Wednesday, January 23, 2019

व्हाट्स हैपनिंग....शिवराज जी!


सरकार गई तो फिर ये भावांतर और बैसाखी राग क्यों ?


'मध्यप्रदेश में कुछ अजीब हुआ। वोट शेयर भाजपा का ज्यादा रहा, हालांकि कांग्रेस की कुछ सीटें ज्यादा आईं और फिर एक मजबूर और लंगड़ी सरकार बना ली गई। सरकार हम भी बना सकते थे, लेकिन हमने फैसला किया कि शानदार बहुमत से सरकार बनाएंगे, ऐसी मजबूर सरकार नहीं।'
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में इतवार को युवा संकल्प रैली में यह शिवराज

सिंह चौहान का संबोधन था। संबोधन कहें कि पीड़ा अथवा टीस! हो सकता है कि 13 साल के मुख्यमंत्री की कुर्सी का हैंगओवर उन्हें बार-बार ऐसे बयान देने पर विवश कर रहा हो।

जो भी हो अब पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके शिवराज विरोधी दल यानी सत्तारुढ़ कांग्रेस पर जितने हमलावर हैं, उससे कुछ कम प्रहार उनके अपने दल पर भी नहीं हैं। यह भी हो सकता है कि आज भी वे यही भ्रम पाले हों कि मध्यप्रदेश भाजपा में वे ही एकमात्र सर्वमान्य नेता हैं। उनके बोल पर पार्टी बोलेगी और उनकी चाल ही चलेगी। शायद यही विश्वास उन्हें उस राह चला रहा है, जिस मार्ग वे चलते दिखते हैं।
क्यों ना, चौहान साहब कपिल देव या गावस्कर की तरह बड़ा दिल दिखा कर कहें कि मध्यप्रदेश की पिच पर उन्होंने वो रिकॉर्ड कायम किया है जिसे कोई और नहीं तोड़ सकता। अब नए खिलाड़ियों को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन राजनीति भी आज का क्रिकेट हो गई है। पॉवर, पैसा और ग्लैमर इतना ज्यादा है कि कोई दूसरे के लिए जगह छोड़ना ही नहीं चाहता। अब देखो ना! शिवराज के मध्यप्रदेश न छोड़ने के ऐलान को अनसुना कर केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। यहां भाजपा विधायक दल का नेतृत्व करने का जिम्मा अनुभवी विधायक और लगातार 15 साल मंत्री रहे गोपाल भार्गव को सौंपा। अब असली विपक्ष का नेता कौन? प्रतियोगिता चल रही है। पंद्रहवीं विधानसभा के शुरूआती सत्र में यह साफ-साफ दिखी। जब पूर्व मुख्यमंत्री नए नेता प्रतिपक्ष को ओव्हरलेप करते दिखे, यहां तक कि सदन में विपक्ष की पहले नंबर की कुर्सी पर भी वे आसीन रहे। यह खींचतान अभी भी दिख रही है। शिवराज और गोपाल भार्गव में ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात’ का खेल चल रहा है। कमलनाथ सरकार को घेरने दोनों समानांतर बयानबाजी कर रहे हैं। गेहूं के समर्थन मूल्य को लेकर दोनों की ‘अपनी ढपली अपना राग’ है।
शिवराज ने एक कदम आगे बढ़ कर उस भावांतर भुगतान योजना को बंद न करने के लिए कमलनाथ को चिट्ठी लिख डाली, जिससे उनकी पार्टी ही सहमत नहीं थी। विधानसभा चुनाव की अपनी शताधिक सभाओं में शिवराज ने शायद ही कहीं भावांतर का जरा सा भी जिक्र किया हो। अंदर की खबर थी कि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर पार्टी ने ही इस योजना का गुणगान करने से उन्हें रोका था, क्योंकि भावांतर से वोट के बाजार में भाजपा का भाव गिरने का अंदेशा था। भाजपा उस योजना के क्या लाभ गिनाती, जिससे तत्कालीन मुख्यमंत्री खुद अपनी पार्टी को सहमत नहीं कर पाए थे। इसे फायदे का सौदा बताने के लिए कृषि विभाग के उन्हीं प्रमुख सचिव राजेश राजौरा को दीनदयाल परिसर में भाजपा की बैठक में प्रजेंटेशन देना पड़ा था, जिनकी सलाह पर कमलनाथ सरकार इससे पल्ला झाड़ने की तैयारी कर रही है। शिवराज का राग भावांतर क्या फिर से उन्हें उसी मुकाम पर पहुंचा सकता है, जिसकी तमन्ना है। लोकसभा चुनाव की मजबूरी में फिलहाल तो नए नवेले कृषि मंत्री सचिव यादव को इस योजना पर अपना स्टैण्ड बदलना पड़ा और इससे शिवराज सिंह का सीना 56 इंच का हो रहा है, लेकिन भावांतर से किसान खुश थे तो वे शिव-राज में इसके खिलाफ क्यों थे?
जहां तक मजबूर सरकार की जगह मजबूत सरकार देने की उनकी मंशा है तो फिर क्यों भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष के चुनाव तक शक्ति परीक्षण की मांग की थी और सरे बाजार अपनी भद्द पिटवाई थी। लंगड़ी सरकार की बैसाखी उनके पास है तो व्यापक प्रदेश हित में क्यों उसे घर में रख कर चुप बैठे हैं? सच यह है कि बैसाखी ही नहीं सहारे की एक लाठी भी भाजपा से अभी दूर है। ट्विटर के जिस ‘व्हाट्स हैपनिंग’ शब्द पर चौहान जोर दे रहे हैं क्या वही शब्द उनसे नहीं पूछ रहा है कि व्हाट्स हैपनिंग....ये क्या हो रहा है...! तेरह साल पहले ‘चूको मत चौहान’ कह कर शिवराज को दिशा दिखाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा भी अब नहीं हैं, जो कह सकें ‘सब्र करो चौहान’। अब तो खुद शिवराज को देखना होगा वे किस ट्रैक पर हैं और उनके साथ रेस में कौन-कौन है।

                                                                                                ( दैनिक सच एक्सप्रेस का स्तंभ-अनकही)

Thursday, January 17, 2019

यूंही ‘किसान-नाथ’ नहीं बने कमलनाथ


आवरण बदलने का यह खेल अनूठा है। सालों लग जाते हैं लोगों को अपनी एक इमेज बनाने में और बदलने में। महज दो घंटे में कोई अचानक उद्योगपति से किसान बन जाए...! यह कमाल किया है कमलनाथ ने। चालीस साल के अपने राजनीतिक जीवन में कमलनाथ की पहचान उनका बड़ा उद्योगपति होना ही रही है। डेढ़ माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 13 साल के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर भाजपा का छोटा-मोटा प्रवक्ता तक उन्हें इंडस्ट्रलिस्ट ही बोलता था। कांग्रेस में भी अपने प्रदेशाध्यक्ष के निर्विवाद उद्योगपति होने का गर्व करने वालों की कमी नहीं रही। लेकिन यह क्या....वक्त बदला, सरकार बदली तो पहचान भी बदल गई है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ की असली पहचान है उनका राजनीतिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता और किसान होना। उनके परिवार के कई उद्योग हैं, लेकिन वह पहले ही कह चुके हैं कि उनकी इनमें से किसी में भी भागीदारी नहीं है। इसीलिए उनके बायोडाटा में उद्योगों का जिक्र नहीं हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर उनका जो परिचय दिया गया है वह है- राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान। वैसा किसान नहीं जो खुद के किसान होने का ढिंढोरा पीटता हो। कमलनाथ का वास्ता खेती-किसानी से है तो खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसानों से उनका जोड़ ऐसा बैठा कि खुद को किसान पुत्र बताने वाले शिवराज को एक बार फिर खेतों की दौड़ लगानी पड़ी है। कमलनाथ दावा नहीं करते कि उन्होंने कभी हल चलाया है या बैलगाड़ी हांकी है, लेकिन उन्होंने कल तक शिवराज के कान में कर्जमाफी के खिलाफ मंत्र फूंकने वाली नौकरशाही को ऐसा हांका  है कि उनके मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले कर्जमाफी का ब्ल्यूप्रिंट तैयार हो गया था। नाथ ने प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सीं संभाली तो पहला आदेश किसानों के कर्जे माफ करने का ही निकाला। इसमें समय लगा महज डेढ़ घंटा, क्योंकि शपथग्रहण स्थल से मंत्रालय तक आने और चार्ज लेने में इतना समय जो लगना था। किसानों को राहत देने का यह वादा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किया था और उसे पूरा करना कमलनाथ और उनकी पार्टी का प्रथम लक्ष्य था। मंशा मजबूत थी तो अफसरशाही का कोई भी अड़ंगा आड़े नहीं आया। अब एक माह पूरा होने से पहले किसानों को ऋणमुक्त करने की प्रक्रिया शुरू हो गई। वह भी किसानों के नाम पर।
‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना’। यह नाम दिया है कमलनाथ ने इस योजना का। कहीं मुख्यमंत्री या अपना नाम नहीं। मीडिया से लेकर किसानों तक ने देखा कि जो कार्यक्रम हो रहा था उसके बैकड्रॉप पर मुख्यमंत्री फसल ऋण माफी योजना की लांचिंग की जानकारी दी गई थी। प्रचार भी यही हुआ था, लेकिन मंच पर आते ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री की जगह ‘जय किसान’ शब्द करा कर ‘तेरा तुझ को अर्पण क्या लागे मेरा’ को चरितार्थ कर दिया। प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद यह बड़े बदलाव का आगाज है। पिछली सरकार में हर काम मुख्यमंत्री का नाम जोड़ कर होता था। कोई भी योजना मुख्यमंत्री की ब्रांडिंग का ध्यान रखे बिना नहीं बनती थी। ध्यान रखना ही पड़ता था, क्योंकि इन्हीं योजनाओं के दम पर शिवराज सरकार की वापसी का भ्रम पाला गया था। कमलनाथ ने एक झटके में ऐसे सारे भ्रमजाल हटा दिए। जिनके लिए काम हो रहा है, वो उनके ही नाम हो और उन्हें ही समर्पित किया जाए।
तो, आवरण बदलना। चरित्र परिवर्तन कैसे? कर्जमाफी का यह एक वरदान विपक्ष के तमाम आरोपों को भोथरा कर रहा है। कमलनाथ आज प्रदेश के सबसे सच्चे किसान साबित हो गए हैं। सरकार के खाली खजाने के बावजूद वे प्रदेश के 55 लाख किसानों को 50 हजार करोड़ रुपए की राहत देंगे। भावांतर भुगतान से लेकर शिवराज की तमाम योजनाओं में साल भर में बांटी गई 32 हजार करोड़ रुपए की रकम से यह राहत कहीं ज्यादा है और सिंगल शॉट डिलीवरी है। नई सरकार की यह उपलब्धि है कि उसके आते ही भारतीय किसान संघ से लेकर गन्ना उत्पादकों तक ने आंदोलन की भूमिका बनाई...भोपाल की राह पकड़ी, लेकिन उनके विरोध को वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा ‘किसान पुत्र’ की सरकार के दौरान मिलता था। बदलाव का यह अध्याय बता रहा है कि कमलनाथ भले ही खुद के किसान होने की ब्रांडिंग करने से बचते रहे हों, लेकिन किसान का दर्द दूर करने की दवा की समझ उन्हें किसी और से ज्यादा है। शायद यही वजह है कि आज प्रदेश में किसानों के पुराने सभी नेता अपनी पहचान के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं और छिंदवाड़ा के नाथ ‘किसान-नाथ’ बन गए हैं। एक सच यह भी है कि अन्नदाता की ऋणग्रस्तता की यह बीमारी फौरी उपचार से ज्यादा स्थाई निदान मांगती है। ‘किसान-नाथ’ की चिरकालीन पहचान कायम करनी है तो बीमारी को जड़ से मिटाना होगा। वातावरण ऐसा बनाना होगा कि कोई भी किसान कर्जे के फेर में पड़े ही नहीं।  

                                                                                                ( दैनिक सच एक्सप्रेस का कॉलम- अनकही )

Tuesday, January 15, 2019

सरकार! वक्त बदला पर चाल तो वैसी ही है....


माहौल ठीक वैसा ही है जैसा 15 साल पहले की मकर संक्रांति पर था। सरकार बिल्कुल वैसी ही चल रही है जैसी जनवरी 2004 में थी। फर्क बस इतना है कि तब तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती बेहद उत्साही थीं, अबकी बार के मुख्यमंत्री कमलनाथ शांत प्रवृत्ति के हैं। कमलनाथ के मंत्री वैसे ही अपना विभाग और सरकार चला रहे हैं, जैसा उस समय के नए नवेले मंत्री कर रहे थे। तो बदला क्या है इन पंद्रह बरसों में? बदली है सरकार और सरकार चलाने वाले नेता। सरकार की असली धुरी प्रशासन तो जस का तस है।
दिसंबर 2003 में तब उमा भारती के नेतृत्व में दस साल की दिग्विजय सिंह सरकार को उखाड़कर भाजपा सत्ता में आई थी। दिग्गी राज के कुशासन को कोसते हुए वह सरकार बनी थी, तो आनन-फानन में पिछली सरकार की नीतियों और योजनाओं को बदलने के लिए उमा के मंत्री खासे उतावले थे। उस सरकार के घपले-घोटालों की पोल-पट्टी खोलने के लिए फाइलें खंगाली जा रही थीं। अफसरों की लिस्ट रख कर पोस्टिंग हो रही थी कि कौन कांग्रेसी मानसिकता का है, कौन न्यूट्रल और कौन विचारधारा से जुड़ा हुआ। इस कवायद का असर यह हुआ कि कई बड़े अफसर भी खाकी निकर पहन कर सुबह की सैर पर जाने लगे थे। पंद्रह साल बाद समय बदला को अब अफसरों की खाकी पतलून संदूक के हवाले हो गई और ब्रांडेड ट्रेक सूट में जॉगिंग होने लगी है। हो भी क्यों ना! आज भी तो इतिहास वही दोहराया जा रहा है। अफसरों की कुंडली देखी जा रही है कि वो संघी तो नहीं हैं। संघी निकले तो पशुपालन जैसा महकमा  उनकी बाट जोह ही रहा है।

 शिव-राज के कुशासन, अवैध उत्खनन और घोटालों को सामने रख कर बनी कमलनाथ सरकार की यह उपलब्धि है कि उसके 28 मंत्रियों में से 22 को पहली बार सरकार में भागीदारी मिली है, वो भी सीधे कैबिनेट मंत्री के तौर पर। अनुभवशून्यता की वजह से सभी नए मंत्रियों की पहली प्राथमिकता अपने विभाग की पड़ताल बन गई है। अफसरों से पिछली सरकार के दौरान हुए टेंडर, महत्वपूर्ण आदेश-निर्देश मांगे जा रहे हैं। उनका छिद्रान्वेषण किया जा रहा है कि वे कितने निरापद थे। किसी को फायदा पहुंचाने की कोशिश तो नहीं हुई। कांग्रेस का वो वचनपत्र अब किनारे धर दिया गया है, जो मंत्रीपद की शपथ लेते समय गीता-कुरान और बाइबल था।
विभाग मिलते ही मंत्रियों को सबसे पहले पुराने मंत्रियों के पुराने काम याद आ रहे हैं। गड़बड़ियां उजागर करने की उनकी अच्छी मंशा अपनी जगह, लेकिन क्या कोई अफसर खुद के द्वारा पिछली सरकार में किए गए कार्यों का कच्चा-चिट्ठा खोलेगा? खोलेगा तो वह बेदाग कैसे बचा रहेगा? देश के किसी कोने में किसी भी अफसर के साथ हुई घटना पर एकजुट होने वाली ब्यूरोक्रेसी खुद के या अपनी जमात के परखच्चे उड़ाने का सामान मुहैया कराएगी, यह उम्मीद इनसे कैसे की जा सकती है ?  2003 में भी तो यही हुआ था दिग्विजय सिंह सरकार पर हजारों करोड़ के घोटाले के आरोप और उनकी जांच कर दोषियों को सींखचों के पीछे भेजने की हुंकार के साथ बनी उमा सरकार ही नहीं उनके उत्तराधिकारी बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान की सरकार भी पूरे पंद्रह साल में सरकारी भ्रष्टाचार का एक भी पुराना मामला उजागर नहीं कर पाई थी। दिग्गी राजा को एकमात्र जिस मामले में उलझाया गया वो विधानसभा में हुई नियुक्तियों का था। खैर, नई सरकार है और नए मंत्री इसलिए उन्हें हक है कि वो हर उस मामले की तफ्तीश करें, जिसमें जरा से भी भ्रष्टाचार या गड़बड़ी की गुंजाइश हो। कोशिश करने में हर्ज भी क्या है।  कोशिश ऐसी होनी चाहिए कि वास्तविकता में परिवर्तन हो और व्यवस्थाएं सुधरें।
मैग्नीफाइंग ग्लास वाली पड़ताल से फारिग हो जाएं तो वचनपत्र सामने रख कर प्रदेश के विकास और जनहित के कार्यों के लिए भी समय निकालें। नीतियों, कार्यक्रमों और व्यवस्था में परिवर्तन करें तो ऐसा कि बदला नहीं बदलाव दिखे। मुख्यमंत्री कमलनाथ भी तो यही चाहते हैं। ऐसा न हो कि पिछली सरकार ने भी व्यापमं घोटाले के बाद इस संस्था का नाम बदला था और आप भी सिर्फ नाम बदलने के जतन में जुट जाएं। उनके दौर में शुरू होने वाली भर्ती परीक्षा को रोक कर कहीं आप रोजगार देने के अपने वचन के खुद आड़े तो नहीं आ रहे। उचित होगा कि प्रवेश और भर्ती के लिए ऐसी अलग-अलग संस्थाएं बनाएं, जिनमें डॉ. सागर जैसे लोगों के लिए सेंध लगाने की कोई गुंजाइश न रहे।

Sunday, December 30, 2018

मध्यप्रदेश में सरकार से बेदखल होने लगे संघ के दीनदयाल


सरकारी दस्तावेजों से फोटो हटाने के बाद अब दीनदयाल के नाम की योजना बंद

 मध्यप्रदेश के शासकीय कर्मचारियों के आरएसएस की शाखा में जाने पर प्रतिबंध लगाने संबंधी वचन के  साथ सत्ता में आई कांग्रेस ने सरकारी कामकाज से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा नेताओं के लिए पूज्य जससंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय को बेदखल करना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ उद्घोष की तर्ज पर कोई दंभोक्ति करने के बजाए सधे अंदाज में सरकार से भाजपा के वैचारिक अधिष्ठान को तिलांजलि देने की मुहिम छेड़ दी है। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पहला प्रहार दीनदयाल पर ही हुआ है।
कमलनाथ सरकार ने दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर बनी वन विभाग की दीनदयाल वनांचल सेवा योजना को बंद कर दिया है। इसके लिए वित्त विभाग की आपत्ति को कारण बताया गया। यह योजना 2016 में जब बनी और शुरू की गई थी तब कहा गया था कि वन विभाग की अपनी स्कीमों से ही इसके लिए फंड जुटाया जाएगा। पहले साल विभाग ने अपने स्तर पर ही पांच करोड़ से ज्यादा रुपए वनांचल में रहने वाले आदिवासियों की सेवा पर खर्च किए। दूसरे साल के लिए वित्त विभाग से फंड मांग लिया। यह और बात है कि दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर शुरू की गई इस सेवा योजना पर तत्तकालीन वन मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार की स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त धर्मपत्नी डॉ. किरण शेजवार को उपकृत करने के आरोप लगे।
योजना की तथाकथा और इसको लेकर नई सरकार द्वारा कराई जाने वाली जांच पड़ताल अपनी जगह। दीनदयाल वनांचल सेवा योजना को बंद करना कांग्रेस के उस मिशन का पहला कदम है, जो भाजपा की आम जनता में गहरी होती जड़ों को काटने के लिए सत्ता के साथ शुरू हुआ है। दीनदयाल उपाध्याय की घर-घर तक पैठ बनाने के लिए भाजपा और संघ की योजना के तहत सरकारी स्कीमों में उनका नाम जोड़ा गया था। पंद्रह साल की भाजपा सरकार से पहले सत्ता में कभी दीनदयाल उपाध्याय की इस कदर भागीदारी नहीं थी। प्रदेश में ही उनके नाम पर दर्जनों योजनाएं शुरू की गईं। पुरानी योजनाओं का नाम बदल कर उन्हें दीनदयाल मय किया गया। पांच रुपए में भोजन उपलब्ध कराने दीनदयाल रसोई योजना, गांवों में मोबाइल अस्पताल के लिए दीनदयाल चलित चिकित्सालय, दीनदयाल अंत्योदय उपचार योजना आदि-इत्यादि। यहां तक कि दीनदयाल उपाध्याय के जन्म शताब्दी वर्ष 2017 में सभी सरकारी दस्तावेज और वेबसाइट में दीनदयाल का चित्र लगाया गया था। दीनदयाल का लोगो दिसंबर 2018 तक सरकारी लेटरहेड और वेबसाइटों में चमकता रहा। सरकार बदली तो मौखिक आदेश पर उन्हें गायब किया गया। सूत्र बताते हैं कि जल्दी ही दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर चुनावी लाभ लेने के लिए शुरू की गई कई और योजनाओं का पोस्टमार्टम किया जाएगा। जो योजनाएं जरूरी होंगी उन्हें नए नाम के साथ चलाया जाएगा और अनुपयोगी योजनाएं दीनदयाल वनांचल सेवा योजना की गति को प्राप्त होंगी। अपने आराध्य और एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल जी की इस तरह बेदखली भाजपा को खल सकती है। कांग्रेस प्रवक्ता सैय्यद जाफर ने वनांचल योजना की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की बात कही है, वहीं भाजपा को दीनदयाल उपाध्याय का नाम हटाने पर ही एतराज है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं कि दीनदयाल जी के नाम की योजना को बंद करने का आशय है कि समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों की उपेक्षा। भाजपा इसे बर्दाश्त नहीं करेगी और दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर संचालित योजनाओं को बंद करने का विरोध करेगी।      

Monday, November 26, 2018

तो क्या कर्जमाफी बनेगी गले की फांस?


खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे....किसानों की आय को तीन साल में दोगुना करेंगे...किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर कर्ज...ब्याज समाधान योजना...संबल योजना में पांच एकड़ तक जमीन वाले किसान को शामिल करना...आदि, इत्यादि ढेरों किसान हितैषी योजनाओं और घोषणाओं पर क्या कांग्रेस की एक घोषणा कर्जमाफी भारी पड़ गई है? चुनाव प्रचार के अंतिम दो दिनों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भाषण इसकी चुगली कर रहे हैं कि कर्जमाफी का इतना अंडर करंट कहीं न कहीं तो है, जो भाजपा को अब डरा रहा है।
डर का कारण है छत्तीसगढ़ से आती हवा। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भी किसानों का कर्जा दस दिन के भीतर माफ करने और धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया है। इस घोषणा का असर यह हुआ कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी केंद्र तो सजे हुए हैं, लेकिन किसान धान बेचने नहीं आ रहे। उन्हें इंतजार है 11 दिसंबर का, जब चुनाव परिणाम आएंगे। उम्मीद है कि कांग्रेस की सरकार बनी तो वे अपनी धान का ज्यादा दाम अर्जित करेंगे।

पड़ोस के चूल्हे की सुगंध अपने आंगन में महकने जैसा मामला बनता देख भाजपा चौकन्नी हो गई है। फिर यह तो सुगंधित चावल के लिए मशहूर धान के कटोरे से उठी बयार है तो सतर्क होना जरूरी भी है। इसीलिए शिवराज सिंह चौहान ने रविवार से अपने भाषण का टोन और ट्रैक बदल लिया है। अब कांग्रेस द्वारा कर्जमाफी की घोषणा को पंजाब और कर्नाटक के संदर्भ में मजाक बनाने से ज्यादा तवज्जो वे किसानों को भांति-भांति की योजनाओं से कर्जमुक्त करने का भरोसा दिलाने में कर रहे हैं। उन्हें बार-बार याद दिलाना पड़ रहा है कि वे खुद किसान के बेटे हैं और कर्ज का बोझ किसान को किसान को किस हद तक विचलित करता है उसे अच्छी तरह समझते हैं। किसानों को उनके पसीने की भरपूर कीमत दिलाएंगे, जिससे कर्ज का बोझ उन पर कभी नहीं रहेगा। जितना बोनस बड़े किसानों को दिया जा रहा, उतना ही बोनस छोटे किसानों को भी एवरेज के हिसाब से दिया जाएगा। प्रदेश के किसानों को कर्जदार नहीं रहने देंगे। डिफॉल्टर किसान के लिए समाधान योजना के अलावा ऐसे उपाय करेंगे, जिससे वे कर्जमुक्त हो सकें। शिवराज इसके साथ ही यह कहना भी नहीं चूकते कि कांग्रेस ने फूटी कौड़ी तक किसानों को नहीं दी, बोनस दूर की बात है। कांग्रेस अध्यक्ष 10 दिन में यह कर देंगे, वह कर देंगे बोलते हैं, उनसे बोलो चंदा मामा तोड़ कर ले आओ, शायद 10 दिन में दे देंगे। कर्नाटक, पंजाब में एक पैसा किसानों का कर्ज माफ नहीं किया।
 कांग्रेस पर चुनावी हमले अपनी जगह। किसानों के कर्ज को लेकर शिवराज की बदली भाषा बताती है कि मंदसौर में पुलिस गोलीकांड के बाद से राजनीति के केंद्र में आए किसानों पर कर्जमाफी का मुद्दा गले की फांस बनता जा रहा है। भाजपा इससे पहले 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में कर्जमाफी को शामिल कर मंदसौर के लोकसभा चुनाव में उसका खामियाजा भुगत चुकी है। उस घोषणा से पार पाने के लिए मुख्यमंत्री और सरकार को तब कर्जमाफी को ही अनुपयुक्त बताना पड़ा था। दूसरी ओर कांग्रेस है, जिसके अध्यक्ष राहुल गांधी के मंदसौर की धरती से ही कर्जमाफी का राग छेड़ा था और उसे मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ और राजस्थान तक ले गए। 

कर्जमाफी कांग्रेस के वचनपत्र का सबसे ज्यादा लुभावना नारा बन गया है। इसीलिए कमलनाथ भी शिवराज सिंह की बदली बोली पर तंज कसने से नहीं चूके। जनसभा से ज्यादा ट्वीटर पर बोलने वाले कमलनाथ ने ट्वीट किया है- जो पिछले 15 वर्ष से खेती को घाटे का धंधा बनाते चले गए... किसानों को कर्ज के दलदल में धकेलते चले गए...हक मांगने पर सीने में गोलियां व लाठियां दागते रहे...कर्ज माफी की मांग पर उनका मजाक उड़ाते रहे...वो चुनाव के दो दिन पूर्व फिर किसान भाइयों को अगले 5 साल के झूठे सपने दिखा रहे है। यह और बात है कि सरकार में होने के कारण शिवराज को किसानों के कर्ज माफ करने के बजाए अन्य उपाय ज्यादा फायदेमंद दिख रहे हैं, क्योंकि खजाने पर इसके असर का आकलन उनके पास है। सरकार बनी तो कांग्रेस को भी इसे लेकर चिंतित होना ही पड़ेगा।





Tuesday, November 20, 2018

राहुल को राफेल तो मोदी-शाह को कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की चिंता


एमपी की धरती पर सेट हो रहा है 2019 चुनाव का एजेंडा! 


मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों में अभी विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में प्रत्याशी, जिले के नेता, प्रदेश के नेता और राष्ट्रीय नेता तक प्रचार में अपनी आहुति दे रहे हैं। चुनाव में मुद्दा तो इन प्रदेशों का विकास होना चाहिए था, लेकिन दिल्ली से आने वाले नेताओं के एजेंडे पर प्रदेश की समस्याएं और वो मुद्दे नहीं हैं, जो जनता से सीधे जुड़े हैं। मध्यप्रदेश की धरती पर कोई राफेल की डील की कहानी लिख रहा है तो किसी को 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की चिंता सता रही है। नेताओं के यह बोल यूंही नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के बहाने वे पांच माह बाद होने वाले आम चुनाव के एजेंडा सेट कर रहे हैं।
बैतूल हो या खातेगांव, वहां के आदिवासी एवं ग्रामीण जनता को कांग्रेस के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी

बनने से क्या फर्क पड़ता है? वे तो उम्मीदवार में अपनी समस्याओं को दूर करने की काबिलियत तलाश रहे हैं। फिर भी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उन्हें कांग्रेस पार्टी के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनने का पाठ पढ़ा गए। शाह ने अपनी चुनावी सभाओं में कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की जितनी चिंता की है उतनी बार तो उन्होंने भाजपा प्रत्याशियों को जिताने की अपील भी नहीं की। वे यह स्थापित करने की कोशिश करते दिख रहे हैं कि 133 साल पुरानी गौरवशाली कांग्रेस का इतिहास जैसे कुछ हो ही नहीं। इस पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा होना भाजपा को पाक अधिकृत कश्मीर से भी ज्यादा नुकसानदायक दिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कमलनाथ के छिंदवाड़ा में राहुल गांधी पर तंज कसते हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस के नेता कंफ्यूज हो गए हैं और पूरी की पूरी पार्टी फ्यूज हो गई है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके परिवार पर भाजपा के शीर्ष नेताओं के यह हमले अकारण नहीं हैं। मई में होने वाले लोकसभा के चुनाव के लिए मुद्दों का लिटमस टेस्ट हो रहा है। पांच साल तक पूर्ण बहुमत से देश चला रही भाजपा को चुनाव मैदान में विरोधी पार्टी के खिलाफ बोलने के लिए कुछ तो चाहिए। कांग्रेस केंद्र तो क्या देश के अधिकांश प्रदेशों में भी सत्ता से बाहर है, ऐसे में उसकी खामियां या गलत नीतियां कैसे गिनाई जा सकती हैं? यूपीए राज से अपने विकास की तुलना को तूल देंगे तो नोटबंदी और जीएसटी के साथ पेट्रोल-डीजल के दाम संकट खड़ा करते हैं। बस इसीलिए कुछ और की तलाश कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र पर आकर ठहर गई है। आजादी के बाद बने कांग्रेस के कुल 17 अध्यक्षों में से चार राहुल गांधी के पूर्वज हों, यह मुद्दा कांग्रेस के लिए गौरव की बात हो सकती है, लेकिन भाजपा को इसमें ही राहुल की कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का मटेरियल दिख रहा है। इसीलिए शाह के बयान पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर मंत्री नरोत्तम मिश्र तक सवाल उठा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र होना चाहिए या नहीं? क्या प्रधानमंत्री पद भी किसी घराने से चलेगा?
पाक-साफ होने के मोदी और उनकी सरकार के दावे ने ही कांग्रेस और राहुल गांधी को राफेल का सिरा पकड़ाया है। कभी बोफोर्स घोटाले की आंच में जल चुकी कांग्रेस वैसे ही मुद्दे राफेल के बहाने मोदी के झक सफेद कुर्ते की असलियत खोलने को बेताब हैं। राहुल हों या मोदी और शाह, उनके मुद्दे मध्यप्रदेश के मुद्दे नहीं हैं। ये नेता गावों के शत-प्रतिशत ओडीएफ होने के दावे की असलियत नहीं बताते। हर साल बनतीं-उखड़ती सड़कों और रोजगार एवं बेरोजगारी के दावों की सच्चाई पर नहीं जाते, क्योंकि इन मुद्दों पर किए गए दावे आगे चल हर खाते में 15 लाख रुपए का काला धन आने जैसा जुमला साबित हो सकते हैं। इसलिए लोगों के घर में चूल्हा जला या नहीं यह देखने के बजाए विरोधियों के घर में आंतरिक लोकतंत्र है या नहीं यह देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि शुरू से ही भाजपा के लिए मध्यप्रदेश राजनीति की वह प्रयोगशाला रहा है। इसीलिए भाजपा प्रदेश के चुनाव में भी राममंदिर, तीन तलाक, कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र समेत कई नए मुद्दों का टेस्ट कर रही है।



Monday, November 19, 2018

छिंदवाड़ा यदि विकास का पैमाना है तो गढ़ाकोटा के गोपालजी भी हैं दावेदार

जब से कमलनाथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष बने हैं, आदिवासी क्षेत्र छिंदवाड़ा राजनीति का केंद्रबिंदु बनने को बेताब हो गया है। कमलनाथ भी विकास के हर पैमाने पर छिंदवाड़ा को प्रदेश के किसी भी शहर, गांव या जिले से इक्कीस साबित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे। यदि किसी एक क्षेत्र विशेष में तीस-चालीस सालों की साध ही समग्र विकास का पैमाना है तो कमलनाथ ही क्यों, गढ़ाकोटा के गोपालजी यानी भाजपा के गोपाल भार्गव भी मुख्यमंत्री पद की इस रेस में मुकाबला कर सकते हैं, और कर भी रहे हैं।
जैसे छिंदवाड़ा का समूचा विकास कमलनाथ की देन है, ठीक उसी प्रकार गढ़ाकोटा की 'सबै भूमि गोपालजी' की है। रहली विधानसभा क्षेत्र में तामीर हुई हर इमारत, पुल, पुलिया से लेकर खेल मैदान और बॉडी बिल्डर
कार्यकर्ता तैयार करने की फैक्ट्री (जिम) तक गोपालजी के नाम पर है। यहां तक कि इस क्षेत्र से कोई युवा पुलिस भर्ती में चुन लिया जाए तो वह भी गोपालजी के जिम की कृपा ही मानी जाती है। मुफ्त भोजनालय से लेकर क्षेत्रवासियों की हर दिक्कत का हल 'गणनायक' से निकलता है। गणनायक में ही अलसुबह तक गोपालजी का नियमित और अनवरत दरबार लगता है। पिछले विधानसभा चुनाव में एक दिन भी वोट मांगने के लिए न निकल कर गोपाल भार्गव ने अनूठा रिकॉर्ड बनाया था। वो पूरे समय घर या गणनायक में ही बैठे रहे और सातवीं बार विधानसभा में पहुंच गए थे। भार्गव के पास एक रिकॉर्ड और है कि वे अकेले ऐसे मंत्री हैं जो बीते 15 साल से लगातार कैबिनेट में शामिल हैं। भले ही इस दौर में तीन मुख्यमंत्री बदल गए हों। बस इसीलिए, उनके क्षेत्र में पोस्टर दिख रहे हैं- 'मंत्री नहीं संतरी है आगामी मुख्यमंत्री है'। भार्गव की यह तमन्ना और वरिष्ठतम मंत्री, अनुभवी, उच्चशिक्षित राजनेता वाले समर्थकों के तर्क चुनावी दांव-पेंच से ज्यादा तब तक कुछ नहीं, जब तक कि उनकी पार्टी बहुमत न हासिल कर ले और विधायक दल अथवा हाईकमान मुख्यमंत्री पद के लिए उनका चयन न कर ले।
बात करें कमलनाथ की तो। सपने वहां भी मुख्यमंत्री पद के ही हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश का कैसा विकास करेंगे इसकी बानगी वे छिंदवाड़ा के विकास से दिखा रहे हैं। छिंदवाड़ा में यस बैंक एवं स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक खुल गया है या हनुमान जी की 101 फीट की अलौकिक प्रतिमा बन गई है। गिनती की ट्रेन और मुसाफिरों वाला छिंदवाड़ा रेलवे स्टेशन मॉडल स्टेशन है। यह कमलनाथ और छिंदवाड़ा के साथ प्रदेश के लिए गौरव की बात है, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि कमलनाथ मुख्यमंत्री बने तब हर शहर में 101 फीट के हनुमानजी स्थापित हो जाएंगे। हर स्टेशन मॉडल बन जाएगा। यस बैंक और स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक की शाखाएं गांव-मोहल्लों तक खुल जाएंगी। छिंदवाड़ा में चल रहे उद्योग और काम-धंधों के लिए इनकी जरूरत हो सकती है इसलिए वहां ये हैं। जरूरी नहीं कि छिंदवाड़ा के सभी गांवों में यस बैंक हो और सरकार बनी तो प्रदेश भर के निपट किसानों वाले गांव में भी विदेशी बैंक की शाखा खुले, जहां किसान का सारा काम सोसायटी या ग्रामीण बैंक से ही चल जाता है। कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र के हर गांव या कस्बे में विदेशी बैंक हों यह भी आवश्यक नहीं है। उनका यह कथन तो शो-केस में सजे डिस्प्ले के सामान जैसा है।
 छिंदवाड़ा से चालीस साल के अपने जुड़ाव में कमलनाथ ने विकास की कई उल्लेखनीय सौगातें दी हैं, यह अच्छी बात है। विकास के मामले में छिंदवाड़ा की बुदनी से उनकी तुलना जायज तो है, किंतु ये दोनों स्थान पूरा मध्यप्रदेश नहीं हैं। बस इसीलिए पूरे प्रदेश को छिंदवाड़ा बनाने का उनका सपना और छिंदवाड़ा चैलेंज अतिश्योक्तिपूर्ण लगता है। छिंदवाड़ा में चुनाव प्रचार करने आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां का विकास मॉडल देखने का न्यौता देना सकारात्मक पहल है, किंतु इसी विकास में मदान्ध होना कतई उचित नहीं है। ठीक ऐसा दावा गढ़ाकोटा को लेकर गोपाल भार्गव कर सकते हैं। खुरई की अपने पांच साल की विधायकी में भूपेंद्र सिंह और दस साल में दतिया के विकास की दुहाई नरोत्तम मिश्र भी कुछ इसी तर्ज पर दे सकते हैं। लंबे समय तक केद्रीय मंत्री रहे कमलनाथ और प्रदेश के मंत्री गोपाल भार्गव भी जानते होंगे कि किसी क्षेत्र की किस्मत न तो सीधे केंद्र सरकार बदल सकती है और न ही अपने दम पर राज्य सरकार। जिन कार्यों को ये नेता गिना रहे हैं उसमें केंद्र और राज्य का पैसा और संसाधन लगा है, तब कहीं जाकर उनके नाम का शिलालेख लग पाया है। पूरे प्रदेश के चुनाव में एक क्षेत्र विशेष की इस ब्रांडिंग से सवाल उठता है कि क्या 50 साल के अपने शासनकाल में कांग्रेस ने प्रदेश के विकास का कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसका जिक्र कर सके। क्या दस साल की दिग्विजय सरकार की भी कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है, जिसका बखान कर पूरे प्रदेश को 15 साल के भाजपा-राज को आईना दिखाया जा सके? 



अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसक...