विश्व हिंदी सम्मेलन में आए देश और दुनिया भर के हिंदी प्रेमियों के बीच आंध्रप्रदेश से आए एक सज्जन अनायास भोजनशाला में टकरा गए। पंडाल से लेकर सम्मेलन की तमाम विशेषताओं और स्वागत सत्कार के लिए उन्होंने मध्यप्रदेश की तारीफ की। लेकिन, प्रदेश की पहचान के सवाल पर बोले, व्यापमं से है मध्यप्रदेश की पहचान।तेलगु लहजे की हिंदी बोलने वाले उन विद्वान ने यह बात आयोजनकर्ताओं या इस आयोजन से जुड़े किसी व्यक्ति के सामने कही होती तो शायद तत्काल वापसी का टिकट मिल गया होता। वो खुशकिस्मत थे। पर क्या इतना बड़ा वैश्विक आयोजन करने के बाद भी मध्यप्रदेश खुशकिस्मत बन पाया ? इस प्रदेश पर 31 साल पहले गैस काण्ड का ग्रहण लगा था। गूगल देवता से मध्यप्रदेश या मध्यप्रदेश की राजधानी के बारे में पूछो तो गैस त्रासदी का चेहरा दिखाते अनगिनत पेज वो सामने फेंक देता था। मानो भोपाल जिंदा लोगों का शहर नहीं लाशों का कब्रिस्तान हो! दुनिया भर में काम कर रहे कई एनजीओ से लेकर पर्यावरणवादी, मानवतावादी और मानववादी संगठन और लोग भोपाल को सिर्फ और सिर्फ गैस काण्ड की वजह से जानते आए हैं...पीढी बदलने के बावजूद यह पहचान नहीं बदल सकी थी। उड़ीसा के कालाहांडी जिले के साथ जैसे भुखमरी की पहचान चिपकी हुई है ठीक वही हाल भोपाल का था।
बीमारू प्रदेश की लिस्ट से खुद बाहर होकर इस बीमारू राज्य शब्द का आस्तित्व समाप्त कराने वाले मध्यप्रदेश का यह दुर्भाग्य ही है कि उसे सकारात्मक पहचान मिल ही नहीं पा रही। अब बीमारू नहीं रहा, कहने से काम नहीं चलता। विकासशील हो गया है, कहना भी कोई प्रभाव नहीं डालता। मध्यप्रदेश को नई पहचान मिली है व्यापमं से। इस घोटाले ने लोगों पर जो प्रभाव डाला हो वो अपनी जगह, इसने नकारात्मक ढंग से पूरे प्रदेश को प्रभावित कर दिया है। घोटालेबाजों को सलाखों के पीछे भेजने वाली सरकार की मंशा का भी इसमें अच्छा या बुरा... योगदान तो है ही। क्या कोई अपना ही घाव दुनिया के सामने उघारता है ? नहीं न! घाव का इलाज किया जाता है। डॉक्टर को दिखाया जाता है और मर्ज के कारणों को दूर किया जाता है। घाव की नुमाइश नहीं की जाती। व्यापमं मामले में इलाज की तुलना में नुमाइश ज्यादा हो गई और ये वो नासूर बन गया जिसका दाग आसानी से नहीं मिटता।
शायद ये किस्मत का ही लेख है कि प्रदेश को प्रसिद्धि 'सद्' कार्यों के लिए नहीं मिलती। राष्ट्रीय मीडिया के मित्र बताते हैं कि मध्यप्रदेश की सकारात्मक खबरों के लिए उनके संस्थान में स्थान नहीं है। हां, नकारात्मक समाचार हो तो खूब चलता है। अब विश्व हिंदी सम्मलेन को ही देख लीजिए। वो तवज्जो नहीं, जो होनी चाहिए थी इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन की। इसीलिए गेंहू की पैदावार में पंजाब को पीछे छोड़ने वाला मध्यप्रदेश। देश को लाड़ली लक्ष्मी योजना देने वाला मध्यप्रदेश। कई विशेषताओं वाला प्रदेश जाना जाता है तो व्यापमं घोटाले से। उम्मीद की जानी चाहिए कि आंध्रप्रदेश से आए उन महानुभाव की तरह बाकी भद्रजन सम्मेलन से जब लौटें तो मध्यप्रदेश की नई पहचान लेकर जाएं....कि ये हिंदी प्रदेश है। देश का ह्रदयप्रदेश है। व्यापमं प्रदेश नहीं। ये दाग अच्छा नहीं है। व्यापमं का भर्ती घोटाला भले ही सीबीआई तक पहुंच गया हो, उसके आगे भी मध्यप्रदेश है। आखिर दाग कैसे भी हों वो हमेशा अच्छे नहीं होते। कुछ दाग इतने बुरे होते हैं कि पहचान बदल देते हैं।


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