Friday, September 2, 2016

                                                        मंत्रालय एक्सप्रेस
           क्यों बिगड़े चीफ सेक्रेटरी के तेवर....
प्रदेश के कई जिलों के कलेक्टरों को शुक्रवार को मुख्य सचिव अंटोनी डिसा की फटकार मिली...परख वीडियो कान्फ्रेंसिंग में चीफ सेक्रेटरी ने रीवा और सतना के कलेक्टर को बाढ़ राहत और आपदा में मौत के शिकार हुए लोगों के मुआवजा वितरण को लेकर जमकर डांट पिलाई....सीएस ने फसल को हुए नुकसान के सर्वे पर भी नाराजगी जताई तो....प्याज वितरण न होने पर सीहोर कलेक्टर को मुख्य सचिव की फटकार झेलनी पड़ी....रोजगार योजनाओं की खराब स्थिति को लेकर भी सभी कलेक्टरों के प्रति चीफ सेक्रेटरी ने अप्रसन्नता जताई....खास बात यह है कि एक घंटे के लिए निर्धारित यह वीडियो कान्फ्रेंसिंग तीन घंटे तक चली।
         ट्रांसफर लिस्ट को सीएम का इंतजार....
न्यूयार्क यात्रा से लौट कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शनिवार को भोपाल आएंगे....और इस दिन उनके मंत्रालय पहुंचने की संभावना नहीं है...सीएम 4 सितंबर को कटनी जाएंगे....सीएम की विदेश यात्रा के चलते आईपीएस अफसरों की तबादला सूची अटक गई थी...अब यह लिस्ट त्यौहारों के बाद जारी होने के आसार हैं.....इस बीच मंत्रालय स्तर पर कुछ आईएएस अफसरों के फेरबदल की एक छोटी सूची भी आ सकती है।
         सीएम की क्लास की तैयारी....
मंत्रालय में शुक्रवार को छह सितंबर को होने वाली बड़ी बैठक की तैयारियां होती रहीं....मुख्यमंत्री ने मंगलवार को मंत्री और आला अफसरों की एक संयुक्त बैठक बुलाई है....इस बैठक में चालू वित्तीय वर्ष के पहले पांच महीने के कामकाज की समीक्षा की जाएगी और साल के बाकी बचे सात महीने की कार्ययोजना पर भी चर्चा की जाएगी।
          वोरा के बाद रिटायर्ड भी आए निशाने पर....

नए मंत्रियों के बंगलों की मांग के बीच गृह विभाग को उन बंगलों की भी सुध आ गई है...जिनमें रिटायर्ड अफसर कई महीनों या सालों से कब्जा किए बैठे हैं...होम डिपार्टमेंट ने रिटायर्ड आईएएस आर.के. स्वाई से बंगला खाली करा लिया है....वहीं साल 2014 से सरकारी मकान में कब्जा किए बैठे एम.एम. उपाध्याय को भी नोटिस दिया गया है। इससे पहले मध्यप्रदेश सरकार पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा का भी बंगला खाली करा चुकी है।

Tuesday, July 5, 2016

“75 पार” शिकार: लोग तो कहेंगे ही....



आखिरकार वही हुआ! जिसके कयास लग रहे थे। केंद्र सरकार यानी मोदी कैबिनेट में उम्र के 75 बसंत देख चुके लोग भी मंत्री पद पर बरकरार रखे गए। फिर चाहे वो उत्तरप्रदेश से चुन कर आए कलराज मिश्र हों या मध्यप्रदेश से राज्यसभा में भेजी गईं नजमा हेपतुल्ला। बीजेपी का 75 पार का फार्मूला इनके मंत्री पद के आड़े नहीं आया। केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार से महज चार रोज पहले मध्यप्रदेश में इसी 75 पार” फार्मूले की बलि चढ़ाए गए वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर और सरताज सिंह को अब अहसास हो रहा है कि वे ठगे गए...उनसे छल हुआ है और ये छल किया है उनकी अपनी पार्टी ने। आलाकमान ने या राज्य इकाई ने? इस सवाल का जवाब गौर और सरताज के साथ बहुत से लोग तलाश रहे हैं।
बस इसीलिए कांग्रेस की प्रतिक्रिया आई है कि उम्रदराज मंत्रियों को विश्राम देने का बीजेपी का फार्मूला व्यक्तिगत कुंठा निकालने का हथियार से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ऐसी ही सोच 30 जून तक मध्यप्रदेश कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ सदस्य रहे पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और उनसे एक दशक छोटे, लेकिन 76 साल के एकमात्र सिक्ख मंत्री रहे सरताज सिंह की भी होगी। शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट की जवानी निखारने के फेर में इन दोनों को जून माह के आखरी दिन बेमन से मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। वह भी सठियाने की आयु में खुद को युवा मानने वाले बीजेपी के प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्दे के दबाव-प्रभाव में। तब गौर और सरताज को यही बताया गया कि बीजेपी ने 75 साल की उम्र पूरी कर चुके नेताओं को घर बिठाने का निर्णय लिया है। क्या वाकई ये हथियार केंद्र ने विनय को देकर भेजा था या फिर हथियार भोपाल में उठाया गया और आड़ आलाकमान की ली गई?  दो साल पहले ही इसी फार्मूले के दम पर आज की भारतीय जनता पार्टी को गढ़ने वाले वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी सत्ता की मुख्य धारा से बाहर कर दिए गए थे। उनके लिए एक मार्गदर्शक मंडल बनाया गया था। ठीक ओल्ड एज होम की तर्ज पर। ऐसी जगह जहां वो लोग गाहे बगाहे ही जाते हैं, जिन्होंने अपनों को वहां भेजा होता है।
मध्यप्रदेश में 75 पार फार्मूले का शिकार होते-होते बचीं मंत्री कुसुम महदेले की चिंता भी मोदी मंत्रिमंडल के गठन के साथ दूर हो गई होगी। उनकी भी समझ में आ ही गया होगा कि मध्यप्रदेश में 75 पार का यह महानाट्य सिर्फ बाबूलाल गौर को ठिकाने लगाने के लिए खेला गया था। वो तो सरताज सिंह की बदकिस्मती थी कि वे भी 75 पार निकले। ठीक उसी तरह जैसे आडवाणी के लिए दिल्ली में इसका मंचन हुआ था। लेकिन गौर से खतरा किसे?  बाबूलाल गौर ऐसे नेता हैं जो मुख्यमंत्री थे तब भी भोपाल के सीएम कहलाते थे। नगरीय प्रशासन मंत्री रहे हों या गृह मंत्री तब भी भोपाल के बाहर गौर के कदम गाहे-बगाहे ही पड़ते थे। उन्हें भोपाल और अपने विधानसभा क्षेत्र से ही मतलब रहा है। 2003 के चुनाव में उनका टिकट काटने का पार्टी ने खूब जतन किया था, जब नतीजे आए तो प्रदेश में सर्वाधिक मतों से गौर ही जीते थे। दस बार लगातार विधानसभा का चुनाव जीतने का कमाल प्रदेश में तो कम-से-कम किसी और नेता ने नहीं किया। पचास साल से अधिक समय तक राजनीति ओढ़ी-बिछाई थी, सो जुबानी जमाखर्च में परहेज नहीं करते। जो बोलना है बेलौस बोलते रहे हैं और अब भी बोल रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि गौर तोल-मोल के बोलते हैं। फिर चाहे उत्तरप्रदेश विधानसभा के पिछले चुनाव हों, जिसमें बीजेपी के लिए प्रचार करने के बाद लौटते ही उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार बनने की भविष्यवाणी कर दी थी, जो सच भी साबित हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे फोन लगा कर बधाई देने की हिम्मत भी मध्यप्रदेश में सिर्फ गौर ही दिखाते रहे हैं।
तो क्या, विनय सहस्त्रबुद्धे ने जो तलवार भांजी थी, वो बीजेपी आलाकमान की नहीं थी! आलाकमान की थी तो उसका निर्माण केवल व्यक्तिगत ईर्ष्या और द्वेष को साधने के लिए ही किया गया है। 75 पार वाली इस तलवार को चलाने वाले राजा में समदृष्टि का अभाव है? या फिर इसका समयानुकूल अपने हित में उपयोग करने की छूट बीजेपी ने अपने क्षत्रपों को दे रखी है। 75 पार की मार से दिल्ली वाले तो इस बार बच गए। अब देखना है ये हथियार फिर कौन किसे निपटाने के लिए उठाता है। 

Sunday, July 3, 2016

मान गए शिवराज, क्या बिछाई है बिसात!

अभी कुछ दिन पहले ही की बात है मध्यप्रदेश बीजेपी का कोर ग्रुप बना था। उसमें सभी पूर्व मुख्यमंत्री शामिल किए गए थे सिर्फ बाबूलाल गौर और उमा भारती को छोड़ कर। उमा तो खैर अब उत्तरप्रदेश की हो गईं लेकिन गौर तो यहीं एमपी में थे । शिवराज सिंह सरकार के वरिष्ठतम मंत्री। कोर कमेटी में पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ दो वरिष्ठ मंत्री को रखने की परंपरा बीजेपी की है। दोनों ही क्राइटेरिया में फिट गौर साहब को कोर कमेटी में जगह नहीं मिली थी। वो संकेत थे। परिणाम 30 जून को सामने आया और गौर साहब को बड़े ही बेदर्द तरीके से कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। 75 पार के उसी हथियार से, जिससे नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के सर्वमान्य नेता लालकृष्ण आडवाणी का शिकार किया था। तब इस राजनीतिक आखेट में आडवाणी के साथ खेत हुए थे मुरलीमनोहर जोशी। अब मध्यप्रदेश में गौर के साथ शिकार हुए कैबिनेट का एकमात्र सिख चेहरा सरताज सिंह। 
लेकिन मिशन-2018 के लिए अपनी सेना का पुनर्गठन कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बिसात की यह बानगी भर है। शिवराज ने अपने नए मंत्रिमंडल के सदस्यों को विभाग बांटने में इससे भी ज्यादा चतुराई की है। पहली बार सभी राज्यमंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार देकर सभी को एक प्लेटफार्म पर खड़ा कर दिया। क्या 13 साल के अनुभवी मंत्री और क्या नौसिखुए सभी एक बराबर। लेकिन राज्यमंत्रियों को जहां स्वतंत्र प्रभार वाले विभागों में खुल कर काम करने की स्वतंत्रता दी तो,उन्हें किसी न किसी वरिष्ठ मंत्री के साथ अटैच कर पुराने अनुभवी मंत्रियों को परेशान रखने का जतन भी कर दिया। अब राज्यमंत्रियों के सबसे ज्यादा मजे।अपने विभाग के वे अकेले मालिक और दूसरे मंत्रियों के काम के साझीदार। 
इस विभाग वितरण से पहले शिवराज साफ कर चुके हैं कि सभी मंत्रियों का परफार्मेन्स ऑडिट होगा। उन्हें हर तीसरे माह अपने विभाग की परफार्मेन्स रिपोर्ट भी देनी होगी। मतलब मंत्री का रुतबा बरकरार रहेगा या नहीं इसका तिमाही इम्तिहान सभी को देना होगा।अब राज्यमंत्री ठहरे राज्यमंत्री मंत्री ने उनके साथ कामकाज और अधिकारों का बंटवारा ढंग से नहीं किया तो शिकायत।विभाग का परफार्मेन्स बिगड़ा तो ठीकरा मंत्री के सिर। लेकिन टेंशन बढ़ाने के लिए राज्यमंत्री का साथ बरकरार। जब पहली बार सरकार चलाने आ रहे लोगों को स्वतंत्र प्रभार वाले विभाग दिए गए हैं तो सीनियर मंत्रियों को भी अपने विभाग की इंडिपेंडेंट जिम्मेदारी क्यों नहीं दी ? ढाई साल से यही मंत्री दो से ज्यादा विभाग अकेले ही संभाल रहे थे। अचानक ही वो अब अकेले एक विभाग संभालने लायक नही रहे! 2003 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद सहकारिता को कांग्रेस मुक्त करने वाले गोपाल भार्गव की पसंद सहकारिता उनसे छीन ली गयी। भार्गव अब सामाजिक न्याय और निशक्त कल्याण के साथ उस पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री रह गए जिसका अप्रत्यक्ष नियंत्रण किसी और के पास है। एम्पावर कमेटियों से कसे इस विभाग के असली 'भगवान'अफसर ही हैं। तिस पर राज्यमंत्री भी साथ हैं। यशोधरा राजे सिंधिया को जिस खूबी के कारण 2013 में उद्योग विभाग दिया गया था, उस पर अफसरशाही की शिकवा शिकायतें भारी पड़ गईं। अब श्रीमन्त से बड़ा और प्रभावी विभाग उनकी मामीजी यानी माया सिंह के पास है। यशोधरा खेल , युवा कल्याण और धार्मिक धर्मस्व विभाग की मंत्री हैं तो माया सिंह उस नगरीय विकास विभाग की मंत्री जो सभी की पसंद था।शिक्षा विभाग में सख्ती दिखाना उमाशंकर गुप्ता को राजस्व तक ले आया। विजय शाह भी खाद्य विभाग से स्कूल शिक्षा तक जा पहुंचे। फायदे में वो मंत्री रहे जो मुख्यमंत्री के करीबी हैं। अपवाद हैं तो कुसुम महदेले, जिनकी कुर्सी भी बची और बड़ा विभाग भी। लेकिन हैप्पी वो भी नहीं जिनके विभाग बचे रह गए। खुश वो भी नहीं जिनके विभाग बदल गए। शायद इसीलिए वादा करने के बाद भी शिवराज हैप्पीनेस मंत्रालय अब तक नहीं बना पाए। हो सकता है खुशी मंत्रालय के लिए उन्हें अब तक कोई खुशमिजाज मंत्री न मिला हो!
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विश्वास:  क्या बनेंगे सहकारिता किंग !
पहली बार मंत्री बनने के साथ विश्वास सारंग को सहकारिता विभाग देकर मुख्यमंत्री ने नया प्रयोग किया है। विश्वास लघु वनोपज संघ के पहले निर्वाचित अध्यक्ष रहे हैं। तब इसी सरकार ने उन्हें राज्यमंत्री दर्जा देना उचित नहीं समझा था। सहकारिता के अनुभव और युवा मोर्चा की प्रदेश भर में फैली टीम के दम पर विश्वास सहकारिता में बीजेपी का स्थायी आधार तैयार कर सकते हैं। उनसे पहले सहकारिता मंत्री रहे गोपाल भार्गव और गौरीशंकर बिसेन वो मुकाम हासिल नही कर पाए जो कांग्रेस के सहकारी नेताओं ने किया था। विश्वास के पास अवसर है कि वो कांग्रेस के सहकारिता पुरुष सुभाष यादव जैसा नाम और मुकाम हासिल करें।

Saturday, May 28, 2016

अभिव्यक्ति,साहब बहादुरों की ...!

मध्यप्रदेश की ब्यूरोक्रेसी भी अजीब है। और उसमें भी 'आज्ञाकारी' आईएएस अफसरों के कहने ही क्या! कभी आईएएस रमेश थेटे भोपाल में सड़क पर उतरने की धमकी देकर अपनी अफसरी के अच्छे दिन ले आते हैं। कभी सस्पेंड आईएएस शशि कर्नावत जलसमाधि लेने की चेतावनी देकर 'सरकार' की नींद उड़ा देती हैं। और अब, प्रमोटी आईएएस की जमात सोशल मीडिया पर लामबंद होकर परेशानी बढ़ा रही है।
मामला खरबूजे को देख कर खरबूजे के रंग बदलने जैसा है। बड़वानी कलेक्टर अजय सिंह गंगवार ने फेसबुक पर नेहरू की पुण्यतिथि के ठीक पहले देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर अपने विचार क्या व्यक्त किए। हंगामा खड़ा हो गया। साहब बहादुर ने नेहरू युग की तारीफ में बाबा रामदेव से लेकर विवादित संत आशाराम और गौशाला तक सवाल ही नहीं खड़े किए मोदी युग को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। बीजेपी की केंद्र सरकार के मुखिया पर निशाना साधने की ऐसी धृष्टता पर बीजेपी शासित प्रदेश सरकार से सजा तो मिलनी ही थी, सो गंगवार को जिलाधीश से उठा कर मंत्रालय के एक छोटे से कमरे में उपसचिव के तौर पर बिठाने के आदेश जारी हो गए। गंगवार के साथ जो हुआ वह प्रमोटी आईएएस राजेश बहुगुणा को रास नही आया तो उन्होंने गंगवार के साहस को सलाम करने के लिए सोशल मीडिया का ही सहारा लेकर अफसरशाही में मचे उबाल को हवा दे दी। अंदरखाने की खबर है कि कई प्रमोटी अफसर गंगवाल और बहुगुणा के साहस को सलामी दे रहे हैं। हो सकता है कि किसी और अफसर का जोश उबाल मार जाए और वो भी सोशल मीडिया पर कथित तौर पर 'अनसोशल' होने से खुद को न रोक पाए।
सरकार की चिंता का कारण भी अफसरों का इस तरह सोशल होना ही है। ये उस सरकार में हो रहा है, जिसमें अधिकारियों को सिखाया जा रहा है कि वे सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग जनता की समस्याओं के निदान के लिए करें। लोगों से जुड़ें। सवाल यह है कि ग्रामोदय से भारत उदय अभियान की व्यस्तता के बीच अफसर सोशल मामलों पर कमेंट्स के लिए समय कैसे निकाल पा रहे हैं। वो भी तब जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ चेतावनी दे रखी है कि इस अभियान में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी और कलेक्टरों की सीआर में अभियान की सफलता और असफलता दर्ज की जाएगी। लेकिन जिलों में तैनात अफसरों के निजी विचार लगातार आ रहे हैं और मंत्रालय की चौथी एवं पांचवी मंजिल पर बैठे अफसरों के हाथ-पांव फुला रहे हैं। इसकी ताजा शुरूआत की है नरसिंहपुर कलेक्टर सिबी चक्रवर्ती ने। अखिल भारतीय सेवा के इस नए रंगरूट का दिल तमिलनाडु में जयललिता की दोबारा सरकार बनने पर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होंने अपने ट्वीटर हैंडल से 'अम्मा' को न केवल बधाई दे डाली बल्कि उनकी जीत को ऐतिहासिक करार दिया। हंगामा मचा तो साहब को नोटिस थमा कर जवाब मांग लिया गया। लेकिन चक्रवर्ती की कलेक्टरी वैसे नहीं छीनी गई, जैसे गंगवाल की छीनी गई है। गंगवाल को पहले हटाया और अब नोटिस देने की तैयारी हो रही है। डायरेक्ट और प्रमोटी आईएएस का यही फर्क हलचल मचा रहा है। यही वो कारण है जिससे उनके साहस को सलाम किया जा रहा है। 
कहने को अखिल भारतीय सेवा के अफसर सिविल सर्विस आचरण संहिता के दायरे में बंधे होते हैं। इन मामलों में आचरण संहिता का उल्लंघन होना 'बड़े बाबू' मान रहे हैं। लेकिन, कई उदाहरण ऐसे भी हैं जिनमें अफसरों के बेपटरी होने पर उन्हें सजा के बजाए मेवा मिला है। आईएएस रमेश थेटे इसका सबसे उम्दा उदाहरण हैं। साहब रिश्वत के मामले में नौकरी से हाथ धो बैठे थे। सुप्रीम कोर्ट से जीत कर आए तो बहाली नहीं होने पर राष्ट्रपति भवन के सामने आत्मदाह की धमकी दे डाली। नौकरी वापस मिल गई। फिर लोकायुक्त के फेर में फंसे तो मुख्यमंत्री सहित आला अफसरों पर सार्वजनिक टीका-टिप्पणी करने के साथ जातिगत फोरम का भरपूर उपयोग किया। झुकना सरकार को पड़ा और थेटे को लूप लाइन से निकाल कर मुख्य धारा में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सचिव पद थमा कर शांत करा लिया गया। थेटे के साथ सुर मिला रहीं सस्पेंड आईएएस शशि कर्नावत का भी निर्वाह भत्ता तब बढ़ा जब उन्होंने इंदिरासागर डैम के हनुवंतिया टापू पर होने वाली कैबिनेट बैठक के दौरान जलसमाधि लेने की घोषणा कर सरकार को हिला दिया। 
ब्यूरोक्रेसी यानी सरकार चलाने वाली नौकरशाही के अंदरखाने में सबकुछ ठीक ठाक नहीं है। झगड़ा प्रमोटी या नए अफसरों के बीच तक ही सीमित हो ऐसा भी नहीं है। प्रदेश का ये वो दौर है, जिसमें मुख्य सचिव के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा कर रहे अंटोनी जे.सी. डिसा के एक्सटेंशन की बात चलती है तो उनके खिलाफ शिकवा शिकायत का दौर शुरू हो जाता है। चीफ सेक्रटरी के पद पर दावेदार के तौर पर एसीएस राधेश्याम जुलानिया के चर्चे होते हैं तो उनके खिलाफ तीन दशक पुराने मामले में कोर्ट का गैर जमानती वारंट आ धमकता है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग अफसर अपने मन के भाव उजागर करने के लिए करें तो परहेज कैसा?

Saturday, April 30, 2016

सिंहस्थ: अपने-अपने कुंभ !



जमाना ऑनलाइन का है। सो, ऑनलाइन शापिंग कीजिए। ऑनलाइन दर्शन कीजिए। लेकिन, ऑनलाइन पवित्र क्षिप्रा में डुबकी तो नहीं लगा सकते ना ? घर बैठे अमृत तुल्य जल से आचमन और स्नान का फल नहीं ले सकतेबस इसीलिए कल-कारखाने से आगे बढ़ कर मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में भी कुंभ का महत्व बरकरार है। और इसीलिए उज्जैन में हो रहे सिंहस्थ कुंभ में श्रद्धालुओं की कमी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

बारह साल में एक बार आने वाले इस आस्था के महापर्व को लेकर तर्क-वितर्क और विविध चर्चाओं के साथ प्रश्न खड़े हो रहे हैं। आखिर क्या कारण हैं कि पहले शाही स्नान में सरकार और मीडिया की अपेक्षा से काफी कम लोग उज्जैन पहुंचे। क्या नास्तिकता बढ़ गई है या फिर लोगों ने कठौती में गंगा....की तर्ज पर मोबाइल या लेपटॉप पर ही क्षिप्रा दर्शन कर शुभ मुहूर्त में स्नान का पुण्य लाभ ले लिया? किसी स्थान पर भीड़ बढ़ जाए तो कानून-व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है, लेकिन कुंभ में भीड़ न जुटे तो कानून-व्यवस्था पर ही सवाल उठने लगते हैं। इसलिए वो प्रशासन और सरकार सवालों के घेरे में है, जिसने भक्तों के लिए तमाम सुविधाएं जोड़ने उज्जैन में साढ़े तीन हजार करोड़ रूपए से अधिक खर्च किए। नए पुल पुलिया बनाए, सड़कें चौड़ी कीं, कई किलोमीटर लंबे नए घाट बनाए और सबसे बड़ा काम किया सिंहस्थ में सुरक्षा को लेकर ऐसी चौकसी बरती कि....लोगों में दहशत भर गई। बेवजह भक्तों को कई किलोमीटर लंबे चक्कर लगवाए। थोड़ी-थोड़ी दूर पर बेरिकेड्स लगा कर उन्हें बाधा दौड़ का ऐसा प्रतिस्पर्धी बनाया कि जो उस लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका जिसके लिए वह मध्यप्रदेश ही नहीं देश के दूसरे प्रदेशों से आया था। लोग उस पवित्र क्षिप्रा तक नहीं पहुंच पाए जिसकी पवित्रता बढ़ाने के लिए करोड़ों रूपए अलग से खर्च कर नर्मदा मैया का क्षिप्रा में मिलन कराया गया है।
भीड़ न जुटने के कई कारणों में एक कारण गर्मी को भी ठहराया जा रहा है। सिंहस्थ तो हर बार इसी मौसम में होता रहा है। जब सड़के चौड़ी नहीं थीं, घाट कम थे और पुल पुलिया भी नहीं थे तब भी लोग क्षिप्रा में श्रद्धा की डुबकी लगाने आते थे। अबकी बार जरूर कुछ अनूठा हो गया। खैर आयोजन को लेकर स्थायी निर्माण और उज्जैन को संवारने की सरकार की कोशिशों की दाद देनी होगी। सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी रही अवंतिका नगरी का रूप निखार दिया गया। परन्तु सिंहस्थ की धार्मिकता की कसौटी पर वातानुकूलित कमरों में पॉवर प्वाइंट प्रजेंटेशन के जरिए योजनाएं बनाने वाले बड़े बाबू फेल हो गए। निर्माण, निर्माण और निर्माण की गूंज में इस आयोजन का मूल तत्व ही कहीं गुम हो गया। रही सही कसरहाईटेक होने की ललक ने पूरी कर दी। जिस देश के मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं में से तीन चौथाई से अधिक लोग केवल कॉल करना और रिसीव करना जानते होंउनके लिए सिंहस्थ का मोबाइल एपऑनलाइन पार्किग व्यवस्थावाई-फाई कनेक्टविटी जैसे इंतजाम....वाह!
साधु संतों को खुश करने उनके अखाड़ों में कई करोड़ खर्च कर स्थायी निर्माण तो किए गए, लेकिन मेला क्षेत्र में लगने वाले पंडाल और उसमें ठहरने वाले संत तथा उनके भक्तों के लिए बुनियादी आवश्यकता का साधन मुहैया कराने में तंत्र असफल रहा। सबसे ज्यादा अव्यवस्था का राग शौचालय और पानी को लेकर उठ रहा है। अब तक शौचालय बनाए जा रहे हैं, जब सिंहस्थ शुरू हुए दस दिन से ज्यादा हो चुके हैं। जो शौचालय बने उन्हें लेकर भी भांति-भांति की शिकायतें आ रही हैं। कहीं सीवेज तंबुओं में भर रहा है तो कहीं पानी की किल्लत है। संतों का पारा चढ़ाने वाला काम ये भी कि जिनको संतों की सेवा के लिए तैनात किया गया उन आला अफसरों ने शाही स्नान पर साधु संतों से पहले क्षिप्रा स्नान कर लिया। मानो उनके पाप इतने बढ़ गए थे कि बाद में नहाते तो उतर नहीं पाते। बवाल मचना था सो मचा। अब मुनादी करा दी गई है कि उज्जैन सभी भक्तों के लिए खुला है। बेरोकटोक पैदल जाओ, गाड़ी से जाओ। पूरे मेला क्षेत्र में कहीं भी घूमो। कोई पाबंदी नहीं....लेकिन एक बार तो पधारो सिंहस्थ....।  
सरकार को लोगों की सुध आई तो अब खालसों और महामंडलेश्वरों की उन शिकायतों को निपटाने के लिए लाइजिनिंग अधिकारी तैनात किए जा रहे हैं, जिनके लिए अखाड़े और खालसा तंबू की पहली बल्ली गाड़ने के दौरान से चिल्ला रहे थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर प्रभारी मंत्री भूपेंद्र सिंह जिनकी हर समस्या सुन रहे थे और निराकरण के निर्देश दे रहे थे, लेकिन अफसर कुछ का समाधान करते तो कई अधूरी छोड़ रहे थे। सिंहस्थ-2016 का एक स्थायी पहलू ये भी है कि मुख्यमंत्री और प्रभारी मंत्री मुस्तैद, अफसर मस्त मलंग।
कुंभ की अपनी परंपरा और मर्यादा है। इसमें न तो नागा साधु किसी के निमंत्रण की प्रतीक्षा करते हैं और न ही आस्थावान लोग। गांव-देहात, कस्बा-शहर, देश-प्रदेश ही नहीं विदेशों से भी लोग भक्ति भाव से इसमें खिंचे चले आते हैं। सबकी अपनी आस्था होती है सबके अपने उद्देश्य। शायद यही वजह है कि श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं का ख्याल वो संत अपने तंबू में रखते हैं, जिनका ध्यान जनता जब तब करती रहती है। अखाड़ों में रोज भंडारे होते हैं। बिना जाति, प्रदेश पूछे रात्रि विश्राम के लिए जगह भक्तों को पंडाल में मिल जाती है। स्थानाभाव रहा तो धरती मां की गोद ही उनका बिछौना बनती है...मेला क्षेत्र में हर ओर भक्तों का सैलाब ही कुंभ का परिचायक है। लेकिन, उज्जैन का अबकी बार का सिंहस्थ अपने सनातन स्वरूप से भटका दिख रहा है तो इसका दोष व्यवस्थापकों पर है, जिन्होंने आस्था पर व्यवस्था का बोझ लाद दिया।
कुंभ की कथा बस यहीं तक सीमित नहीं है। साधु-संतो और श्रद्धालुओं के इस मेले में कुछ और अखाड़े आ गए हैं। सबसे ज्यादा चौंकाया है सरकारी और राजनीतिक अखाड़ों ने। सरकारी स्तर पर इस धार्मिक आयोजन को किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का रूप देने का प्रबंध किया गया है। एक तरफ अखाड़ों के पंडाल में यज्ञ, हवन, कथा और प्रवचन चल रहे हैं तो सरकारी तंत्र रोज अलग-अलग प्रांत और संस्कृतियों पर आधारित कार्यक्रम करा रहा है। वैचारिक महाकुंभ जैसे मेगा आयोजन भी होने हैं। राजनीतिक अखाड़ों ने तो अपने महान चुनावी लक्ष्य को भेदने के लिए समरसता स्नान और शबरी स्नान जैसे नए स्नान पर्व ही सृजित कर डाले। प्रचार किया जा रहा है कि राजनीतिक दल के प्रमुख दलितों के साथ स्नान करेंगे...उनके साथ ही भोजन ग्रहण करेंगे। कुंभ के इतिहास में कभी ऐसे आयोजनों का उल्लेख नहीं हुआ। उज्जैन ही नहीं, वरन प्रयागराज, हरिद्वार और नासिक कुंभ में भी कभी किसी ने बगल में स्नान करने वाले की न तो जात पूछी और न ही धर्म। कुंभ का मतलब ही है सभी का सामूहिक अमृतपान। उज्जैन में तो सबके अपने-अपने कुंभ दिख रहे हैं। भक्तों, संत, महात्माओं के अपने कुंभ। व्यापारियों और ठेकेदारों के अपने कुंभ। अफसरशाही का अपना अलग कुंभ तो नेताओं का अपना कुंभ।  
आस्था के इस महापर्व में जिसकी जैसी आस्था, जैसी लालसा वो वैसे आए हैं या आ रहे हैं। महाकालेश्वर की नगरी सबका स्वागत करने को तैयार है। पंचक्रोशी परिक्रमा में जब बच्चे, बूढ़े और महिला,पुरूषों का हुजूम तीखी धूप में 118 किलोमीटर की परिक्रमा लगाएगा, तब वे लोग कोई उम्मीद लेकर नहीं आएंगे कि उनके लिए मार्ग में क्या इंतजाम किए गए हैं। परिक्रमावासियों ने कभी कोई ऐसी मांग की भी नहीं। वो तो अपने सुख के लिए कच्चे पक्के रास्ते पर भरी धूप में पैदल चलने का कष्ट झेलते हैं। सरकार ने उनकी भी सुध ली, ये अच्छी बात है। ठीक इसीतरह सिंहस्थ को लेकर उज्जैन में कराए गए निर्माण कार्य भी साधुवाद के हकदार हैं। लेकिन आयोजकों को समझना होगा कि कुंभ तो भक्तों और संतों का है। कोई व्यवस्था न भी करें तब भी मेला लगेगा और भरपूर इंतजाम हो तब भी लोग जुटेंगे। वे अपने आध्यात्मिक सुख के लिए आते हैं। इसलिए उनकी नैसर्गिक जरूरतों को आम श्रद्धालु की नजर से देख कर पूरा किया जाए, न कि किसी सरकारी बांध या सड़क निर्माण की तर्ज पर।
एक बात यह भी कि प्रदेश सरकार हर बार अफसरों को दूसरी जगह लगने वाले कुंभ का जायजा लेने भेजती है। ताकि  व्यवस्था में सुधार किया जा सके। दूसरी जगहों पर किए गए नवाचार अपना कर जनता को और सहूलियत मुहैया कराई जाएं और अपनी पिछली खामियों को दुरूस्त किया जा सके। जैसी आवाजें आ रही हैं वो इशारा कर रही हैं कि क्या कुछ सीखा गया है, दूसरी जगहों से और पिछले सिंहस्थ से। नासिक का पिछला कुंभ भरी बरसात में हुआ था। वहां भी पंडाल लगा चुके पहाड़ी बाबा खालसा और लक्ष्मी नृसिंह मंदिर ललितपुर के महंत गंगादास जी महाराज याद करते हैं कि नासिक में कहीं कीचड़ या गंदगी का नामोनिशान नहीं था। इलाहाबाद कुंभ की व्यवस्थाओं की तो अखाड़ा परिषद के पदाधिकारी भी दुहाई देते नहीं थक रहे। हरिद्वार कुंभ भी गर्मी के बावजूद शीतलता का अहसास सबको कराता है। फिर सिंहस्थ को लेकर इतनी गर्मी क्यों विचार तो करना ही होगा!

Wednesday, April 27, 2016

चौबे जी में ‘सुर्खाब के पर’...!

                 
किसी चीज या व्यक्ति विशेष में कोई अनोखापन हो, विलक्षणता हो या फिर वह दूसरों से श्रेष्ठ हो तब कहा जाता है कि फलाने में क्या सुर्खाब के पर लगे हैं। लगता है, चार साल पहले रिटायर हो चुके मध्यप्रदेश के जल संसाधन विभाग के अफसर मदन गोपाल चौबे के लिए ही सुर्खाब के पर वाली कहावत रची गई होगी। शिवराज सिंह चौहान कैबिनेट ने चौबे को लगातार पांचवी बार विभागाध्यक्ष यानी इंजीनियर-इन-चीफ के पद पर संविदा नियुक्ति देने का फैसला लिया है। जब पूरी कैबिनेट ने यह निर्णय लिया है तो माना जाना चाहिए कि चौबे विलक्षण खूबियों के धनी हैं, विभाग के तीन हजार इंजीनियरों से वो श्रेष्ठ हैं, उनमें कोई खास अनोखापन है जिसकी मुरीद सरकार है।
चौबे को फिर संविदा नियुक्ति मिलने से विभाग का कुछ भला हो या न हो, लेकिन पदोन्नति की बाट जोह रहे इंजीनियरों के शीर्ष पद पर पहुंचने से पहले रिटायर होने वालों की कतार में और इजाफा हो जाएगा। विभाग के डेढ़ दर्जन से ज्यादा चीफ इंजीनियर उम्मीद लगाए बैठे थे कि अबकी बार तो उनमें से किसी को ईएनसी बनने का अवसर मिलेगा। सिर्फ मुख्य अभियंताओं की ही हसरतों पर पानी नहीं फिरा। संविदा नियुक्ति देने के सरकार के अपने नियमों को भी इस फैसले ने धता बता दिया है। इसी सरकार ने नियम बनाए थे कि किसी अफसर को रिटायरमेंट के बाद दो बार से ज्यादा संविदा पर नहीं रखा जाएगा। इसके बाद भी संविदा देनी है तो उसके बारे में छानबीन समिति की रिपोर्ट को माना जाएगा। ये और बात है कि चौबे का मामला छानबीन समिति में गया ही नहीं। कहा जाता है कि मदन गोपाल पर विभाग के मंत्री जयंत मलैया और अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया की विशेष कृपा है। तभी तो विभाग के इंजीनियरों के विरोध और मंत्रालय तक लगाई गई गुहार बेअसर रही और 29 फरवरी 2016 को चौबे की चौथी संविदा नियुक्ति की मियाद बीतने के बाद से ईएनसी का पद खाली रखा गया। इसको भरने के लिए डीपीसी करने जैसा दिखावा भी नहीं किया गया। और अब 27 अप्रैल को कैबिनेट ने निर्णय लिया है कि चौबे जी एक मार्च 2016 से अगले एक साल तक सिंचाई विभाग में गोपाल की तरह फिर पूजे जाएंगे।
खैर, चौबे को संविदा पर रखने के लिए जलसंसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा कैबिनेट के समक्ष जो तर्क रखे गए वो काबिलेगौर हैं। इन तर्कों को माना जाए तो जलसंसाधन विभाग के 3000 इंजीनियरों में से किसी के पास भी वो तकनीकी योग्यता और नेतृत्व क्षमता नहीं है, जो चौबे जी के पास है। प्रदेश मे पड़ा सूखा और विभाग में चल रहे बड़े (वृहद) बांधों के काम चौबे की पांचवी संविदा नियुक्ति की भूमिका रचने में सहायक सिद्ध हुए । भूमिगत पाइपलाइन के जरिए खेत तक उच्च दाब से पानी पहुंचाने की विशेषज्ञता भी उनके अलावा किसी और इंजीनियर के पास नहीं होने की बात भी घुमा-फिरा कर साबित करने की कोशिश की गई। मंत्रियों के बीच भी उस प्रस्ताव को लेकर खासी चर्चा रही, जिसमें कहा गया है कि वर्तमान में विभाग के अभियंताओं के तकनीकी कौशल में विकास के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। वृहद परियोजनाओं के बांध निर्माण और भूमिगत पाइपलाइन बिछा कर पूर्ण रूप से उच्च दाब पर खेत तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था विभाग के सभी इंजीनियरों के लिए नया कार्य है और इसका किसी भी इंजीनियर को अनुभव नहीं है। ऐसे समय में विभागाध्यक्ष के पद पर मदन गोपाल चौबे को एक साल की संविदा नियुक्ति दी जाती है तो इंजीनियरों को कुशल तकनीकी और प्रशासनिक नेतृत्व उपलब्ध हो सकेगा। उनका कौशल विकास करना आसान होगा
अब सवाल ये उठता है कि जिस विभाग के अफसरों को उस काम का अनुभव नहीं है जिसके लिए उन्हें नौकरी दी गई है तो उन्हें बीस-पच्चीस साल से वेतन देकर क्यों झेला जा रहा है? वे इतने अयोग्य हैं कि अभी तक वह  योग्यता हासिल नहीं कर पाए, जिसकी जरूरत उनके काम में होती है तो ऐसे इंजीनियरों को भर्ती ही क्यों किया गया? उनकी क्षमता विकास के काम क्यों नहीं किए गए? उन्हें सहायक यंत्री से मुख्य अभियंता के पद तक पदोन्नत क्यों किया गया?  क्या चौबे के ईएनसी बनने से पहले जलसंसाधन विभाग बड़े बांध नहीं बना रहा था? या फिर बाणसागर परियोजना जैसे बड़े बांध क्या अयोग्य इंजीनियरों ने बना डाले थे? या फिर चौबे जी सर्वगुणसंपन्न होने के साथ ही सर्वव्यापी भी हैं। जो वे हरेक बांध, प्रत्येक नहर, सभी भूमिगत पाइपलाइन के मुहाने पर एक साथ मौजूद रह कर अपनी देखरेख में जलसंसाधन विभाग के काम करा रहे हैं। अरे भईया, विभाग प्रमुख तो महीने के तीस दिन में से ज्यादातर समय ऑफिस में मौजूद रहता है, मीटिंग-मीटिंग खेलता है और दूसरे के काम का श्रेय लेता है। यही परंपरा है विभाग प्रमुख पद की। यानी काम उन निचले स्तर के इंजीनियरों का जो गर्मी, सर्दी और बरसात में फील्ड पर काम कराएं और फिर भी अकुशल ठहराए जाएं..!
 दूसरे नजरिये से देखें तो चौबे ने कम से कम पैतीस-चालीस साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की होगी। उनके इंजीनियर बनने के बाद क्या प्रदेश और देश के तकनीकी कॉलेजों ने कुशल इंजीनियर तैयार करना ही छोड़ दिया है? जो विभाग में योग्यता, तकनीकी क्षमता और नेतृत्व की काबिलियत का अकाल पड़ा हुआ है। ऐसे तमाम सवालों की फेहरिस्त तो किसी नहर की तरह लंबी हो सकती है, लेकिन जवाब कोई देगा नहीं। सरकार के एक इस फैसले ने विभाग के इंजीनियरों के अरमानों पर पानी जरूर फेर दिया है। विभागीय ट्री फार्मेशन का टॉप तो किसी और के लिए रिजर्व है तो नीचे के अफसरों के अवसर प्रभावित होगें ही। इसीलिए बीते चार साल में कई इंजीनियर प्रमोशन के इंतजार में रिटायर हो गए तो अब फिर कुछ और अधिवार्षिकी आयु पूरी कर घर बैठ जाएंगे और बाकी बचे लोग मदन गोपाल का जयकारा लगा कर अपनी नौकरी बजाएंगे।     


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