Saturday, November 10, 2018

...तो क्या कांग्रेस के लिए भी व्यापमं अब जिताऊ मुद्दा नहीं !



करीब पांच साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की रातों की नींद उड़ाने वाला व्यापमं घोटाला क्या इस चुनाव में कांग्रेस के लिए भी मुद्दा नहीं है? सवाल इसलिए क्योंकि इस घोटाले को उजागर करने वाले व्हिसल ब्लोअर विधानसभा तक पहुंचने के लिए अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर तैयार बैठे रहे और कांग्रेस तो क्या किसी और दल ने भी उन्हें अपना शुभंकर बनाना उचित नहीं समझा। सवाल इसलिए भी है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस किसी ने भी टिकट वितरण में व्यापमं को  पवित्रता का पैमाना नहीं बनाया।
टिकट बंटवारे से पहले तक कांग्रेस नेताओं की जुबान पर व्यापमं इस कदर चढ़ा रहता था कि शिवराज सिंह चौहान की जगत मामा वाली छवि को वह कंस मामा बताने तक से परहेज नहीं कर रही थी। कांग्रेस को मसाला मिल रहा था पीएमटी सहित प्रदेश में हुई भर्ती परीक्षाओं की गड़बड़ियों को आरटीआई के जरिए खुलासा करने वाले एक्टिविस्ट से। व्यापमं घोटाले को प्रदेश और देश की सीमाओं से पार तक पहुंचाने और इसे बोफोर्स से भी बड़ा घोटाला निरूपित करने वाले लड़ाकों में पूर्व निर्दलीय विधायक पारस सकलेचा और इंदौर के डॉ. आनंद राय प्रमुख रहे हैं। दोनों ही कांग्रेस के बड़े नेताओं के इतने करीब आए कि उन्हें भी विधानसभा पहुंचने की ललक लगी और इस ललक को कांग्रेसियों ने परवान भी खूब चढ़ाया।  
कल तक जिन व्हिसल ब्लोअर्स के सहारे कांग्रेस ठगी के शिकार हुए प्रदेश के हजारों युवाओं की बात करती थी, आज वही व्यापमं के योद्धा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। पारस दादा के नाम से मशहूर सकलेचा साल 2015 में ही कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कई अदालती मामलों में वे कांग्रेस नेताओं के साथ वादी-परिवादी बने। उन्हें रतलाम सिटी से टिकट का भरोसा भी दिलाया गया, लेकिन अंतिम सूची तक प्रतीक्षा के बाद उनके हाथ टिकट नहीं लगा। इसी तरह डॉ. आनंद राय ने भी कांग्रेस के बड़े नेताओं की गलबहियां में अपनी सरकारी नौकरी छोड़ कर इंदौर-5 से चुनावी रण में कूदने की पूरी तैयारी कर ली थी। नामांकन दाखिले की अंतिम तारीख भी उन्हें वही अहसास करा गई, जो अहसास साल भर कड़ी मेहनत करने के बाद व्यापमं की मेरिट लिस्ट में किसी थर्ड डिवीजन से पास होने वाले को देख कर पढ़ाकू युवाओं को हुई थी। उनके ही इस शक से व्यापमं घोटाले की ओर शक की सुई घूमी थी। आज इस प्रमुख राजनीतिक दल की मंशा पर वैसा ही संदेह इन योद्धाओं को हो रहा है।
पारस दादा भी कांग्रेस के इस दांव से चारों खाने चित हैं। उन्हें किसी ने भी नहीं बताया कि जो आदमी निर्दलीय विधायक बन सकता है, वह व्यापमं जैसा भंवरजाल तोड़ने के बाद भी कांग्रेस से उम्मीदवार क्यों नहीं बन पाया। डॉ. आनंद राय की पीढ़ा तो और भी तीखी रही। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आश्वासन के बाद भी उन्हें टिकट नहीं मिला। सोशल मीडिया पर सक्रिय राय ने इसे लेकर कुछ वो खबरें भी री-ट्वीट की हैं, जो कांग्रेस में टिकट बेचने के आरोप-प्रत्यारोप से जुड़ी हैं। इनसे अलग एक और युवा अर्जुन आर्य हैं, जो लंबे समय में बुदनी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लोगों को एकजुट कर रहे थे और कांग्रेस में शामिल होने के लिए समाजवादी पार्टी का टिकट वापस लौटा दिया। आर्य ने वर्तमान स्थिति से समझौता कर कांग्रेस प्रत्याशी अरुण यादव के लिए काम करने का ऐलान किया है।
व्यापमं के दागियों को बेनकाब करने वाले ये लड़ाके कांग्रेस का चेहरा नहीं बन सके तो क्या हुआ। कांग्रेस पर भी आरोप लग रहे हैं कि उसने व्यापमं दागी रहे फुंदेलाल मार्को को फिर से विधानसभा का टिकट थमा दिया है। कभी व्यापमं का नाम लेने वाले से भी दूर भागने वाली भाजपा ने भी इस मामले में जेल जा चुके पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के भाई उमाकांत को टिकट दिया है। शिवराज और लक्ष्मीकांत के सिरोंज मिलाप की फोटो, पहले ही फोटो ऑफ द मंथ का खिताब पाने लायक आंकी गई है। भाजपा से कांग्रेस इस मायने में अपनी साख बचाती दिख रही है कि उसने अपने वचन-पत्र में व्यापमं और शिवराज सरकार के घोटालों की जांच के लिए जनआयोग बनाने की घोषणा की है। लेकिन सवाल अभी भी बाकी है कि व्यापमं यदि जिताऊ मुद्दा है तो कांग्रेस को व्यापमं से व्हिसल ब्लोअर्स को टिकट से परहेज क्यों है?  
   


Friday, November 9, 2018

शाहगीरी...आईना बोलता है...


काम न आया दिल्ली दरबार का दम,  एक तराजू में तौले सारे बम
संस्कारवान, पंचनिष्ठा में निष्ठ, अनुशासित और पार्टीलाइन को मानने वाले कार्यकर्ताओं के दल भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं से अच्छे तो वो करोड़ों कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने एसएमएस से सदस्यता ली थी। निष्ठावानों की निष्ठा देखकर उन्हें भी शर्म आ गई होगी। भाजपा के जन्म के पहले से उसके साथ जुड़े पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद सरताज सिंह अकेले निष्ठाभंग का उदाहरण नहीं हैं। अस्सी पार के बाबूलाल गौर भी जनसंघ और संघ के पुराने कार्यकर्ता और स्वयंसेवक हैं, दस बार के विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री और चार सरकार में मंत्री रहे गौर भी एक टिकट के लिए पार्टी से बगावत को उतावले हुए तो नए नवेले भाजपाई विरोध का बिगुल क्यों नहीं फूंकते। पार्टी ने किसी की ऊंची आवाज सुनी तो किसी की दबा दी। टिकटों के इस खेल में कई बड़े चेहरे बेनकाब हुए हैं तो कुछ को जमीन भी दिखी है।
भारतीय लोकतंत्र से भी ज्यादा खुद को लोकतांत्रिक कहने का दम भरने वाली मध्यप्रदेश भाजपा में टिकट वितरण के बाद आज कुछ बचा है तो उसका श्रेय डिक्टेटर की भूमिका निभाने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को जाता है। शाह की शाहगीरी के सामने उनके खासमखास माने जाने वाले राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पानी भरते नजर आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुडबुक में रहने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भी अपना असली वजन पता चला। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हों या फिर चौथी बार सरकार बनाने के लिए टिकट और रिश्तों की कशीदाकारी कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी को शाह ने एक तराजू से तौला।
टिकट क्लेश के बाद साफ हो गया है कि कैलाश पुत्र आकाश विजयवर्गीय का सियासी आगाज उनकी मनपसंद सीट इंदौर-2 से नहीं होने वाला, भले ही दो बार के विधायक और कैलाश के खास साथी रमेश मेंदोला कुर्बानी देने के लिए तैयार बैठे रहे। आकाश के लिए भाजपा स्टार प्रचारक विजयवर्गीय को अब कांटे की टक्कर वाली सीट इंदौर-3 में समय देना होगा। एक परिवार से एक टिकट की सुल्तानी लकीर के आगे प्रदेश के भावी मुख्यमंत्रियों में गिने जाने वाले कैलाश विजयवर्गीय को अपनी महू सीट के साथ ही समर्थकों के टिकट भी गंवाने पड़े, सो अलग। बेटे के लिए पिता का यह बलिदान पांच माह बाद लोकसभा चुनाव में कमल की तरह खिलेगा या नहीं, फिलहाल कहना मुश्किल है। 'भाई’  कैलाश की ही तरह सुमित्रा 'ताई’ भी अपने बेटे के लिए मनपसंद सीट नहीं जुगाड़ पाईं तो इस बार भी मंदार महाजन विधानसभा की चौखट लांघने की तमन्ना दिल में ही रख कर रह गए।
मालवा से दूर ग्वालियर-चंबल अंचल में अपने पुत्र देवेंद्रप्रताप सिंह 'रामू’  के लिए दिमनी की जमीन तैयार करना केंद्रीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भारी पड़ गया। अंदरखाने की फुसफुसाहटों को सही मानें तो चुनाव समिति की बैठक में ही शाह ने कह दिया कि तोमर अपने मंत्री पद या बेटे की विधानसभा टिकट में से एक चुन लें। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बैसाखी भी रामू का सहारा नहीं बन सकी। बस क्या था, दिमनी देवेंद्र की न हो सकी, लेकिन रही पुराने पारिवारिक रखवाले के ही पास। कांग्रेसी से भाजपाई बने चौधरी राकेश सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बलि उनके भाई मुकेश चतुर्वेदी को अपनी सीट गंवा कर देनी पड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा को भी सांसदी छोड़ कर फिर विधायकी का टिकट हासिल करने के लिए दिल्ली दरबार के बजाए मंदिरों में हाजिरी लगानी पड़ी, तब कहीं जाकर उनकी लाटरी खुली।
भोपाल में गौर पर गौर हुआ क्योंकि बाबूलाल ने एक तो गोविंदपुरा के साथ हुजूर सीट पर भी भाजपा का गणित बिगाडऩे की चेतावनी दे डाली। दूसरे, कार्यकर्ता महाकुंभ के मंच पर माइक से दूर नरेंद्र मोदी द्वारा मुलाकात में सहज कहे गए जुमले 'गौर एक बार और’  को सार्वजनिक कर उन्होंने अपने टिकट को प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। मोदी की प्रतिष्ठा को अमित शाह चाह कर भी ठेस नहीं पहुंचा सकते। पचास साल की अपनी जमीनी जमावट और भाजपाई सियासती अनुभव के दम पर गौर ने बहू कृष्णा का टिकट तय कराया और खुद के लिए मार्गदर्शक मंडल का रास्ता चुना। दिग्गज हों या जवां खून वाले दावेदार शाहगीरी की तलवार ने सभी को आईना दिखाने में संकोच नहीं किया। सिंधिया घराने की मामी माया सिंह और लोधी नेता कुसुम महदेले मंत्री रहते हुए टिकट नहीं बचा पाईं तो मंत्री गौरीशंकर शेजवार और हर्ष सिंह ने अपने बेटों के लिए राजनीतिक वानप्रस्थ स्वीकार किया। मंत्री गोपाल भार्गव का रहली से बेटे को टिकट दिलाने का देवरी विजय का पांसा बेकार गया तो दमोह से जयंत मलैया भी शाह की परख में बेटे सिद्धार्थ से ज्यादा जिताऊ निकले। एक परिवार एक टिकट नीति के अपवाद हैं तो केवल शाह बंधु- विजय और संजय शाह। दोनों पिछली बार भी भाजपा से विधायक थे इस बार भी उम्मीदवार हैं।     



Sunday, November 4, 2018

सियासी धोखेबाजी:एक ने बहन और जीजा का छोड़ा साथ, दूसरे ने आदिवासी संगठन को !


पैडमैन फिल्म में संजय सिंह मसानी 

चुनाव के वक्त दल-बदल कोई नई बात नहीं है। बिना किसी पद के जनता की सेवा का दम भरने वाले नेता अपने राजनीतिक दल से टिकट न मिलने पर विरोधी विचारधारा वाली पार्टी में पैराशूट लैंडिंग भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के जन्मकाल से ही करते रहे हैं। सियासी धोखेबाजी के इस खेल में जो दांव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह मसानी और जयस के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संरक्षक डॉ. हीरा अलावा ने चला है, वह तो इस मैदान में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
संजय सिंह मसानी की राजनीतिक सामाजिक हैसियत और पहचान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ही जुड़ी हुई है। पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के छोटे से शहर गोंदिया के निवासी संजय को शिवराज के मुख्यमंत्री बनने से पहले मध्यप्रदेश में उंगलियों पर गिनने लायक लोग ही पहचानते रहे होंगे। तेरह साल के शिव-राज में ही वे बड़े उद्योगपति, सिने कलाकार और पत्रकार जैसी विविध कलाओं में पारंगत हुए और नाम कमाया। महाराष्ट्र छोड़कर मध्यप्रदेश की स्काउट एवं गाइड जैसी संस्था में भी वे किला लड़ाते दिखे। भोपाल के मुख्यमंत्री निवास से लेकर शिवराज के सालाना गणेश प्रतिमा विसर्जन समारोह तक में परिवार के अहम सदस्य की भूमिका निभाते हुए वे लाइम लाइट में रहने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। शिवराज के वहीं संजय, साधना सिंह के वही रसूखदार भाई संजय... अचानक कांग्रेस के मंच पर नजर आए तो उन्हें शिवराज में खामियां ही खामियां दिखाई देने लगीं। बहन की राखी की लाज रखने की कसमें खाने वाले वही संजय आज शिवराज के रिश्तेदार हो गए, जो कल तक उनके सगे भाइयों से ज्यादा परिवार का हिस्सा होते थे। नाते-रिश्तेदारों के राजनीतिक पलटी मारने का यह कोई पहला मामला नहीं है। कभी सिंधिया घराने के मां-बेटे ने अलग-अलग दलों की सवारी की परिपाटी शुरू की थी। श्यामला हिल्स के जिस मुख्यमंत्री निवास से अब संजय ने रूखसती ली है, उसी सीएम हाउस में दस साल तक बड़े राजा और छोटे राजा के तौर पर पूजे जाते रहे दिग्विजय सिंह और लक्ष्मण सिंह की जोड़ी भी दिग्विजयी सरकार गिरते ही टूट गई थी। छोटे राजा यानी लक्ष्मण ने भाई की विरोधी पार्टी भाजपा में कदम रखा और उससे सांसद भी बने। जब तक लक्ष्मण भाजपाई रहे, दिग्विजय के खिलाफ एक भी मामला अदालत या थाने की चौखट नहीं चढ़ा। भले ही उन्हें मुख्यमंत्री निवास से बेदखल करने वाली उमा भारती और भाजपा ने कभी न छोडऩे का ऐलान कर रखा था। अब चुनावी बेला में मध्यप्रदेश के वारा सिवनी से विधायक बनने की तमन्ना रखने वाले संजय ने अपने बहनोई से रुष्ट होकर कांग्रेस का दामन थामा है। हालांकि उन्हें करीब से जानने वाले कहते हैं कि संजय किसी योजना का हिस्सा नहीं बने हैं, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने ही शिवराज से कमलनाथ को बेहतर बताने को मजबूर किया है। हो सकता है यह उनकी अंतरआत्मा की आवाज हो।
राहुल गांधी के साथ आरटीआई एक्टीविस्ट डॉ आनंद राय, हीरा अलावा और दीपक बावरिया
दूसरी घटना सूदूर आदिवासी क्षेत्र की है। यहां एम्स दिल्ली की नौकरी छोड़कर आए डॉ. हीरालाल अलावा ने 'अबकी बार आदिवासी सरकार' का नारा देकर युवाओं की ऐसी फौज बनाई कि कांग्रेस और भाजपा के पसीने छूट गए। अलावा ने कांग्रेस से सीटों के बंटवारे का खेल खूब खेला। कुक्षी को केंद्र में रखकर मांग 80 सीट से शुरू होकर 15 तक पहुंची, लेकिन बात नहीं बनी। कल यानी कांग्रेस की लिस्ट जारी होने से चंद घंटे पहले तक अलावा अपने दम पर आदिवासी सरकार बनाने की हुंकार भर रहे थे और रात में वो अचानक बड़े ही गुपचुप ढ़ंग से मनावर से कांग्रेस उम्मीदवार हो गए। सूची आते ही कल तक पूजे जाने वाले डॉ. अलावा जयस के लिए धोखेबाज अलावा हो गए। जयस चुनाव प्रभारी समिति के अध्यक्ष और संरक्षक राजेंद्र पंवार अब अपने दम पर 22 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने का दावा कर रहे हैं। यह और बात है कि वे अलावा के खिलाफ उम्मीदवार नहीं देंगे तो उनका समर्थन भी नहीं करेंगे। लेकिन जयस में आज जो गूंज रहा है वह अलावा के खिलाफ उठ रही
आवाजें हैं। इस आवाज और भोपाल से उठती ध्वनि में साम्य है। श्यामला हिल्स के  खास बंगले के भीतर से उठती दबी आवाज हो या कुक्षी, मनावर में सड़क पर चीत्कार करता स्वर....एक ही शब्द मुखर है.....धोखेबाज।

Friday, October 26, 2018

भाजपा और सुहास भगत का परिवारवाद


ठीक ढाई साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी से मुक्त होकर भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री जैसे घनघोर राजनीतिक दायित्व पर आए थे प्रचारक सुहास भगत। आते ही पहली बैठक में उन्होंने पार्टी में परिवार भाव से काम करने की मंशा जताई थी और पदाधिकारियों से भी यही अपेक्षा की थी। लेकिन, भगत का परिवार भाव देखने की कार्यकर्ताओं की अभिलाषा कोरी अभिलाषा ही लगने लगी थी। भगत ने अपने आसपास ऐसा एकांतवाद रच रखा था कि सत्ताधारी दल के नेताओं को भी उनके तिलस्म को भेदने का औजार नहीं मिल रहा था। नंदकुमार सिंह चौहान के प्रदेशाध्यक्ष रहते तक भगत का भगतभाव ही नजर आता रहा। इस दौरान उन्हें भाजपा के लिए अनुपयुक्त निरुपित करने वाले भी बहुत से लोग हो गए थे।  
कांधे पर झोला टांगे और हाथ में स्मार्टफोन लिए संघ शैली के भाजपाई सुहास जी से करीब से मिलने में कार्यकर्ता तो क्या नेता तक संकोच करने लगे थे। वही सुहास भगत आज प्रदेश भाजपा कार्यालय में खुला दरबार सजा रहे हैं, जो कुछ दिन पहले तक अबूझ पहेली से थे। भगत के इस दरबार में पार्टी का हर आम और खास हाजिरी लगा रहा है और उनकी सहजता का कायल हो रहा है। उन्होंने इसके लिए गोल कार्यालय के अपने कक्ष को नहीं चुना। वीआईपी कक्ष की आलीशान बैठक या निवास के नीचे बना नया मीटिंग रुम सह निजी कार्यालय भी उनके दरबार का स्थान नहीं बना। दरबार लगता है उस स्थान पर जो उनके निवास और गोल बिल्डिंग के बीच का गलियारा है। प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ भगत टिकटार्थियों से मिलते हैं। टिकट मांगने वाला केदारनाथ शुक्ल जैसा दो बार का विधायक हो, पूर्व मंत्री हो या फिर कोई नया टिकिटार्थी। सभी के साथ है उनका समान भाव। सुबह से गलियारे में मजमा लगने लगता है। सुहास जी जब-तब कुर्सी पकड़ कर इसी स्थान पर लोगों की सुनते हैं। उसी शांत भाव से, जैसे वे भाजपा में आने के समय थे, लेकिन नारेबाजी न करने की कड़ी नसीहत के साथ। आवेदन लेना, दावे सुनना, विचार करने का दिलासा देना और उठ कर मीटिंग के लिए चले जाना। कार्यालय में टिकट मांगने वालों का मेला लगने के साथ उनका यह रोज का उपक्रम हो गया है।  कल शाम ही सागर से कुछ संत-महात्मा लेकर ब्राह्मण समाज के दावेदार आए थे। महात्मा बंद कमरे में बात करना चाहते थे और भगत के निवास के दरवाजे तक भी पहुंच गए। भगत ने उनसे खुले दरबार में मिलना श्रेयस्कर समझा, जहां बाकी लोगों की सुनते-सुनाते हैं। क्या बातें हुईं, वहां मौजूद तमाम लोग सुन और गुन रहे थे। यह क्रम सुबह से रात तक कई बार चलता है। लोगों को भी उनका ठीया दिख गया है। अब तो गलियारे में ही दावेदार और मुलाकाती इंतजार करते हैं। जिस जगह पर संगठन मंत्री की कार खड़ी होती थी वो टिकट बंटवारे तक तीर्थ सी बन गई है। वजह, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल हों या कोई अन्य बड़ा नेता, महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठकें इसी गलियारे से सटे भगत के निजी मीटिंग हॉल में जो होती है। यहां लगे चैनल गेट पर कार्यालय के कर्मचारियों के साथ संगीनधारी पुलिस का जवान इसकी महत्ता की गवाही भी देता है। यह और बात है कि गाहे बगाहे गलियारे पर पर्दे की आड़ भी की जाती है, लेकिन दरबारी तो दरबार खोज ही लेते हैं।
प्रदेश संगठन महामंत्री की यह शैली भाजपा के सत्ता में आने के बाद से तो कतई नहीं रही। 2002-03 में कप्तान सिंह सोलंकी के तेज के सामने आम दावेदार तो क्या अच्छे अच्छे नेताओं की भी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उनसे सहजता से अपनी बात कह सकें। उनके पूर्ववर्ती कृष्णमुरारी मोघे सहज थे तो कप्तान के बाद आए माखन सिंह इतने सरल कि उनकी जगह दावेदार सह संगठन महामंत्रियों अरविंद मेनन और भगवतशरण माथुर की शरण लेना ज्यादा पसंद करते थे। फिर आया मेनन युग, कुछ कुछ सोलंकी काल जैसा, लेकिन कप्तान से बहुत जुदा। मेनन के पास सबकी कुंडली थी और सामने वाले के लिए कोई न कोई नुस्खा या पहेलीनुमा नसीहत भी। पसंद और नापसंद जताने के उनके तरीके के साथ उनकी तेजी बहुतों को रास नहीं आई। मेनन के उत्तराधिकारी सुहास भगत तो पक्के भगत निकले और करीब दो साल तक शांति से पार्टी की परख करते रहे। देश-दुनिया और पार्टी के घटनाक्रम से हमेशा अपडेट रखने वाले अपने स्मार्टफोन की तर्ज पर उन्होंने नेताओं और पदाधिकारियों की भी रैम और मेमोरी खंगाल ली, फिर अपना अंदाज दिखाना शुरू किया। राकेश सिंह के अध्यक्ष बनते ही भगत की सक्रियता प्रस्फुटित होने लगी और अब मुखरित भी। यह कारक ही भगत की असली छवि का निर्माण कर रहा है।

Tuesday, October 23, 2018

अथ कम्प्यूटर बाबा कथाः शिव-राज को नफा कम, नुकसान ज्यादा




हर कम्प्यूटर का अपना अलग कन्फिगरेशन होता है और समय के साथ उसका साफ्टवेयर अपडेट होता है, तो कभी हैंग भी। कम्प्यूटर पर ज्यादा सर्फिंग की और सही एंटीवायरस नहीं रखा तो वायरस की मार से उसका इन्फेक्टेड होना भी स्वाभाविक है। अपनी तेज रफ्तार जीवन शैली और कम्प्यूटर का कथित एडिक्शन होने के कारण दिगंबर अखाड़ा के संत नामदेव त्यागी का नाम ही कम्प्यूटर बाबा हो गया। वे भी खुद को इसी नाम से पुकारा जाना पसंद करते हैं क्योंकि यह उन्हें अलग पहचान देता है।

कम्प्यूटर बाबा की महत्वाकांक्षा का संपूर्ण परिचय इतने शब्दों में ही समाहित हो सकता है। लेकिन नहीं, कम्प्यूटर चलाते-चलाते बाबा समय के साथ इतने लय-ताल में हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा सेवा यात्रा की कमजोर नस ऐसी पकड़ी कि उन्हें ही चकरघिन्नी बना रखा है। कभी कम्प्यूटर बाबा को साधने के लिए बड़े और नामी संत-महात्माओं की मदद लेने की चर्चा होती है तो कभी बाबाओं का जमावड़ा लगा कर प्रशस्तिगान कराना पड़ रहा है। लेकिन ‘त्यागी’ बाबा हैं कि कम्प्यूटर के शुद्ध हिंदी नाम संगणक जैसे ही अबूझ बने हुए हैं। वे अहसास करा रहे हैं कि क्षणिक लाभ के लिए बैरागी बाबाओं से नजदीकी और सत्ता की राह दिखाने के कितने फायदे हैं और कितना ज्यादा नुकसान है।
 सिंहस्थ के दौरान अपनी नाराजगी और मान-मनौव्वल से चर्चित हुए कम्प्यूटर बाबा की सियासत कथा महज छह माह पुरानी है। पहले सधे हुए अंदाज में बाबा ने नर्मदा सेवा की असलियत खोलने का दम भरा तो उनके साथ चार और संतों को तत्काल नर्मदा की सेवा के लिए बनी एक समिति का सदस्य बना कर शिवराज ने राज्यमंत्री दर्जा और इस दर्जे की तमाम सुख सुविधाएं तोहफे में दे दीं। सत्ता का साथ मिला तो महत्वाकांक्षाओं ने ऐसी उड़ान भरी कि बाबा को चुनावी अखाड़ा दिखने लगा। उनका कम्प्यूटर राजनीति का दुर्गम प्रमेय नहीं तोड़ पाया तो बाबा को मंत्री दर्जे और सरकार प्रेम से ही विरक्ति हो गई। उन्होंने फिर दम भर दिया नर्मदा की असलियत उजागर करने का। इंदौर में बाबा का सरकार विरोधी धार्मिक मंच सजने से पहले ही उनके साफ्टवेयर को डिकोड करने और वायरस का तोड़ निकालने के जतन होने लगे थे। इसी कड़ी में गत दिवस भोपाल में हुई संत सभा में साधु संतों ने शिवराज का ऐसा यशोगान किया कि राजवंशी परंपरा लोगों को याद आ गई। शिवराज के 13 साल के कार्यकाल में धर्म और समाज के लिए हुए कार्यों को गिनाने के लिए बनाए गए कीर्तिपत्र के लिए संतों को आठ पेज भी कम लगने लगे थे। संत परंपरा के इन सियासती साधकों में उस मुख्यमंत्री के साथ सेल्फी खिंचाने की होड़ लगी रही, जो उनकी चरणवंदना करता है।
सवाल यह है कि क्या एक कम्प्यूटर बाबा इतने सक्षम हैं कि सरकार उनसे धर्मभीरू होने की पराकाष्ठा से भी आगे बढ़ कर भयग्रस्त है। जब बाबा ने विरोध का बिगुल फूंका तो शांत करने मंत्री दर्जा और शॉल श्रीफल थमा दिया और आंख मींच लीं। बाबा फिर रुष्ट हुए और अबकी नहीं मानेंगे, लगा तो उनके मुकाबले संतों की संगोष्ठी उतार दी। सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रमों में मुख्य मंच के आसपास बने चबूतरेनुमा मंच पर पूरे समय शोभा के फूल बनने वाले ये संत महात्मा क्या समाज सुधारक संतों का प्रतिनिधित्व करते हैं? ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा बुलंद करने वाली पार्टी के नेता क्यों इनको साधना से भटका कर सियासती मोहरे बनाते हैं ? ‘काम बोलता है’ तो फिर इन लटकों झटकों की जरूरत क्यों पड़ती है। क्यों कोई बाबा कभी सरकार विरोधी और कभी अचानक सरकार भक्त हो जाता है ! और क्यों समय के साथ उसे नेताओं की भक्ति से विरक्ति हो जाती है। नेता और संतों का यह मेल-बेमेल गठबंधन क्या उचित है, यह मतदाताओं को ही तय करना होगा।     

Sunday, October 21, 2018

आइडिया में तो है दम.....नो उल्लू बनाविंग!



बेटी, बुजुर्ग और कमंडल के बाद अब शिवराज के टारगेट पर ‘स्मार्ट’ युवा


प्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने आज एक नया पांसा फेंका है। एक आइडिया जो बदल दे आपकी दुनिया... एक मशहूर मोबाइल कंपनी के विज्ञापन का यह स्लोगन ही भाजपा को चुनाव के दौरान नए वोटबैंक को खींचने का आइडिया दे गया। हर हाथ में स्मार्ट फोन वाली नई जनरेशन के लिए भाजपा ‘आइडिया में है दम? पूरा करेंगे हम!’ स्लोगन के साथ ‘समृद्ध मध्यप्रदेश’ अभियान लेकर आई है।
व्हाट एन आइडिया सर जी! स्मार्ट फोन और गूगल बाबा के दम पर खुद को दुनिया भर का बुद्धिमान मानने वाली युवा पीढ़ी को लुभाने का इससे बेहतर आइडिया कोई और नहीं हो सकता, वो भी ऐन चुनाव के मौके पर। भाजपा के अत्याधुनिक संचार सुविधाओं से युक्त रथ यूथ हंटिंग पर निकल गए हैं। कॉलेज परिसर, यूथ कैंपस के साथ सार्वजनिक स्थान पर यह रथ युवाओं को आकर्षित करेंगे और मध्यप्रदेश को बदलने का सुझाव लेंगे। इस आइडिया के साथ कि ‘आइडिया में है दम? पूरा करेंगे हम!’ 
 मजे की बात है कि भाजपा का यह विज्ञापन बनाने वालों ने ही “आइडिया” की दमदारी पर प्रश्नवाचक चिन्ह (?) लगा दिया है। इतना ही नहीं “पूरा करेंगे हम” उद्घोष भी विस्मयबोधक चिन्ह (!) के साथ है। यदि थोड़ा और विस्तार में जाएं तो इस अभियान से मिलने वाले सुझाव घोषणापत्र में शामिल करने से भाजपा प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर साफ इंकार कर चुके हैं। उनकी सफाई है कि घोषणापत्र तैयार करने की उनकी अलग व्यवस्था है। समृद्ध मध्यप्रदेश अभियान में मिले सुझाव सरकार बनने के बाद विचार में आएंगे। तोमर अपनी बात को वजन देने के लिए सीएम हाउस में हुई पंचायतों से निकले आइडिया पर अमल की दुहाई देते हैं।
 बहरहाल, सरकार फिर भाजपा की बनी तो उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रदेश के युवाओं के आइडिया से चलेगी और राज्य को समृद्ध बनाएगी। लेकिन उसके लिए जो प्रयत्न किए जा रहे हैं और जो टारगेट ग्रुप चुना गया है वह भाजपा के योजनाकारों के दमदार आइडिया की दाद देने लायक है। सरकार में रहते हुए 2008 के चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की आधी आबादी यानी नारी शक्ति पर फोकस कर चुनाव लड़ा था और लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना जैसी सामाजिक सरोकारों की योजनाओं के जरिए पहली बार चौके-चूल्हे तक पहुंच बनाई थी। इसके बाद 2013 के चुनाव में पुरानी योजनाओं को मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना, अंत्योदय अन्न योजना की चाशनी में पगा कर बुजुर्ग और उनके बेटे-बेटियों तक को लुभाया था। कभी सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास तक सीमित रहने वाली सरकार को लोगों के सुख-दुख का सहभागी बनाने का यह सफल आइडिया भाजपा को खूब रास आया।  
 इस बार सिंहस्थ और नर्मदा सेवा यात्रा के जरिए धार्मिक रुझान दिखाने के साथ किसान और गरीबों के लिए बिजली बिल माफी और संबल योजना का सहारा तो है ही, एट्रोसिटी एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर सबसे ज्यादा मुखर युवाओं को इन मुद्दों से हटा कर आइडिया के दम पर खुद से जोड़ने का तरीका भाजपा ने खोजा है। 
रथ को झंडी दिखाते शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर
 यह अभियान ‘चौथी बार शिव-राज’ के लिए एक नया वोटबैंक खड़ा करने की कोशिश है। इसीलिए ‘मेरा सुझाव, मेरा चुनाव’ जैसा आकर्षक जुमला ईजाद किया गया है। जिसकी जद में 40 साल से कम उम्र के प्रदेश के 56 फीसदी मतदाता हैं। इनमें भी खास फोकस 18 से 29 साल के एक करोड़ 53 लाख से अधिक वोटर पर है, जिनमें से करीब आधे ऐसे हैं जो पहली बार मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
  रोजगार तलाशते-तलाशते परंपरागत प्रचार के तरीकों के बीच सत्ता में सहयोग के लिए अपनी आवाज का रास्ता खोज रही ‘हंगरी क्या’ वाली पीढ़ी को भाजपा का यह आइडिया ‘खुशियों की होम डिलीवरी’ की ‘राइट च्वाइस’ लग सकता है। बस, ध्यान रखना होगा कि चुनाव नतीजे आने के बाद यही पीढ़ी कहीं बोलने को मजबूर न हो जाए.... ‘नो उल्लू बनाविंग’।

Wednesday, August 23, 2017

दिल से नहीं, डंडे से मानते हैं अफसर!

प्रदेश के प्रशासनिक मुखिया बसंत प्रताप सिंह से लेकर राजस्व महकमे के छोटे और बड़े अफसर आजकल राजस्व मामलों की पेंडेंसी दूर करने में जुटे हुए हैं। आलम यह है कि मुख्य सचिव को भी जिलों में लंबित मामलों को निपटाने के निर्देश देने के लिए मंत्रालय के बाहर निकल कर संभागीय बैठकें लेनी पड़ रही हैं। सवाल यह है कि बंटवारे और नामांतरण के मामले निपटाने की इतनी हड़बड़ी क्यों है? कहीं राजस्व संबंधी मामले पेंडिंग मिलने पर कलेक्टरों को उल्टा टांगने की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की गर्जना तो इसका कारण नहीं? यदि ऐसा है तो क्या वाकई इतने छोटे मामलों में इस बार अफसर नपेंगे? या फिर केंद्र सरकार की तर्ज पर काम न करने वालों को अनिवार्य सेवानिवृत्त देने की धमकी ने उत्प्रेरक की भूमिका अदा की।

रेवेन्यू से जुड़े मामलों में अचानक परवान चढ़ी सक्रियता की वजह भरपूर सहायता और सुविधाओं के दावे के बीच अचानक उपजा किसान आंदोलन है। इसकी आंच झेल चुकी सरकार ने किसान और गांव वालों को खुश करने के जो उपाय तलाशे हैं उनमें एक उपाय राजस्व संबंधी मामलों का निराकरण भी है। लेकिन यह सक्रियता प्रदेश सरकार, उसके कामकाज के तरीके और पूरी अफसरशाही को कटघरें में खड़ा करती है। यदि मुख्यमंत्री धमकी नहीं देते तो क्या हजारों-लाखों बंटवारे और नामांतरण के अविवादित मामले और कई साल तक लटके रहते? क्या कलेक्टर, अनुविभागीय अधिकारी, तहसीलदार और नायब तहसीलदार अपने कार्यक्षेत्र के ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे थे, या फिर उनकी रूचि इन प्रकरणों में नहीं है, अथवा सरकार के दीगर कामों के बीच उन्हें इनके लिए समय ही नहीं मिल रहा? क्या हर मंगलवार को सभी दफ्तरों में होने वाली जनसुनवाई महज रस्मी हो गई है, जिनमें किसान और आम आदमी अपने इन्हीं प्रकरणों के निराकरण नहीं होने की शिकायत लेकर आता है। मुख्यमंत्री के जनशिकायत निवारण के फोरम समाधान ऑनलाइन और सीएम हेल्पलाइन भी इसके लिए कारगर साबित नहीं हो रहे! और तो और हर महीने मुख्य सचिव द्वारा की जाने वाली ‘परख’ वीडियो कान्फ्रेंस एवं इसके इतर होने वाली जिलों की समीक्षाएं भी बेकार साबित हो रही हैं।

आम जनता के दुःख दर्द दूर करने और सुशासन देने के तमाम उपायों के बावजूद मुख्यमंत्री को भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रम में राजस्व कोर्ट के लंबित मामलों को लेकर कलेक्टरों को उल्टा टांगने की बात कहने की जरूरत अगर पड़ी है तो साफ है पूरे सिस्टम में कम-से-कम इस मामले में तो खोट है। ऐसा नहीं होता तो मुख्य सचिव को क्यों सिर्फ राजस्व प्रकरणों को लेकर संभाग-संभाग भटकना पड़ता। नहीं तो, बड़े-बड़े मामलों पर ‘वीसी’ मंत्रालय के आरामदेह वीडियो कान्फ्रेंसिंग कक्ष से ही कर ली जाती है। चीफ सेक्रेटरी संभागों के लिए निकले भी तब जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें इसके निर्देश दिए, अन्यथा निजाम जैसा चलता है वैसा ही चलता रहता (खुद मुख्यमंत्री ने एक से अधिक मौकों पर मुख्य सचिव को संभागों में जाकर राजस्व मामलों पर बैठक करने के निर्देश देने की जानकारी दी है)। मुख्यमंत्री को इसके बाद भी भरोसा नहीं था, इसीलिये विभाग में प्रमुख सचिव और सचिव होने के बावजूद अपने सचिव हरिरंजन राव को दूसरे राजस्व सचिव की भी जिम्मेदारी देकर ब्यूरोक्रेसी को चौंका दिया। पार्टी बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने अपनी पहली रेडियो वार्ता ‘दिल से’ में तीन माह बाद अविवादित नामांतरण और बंटवारे का प्रकरण बताने वालों को ईनाम देने की घोषणा भी कर दी। यानी सीएम के रडार पर अब राजस्व कोर्ट के मामले प्रमुखता से हैं।

लेकिन सवाल फिर वही है कि प्रशासनिक अफसरों को क्यों बार-बार उनके काम की याद मुख्यमंत्री को दिलानी पड़ती है। यदि चीफ मिनिस्टर न बोलें तो प्रशासन अपना काम नहीं करेगा? सीएम के इन निर्देशों से यही इंगित होता है। लगातार सत्ता के 14 साल पूरे कर रहे बीजेपी राज पर आरोप भी यही लगते हैं कि सरकार अफसर चला रहे हैं। इस आवरण को तोड़ने का जतन गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री ऐसी सख्ती दिखा कर करते हैं। फिलहाल तीन माह की डेडलाइन बीतने के बाद ही पता चलेगा कि असलियत क्या है, लेकिन इस बीच राजस्व विभाग के अफसर दावा कर रहे हैं कि तीन माह में पुरानी पेंडेंसी खत्म कर दी जाएगी। यह और बात है कि जिलों में तैनात अफसरों में उल्टा टांगने वाले बयान को लेकर प्रतिक्रिया अच्छी नहीं है।

समाधान में मिलेगी सजा !

मुख्यमंत्री ने समाधान ऑनलाइन में अब जनशिकायतों के साथ ही लोकसेवा गारंटी और सीएम हेल्पलाइन के प्रकरणों संबंधी शिकायतें सुनने का भी फैसला किया है। अफसरों में राजस्व संबंधी मामलों को हड़बड़ी में निपटाने की एक वजह यह भी है। समाधान ऑनलाइन वो फोरम है जहां वीडियो कान्फ्रेंसिंग में शिकायतकर्ता की मौजूदगी में काम न करने वाले अफसरों को सफाई पेश करनी होती है। इस समीक्षा में अब तक एक आईएएस, एक आईएफएस समेत दर्जनों अफसरों को निलंबन की सजा मिल चुकी है।

मंत्री भी तो नहीं सुनते....

मुख्यमंत्री के निर्देश अफसर नहीं मानते हैं, यह आरोप अपनी जगह। लेकिन, प्रदेश के मंत्री भी मुख्यमंत्री के निर्देश और सलाह नहीं मानते। तभी तो हर चौथी कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री को मंत्रियों को प्रभार के जिले में जाने, गांव में रात गुजारने, समीक्षा करने जैसे निर्देश देने पड़ते हैं। हालिया कैबिनेट बैठक में भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दौरे के हवाले से ये निर्देश दिये गए। यह अलग बात है कि एक मंत्री ने प्रभार के जिलों में खुद के जाने का हवाला देकर बार-बार इस सलाह के औचित्य पर ही सवाल उठा दिये थे।

अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसक...