग्रेस में भी अपने प्रदेशाध्यक्ष के निर्विवाद उद्योगपति होने का गर्व करने वालों की कमी नहीं रही। लेकिन यह क्या....वक्त बदला, सरकार बदली तो पहचान भी बदल गई है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ की असली पहचान है उनका राजनीतिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता और किसान होना। उनके परिवार के कई उद्योग हैं, लेकिन वह पहले ही कह चुके हैं कि उनकी इनमें से किसी में भी भागीदारी नहीं है। इसीलिए उनके बायोडाटा में उद्योगों का जिक्र नहीं हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर उनका जो परिचय दिया गया है वह है- राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान। वैसा किसान नहीं जो खुद के किसान होने का ढिंढोरा पीटता हो। कमलनाथ का वास्ता खेती-किसानी से है तो खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसानों से उनका जोड़ ऐसा बैठा कि खुद को किसान पुत्र बताने वाले शिवराज को एक बार फिर खेतों की दौड़ लगानी पड़ी है। कमलनाथ दावा नहीं करते कि उन्होंने कभी हल चलाया है या बैलगाड़ी हांकी है, लेकिन उन्होंने कल तक शिवराज के कान में कर्जमाफी के खिलाफ मंत्र फूंकने वाली नौकरशाही को ऐसा हांका  है कि उनके मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले कर्जमाफी का ब्ल्यूप्रिंट तैयार हो गया था। नाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सीं संभाली तो पहला आदेश किसानों के कर्जे माफ करने का ही निकाला। इसमें समय लगा महज डेढ़ घंटा, क्योंकि शपथग्रहण स्थल से मंत्रालय तक आने और चार्ज लेने में इतना समय जो लगना था। किसानों को राहत देने का यह वादा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किया था और उसे पूरा करना कमलनाथ और उनकी पार्टी का प्रथम लक्ष्य था। मंशा मजबूत थी तो अफसरशाही का कोई भी अड़ंगा आड़े नहीं आया। अब एक माह पूरा होने से पहले किसानों को ऋणमुक्त करने की प्रक्रिया शुरू हो गई। वह भी किसानों के नाम पर।
‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना’। यह नाम दिया है कमलनाथ ने इस योजना का। कहीं मुख्यमंत्री या अपना नाम नहीं। मीडिया से लेकर किसानों तक ने देखा कि जो कार्यक्रम हो रहा था उसके बैकड्रॉप पर मुख्यमंत्री फसल ऋण माफी योजना की लांचिंग की जानकारी दी गई थी। प्रचार भी यही हुआ था, लेकिन मंच पर आते ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री की जगह ‘जय किसान’ शब्द करा कर ‘तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा’ को चरितार्थ कर दिया। प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद यह बड़े बदलाव का आगाज है। पिछली सरकार में हर काम मुख्यमंत्री का नाम जोड़ कर होता था। कोई भी योजना मुख्यमंत्री की ब्रांडिंग का ध्यान रखे बिना नहीं बनती थी। ध्यान रखना ही पड़ता था, क्योंकि इन्हीं योजनाओं के दम पर शिवराज सरकार की वापसी का भ्रम पाला गया था। कमलनाथ ने एक झटके में ऐसे सारे भ्रमजाल हटा दिए। जिनके लिए काम हो रहा है, वो उनके ही नाम हो और उन्हें ही समर्पित किया जाए।
तो, आवरण बदलना। चरित्र परिवर्तन कैसे? कर्जमाफी का यह एक वरदान विपक्ष के तमाम आरोपों को भोथरा कर रहा है। कमलनाथ आज प्रदेश के सबसे सच्चे किसान साबित हो गए हैं। सरकार के खाली खजाने के बावजूद वे प्रदेश के 55 लाख किसानों को 50 हजार करोड़ रुपए की राहत देंगे। भावांतर भुगतान से लेकर शिवराज की तमाम योजनाओं में साल भर में बांटी गई 32 हजार करोड़ रुपए की रकम से यह राहत कहीं ज्यादा है और सिंगल शॉट डिलीवरी है। नई सरकार की यह उपलब्धि है कि उसके आते ही भारतीय किसान संघ से लेकर गन्ना उत्पादकों तक ने आंदोलन की भूमिका बनाई...भोपाल की राह पकड़ी, लेकिन उनके विरोध को वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा ‘किसान पुत्र’ की सरकार के दौरान मिलता था। बदलाव का यह अध्याय बता रहा है कि कमलनाथ भले ही खुद के किसान होने की ब्रांडिंग करने से बचते रहे हों, लेकिन किसान का दर्द दूर करने की दवा की समझ उन्हें किसी और से ज्यादा है। शायद यही वजह है कि आज प्रदेश में किसानों के पुराने सभी नेता अपनी पहचान के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं और छिंदवाड़ा के नाथ ‘किसान-नाथ’ बन गए हैं। एक सच यह भी है कि अन्नदाता की ऋणग्रस्तता की यह बीमारी फौरी उपचार से ज्यादा स्थाई निदान मांगती है। ‘किसान-नाथ’ की चिरकालीन पहचान कायम करनी है तो बीमारी को जड़ से मिटाना होगा। वातावरण ऐसा बनाना होगा कि कोई भी किसान कर्जे के फेर में पड़े ही नहीं।  

                                                                                                ( दैनिक सच एक्सप्रेस का कॉलम- अनकही )

अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसक...