
माना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात की सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी मध्यप्रदेश को एशियाटिक लॉयन यानी गिर के बब्बर शेर सिर्फ इसलिए नहीं दे रही, क्योंकि बड़ी बिल्लियों की यह प्रजाति गुजरात की अस्मिता से जुड़ गई है। गिर के जंगल में इन शेरों के कुनबों को स्वच्छंद विचरण करते देखने देश-विदेश से सैलानी आते हैं। इनसे गुजरात के पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। शेर मध्यप्रदेश के बाशिंदे हो गए तो गुजरात का 'गौरव' ही नहीं पर्यटन से होने वाली कमाई भी बंट जाएगी। पर...रसगुल्ला तो शेर नहीं है। इसे तो कहीं भी बनाया और हजम किया जा सकता है। फिर क्यों ओडिसा और पश्चिम बंगाल की सरकारें आमने-सामने हैं...?
यदि रसगुल्ले को 'गुजराती गौरव' चश्मे से देखें तो...आने वाले समय में एक खास प्रदेश से बाहर के बाशिंदे इसका रसास्वादन नहीं कर पाएंगे ! यदि रसगुल्ला उड़िया निकला तो सिर्फ कलिंग प्रदेश के रहवासियों का राजकीय मिष्ठान बन कर रह जाएगा। और यदि पश्चिम बंगाल मूल का हुआ तो केवल बंगालियों को ही नसीब होगा। दीगर राज्य के निवासी यदि रसगुल्ला बनाते या खाते हैं तो उन्हें एक नए किस्म का टैक्स...रायल्टी चुकानी पड़ेगी।
रसगुल्ला महिमा गान ! ये शक-शुभहा ! इसलिए क्योंकि 21 वीं सदी में विकास की होड़ में लगे दो राज्य रसगुल्ले को लेकर तलवारें खींचे हुए हैं। जर,जाेरू और जमीन के लिए झगड़ों की बात पुरानी हो गई। ऩए दौर में इंटलेक्चुअल प्रापर्टी राइट, पेटेंट और जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई ) टैग को लेकर झगड़े हो रहे हैं.....ये संघर्ष का नया दौर है।कुछ समय पहले भारत ने अमेरिका से खुशबूदार बासमती चावल के पेटेंट की जंग जीती तो मध्यप्रदेश राज्य ने अपने बासमती के लिए जीआई टैग हासिल कर पाकिस्तान को नाराज कर दिया। अब इसे लेकर विश्व बिरादरी में एक नई जंग छिड़ गई है कि बासमती किसका असली है....मध्यप्रदेश का या पाकिस्तान का ? बस ऐसा ही एक संघर्ष हम सब का पसंदीदा रसगुल्ला भी झेल रहा है। ओडिसा सरकार ने इस सफेद, गोल मटोल, रसभरे और मीठे मिष्ठान पर अपना दावा जताया है। ओडिसा ने इसके लिए जीआई टैग क्या मांगा हंगामा मच गया। ग्रामीण उत्सवों में बंगाली मिठाई का पर्याय रसगुल्ला...विवाद का गोला बन गया। इसकी मिठास में कसैलापन आ गया...नर्म मुलायम रसगुल्ला अचानक रूखा और बेस्वाद लगने लगा ! न जाने कब इसे गप करना बौद्धिक संपदा अधिकार कानून का उल्लंघन हो जाए। किसी मेहमान को रसगुल्ला परोस कर पता नहीं कौन सा अपराध हो जाए? डर हो भी क्यों ना! ओडिसा सरकार ने रसगुल्ले के जन्मस्थान की तलाश और उस पर अधिकार जताने के लिए जांच कमेटी गठित कर दी हैं। एक नहीं, दो नहीं। तीन-तीन समितियां रसगुल्ला मामले की जांच करेंगी। हर पहलू की जांच होगी। सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि समितियों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग विभाग के साथ संस्कृति विभाग के अफसर होंगे। पहली समिति ओडिसा में रसगुल्ला के उद्भव से जुड़े तथ्यों और सबूतों को देखेगी। दूसरी समिति रसगुल्ले पर पश्चिम बंगाल के दावे की पड़ताल करेगी। तीसरी समिति ओडिसा के दावे को स्थापित करने के लिए जरुरी दस्तावेज जुटाएगी। मतलब रसगुल्ला अब सिर्फ मिठाई की दुकान पर मिलने वाला मीठा गोला नहीं रहा। उसके व्यवसायिक पहलू को देखा जा रहा है। जीआई टैग क्या ऐसे वैसे ही मांगा जा रहा है?
ये लालू यादव या किसी और राजनेता की जन्मतिथि का विवाद होता तो समझ आता कि राजनीति है, ये तो रसगुल्ले का मामला है। जलेबी से भी ज्यादा उलझना ही था। इमरती का सिरा पकड़ने से भी ज्यादा कठिन होना ही था। सो हो गया। गुजराती पाककला विशेषज्ञ तरला दलाल से लेकर पंजाबी शेफ संजीव कपूर और विकास खन्ना तक की रेसिपी में कोहिनूर की तरह जगमगाते रसगुल्ले की आखिर हकीकत क्या है? इसे तो हर हलवाई बनाता है। अब तो इंस्टेंट मिक्स भी मिलता है। देशी से लेकर मल्टीनेशनल कंपनियां तक मिक्स बेच मुनाफा कमा रहीं हैं। घर पर भी दूध फाड़ कर इसे बना लिया जाता है। इतना सुलभ...इतना सहज रसगुल्ला आखिर है किसका?
पश्चिम बंगाल का दावा है कि कलकत्ता के नबीन चंद्र दास ने इस मिठाई की खोज की थी। न्यूटन और आइंस्टीन द्वारा धोखे से की गई बड़ी खोजों की ही तर्ज पर नबीन बाबू बनाते तो प्रसिद्ध बंगाली मिठाई 'सोन्देश' थे पर साल 1868 में एक दिन रोसोगुल्ला की ईजाद हो गई। अब उनके वारिस और बड़े रोसोगुल्ला कारोबारी के.सी. दास इस पर अपना अधिकार जताने और बांग्ला गौरव से इसे जोड़ने इसका इतिहास लिखवा रहे हैं। जिसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपा जाएगा। पड़ोसी से बड़ा जलकुकड़ा भी कोई हो सकता है क्या? ओड़िसा ने भी दांव चल दिया कि रोसोगुल्ला के बंगाली अविष्कार से बहुत पहले से रसगुल्ला उनके घर बनता आ रहा है। तुर्रा ये कि अपने भात के लिए जगप्रसिद्ध पुरी के भगवान जगन्नाथ को इसका भोग लगभग 300 साल से लग रहा है। यानी बंगाल से 150 साल पहले से। इतिहास का कोई जानकर एक हजार साल पुरानी परम्परा की दुहाई दे रहा है तो कोई 13 वीं तो कोई 18 वीं सदी के प्रमाण बता रहा है। धार्मिक आख्यान भी हैं, दलील को मजबूती देने। इसका जन्मस्थान भी खोज लिया गया। कटक और भुवनेश्वर के बीच नेशनल हाइवे नंबर 5 पर स्थित पाहाल गांव को जन्मस्थली बताया जा रहा है, जहां के रसगुल्ले काफी मशहूर हैं। ओडिसा सरकार इसी गांव के रसगुल्ले को जीआई मान्यता दिलाना चाहती है। तो बात बस इतनी सी ही है जियोग्राफिकल इंडिकेशन की। ये हुआ तो...!
न जी बात इतनी सी नहीं है! बात अस्मिता की है। राजनीति की है। जनता को भरमाने की है। गुम हो चुकी सड़क, कागजों में बन रही नहर या हवा में खुद रहे सरकारी कुओं को तलाशने का ऐसा जज्बा क्यों नहीं होता जैसा रसगुल्ले को लेकर है। आम आदमी, विकास और सुविधाएं बेमानी हैं इसकी मिठास के सामने। सरकारों को खोजना है तो सड़क, बिजली और पानी क्यों नहीं खोजा जाता। रसगुल्ले का इतिहास खंगालने की इतनी मशक्कत से हासिल क्या होगा ! जिसकी रेसिपी पर किसी सरकार का कण्ट्रोल नहीं। जिसका जब मन करे खरीद कर लाए...घर में बनाए और गप कर जाए। रसगुल्ला तो रसगुल्ला ही रहेगा। इसकी मिठास, मुलायम सफेदी और लज्जत पर रसगुल्ले के सिवा किसी और का पेटेंट हो सकता है क्या? चिंता नको।वाह रसगुल्ला। वाह रोसोगुल्ला।
2 comments:
Beautifully written. We Love your each n every blog. Keep writing and surprising us.
prabhu bhai , bahut shaandaar..
ashok manwani
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