Friday, November 9, 2018

शाहगीरी...आईना बोलता है...


काम न आया दिल्ली दरबार का दम,  एक तराजू में तौले सारे बम
संस्कारवान, पंचनिष्ठा में निष्ठ, अनुशासित और पार्टीलाइन को मानने वाले कार्यकर्ताओं के दल भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं से अच्छे तो वो करोड़ों कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने एसएमएस से सदस्यता ली थी। निष्ठावानों की निष्ठा देखकर उन्हें भी शर्म आ गई होगी। भाजपा के जन्म के पहले से उसके साथ जुड़े पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद सरताज सिंह अकेले निष्ठाभंग का उदाहरण नहीं हैं। अस्सी पार के बाबूलाल गौर भी जनसंघ और संघ के पुराने कार्यकर्ता और स्वयंसेवक हैं, दस बार के विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री और चार सरकार में मंत्री रहे गौर भी एक टिकट के लिए पार्टी से बगावत को उतावले हुए तो नए नवेले भाजपाई विरोध का बिगुल क्यों नहीं फूंकते। पार्टी ने किसी की ऊंची आवाज सुनी तो किसी की दबा दी। टिकटों के इस खेल में कई बड़े चेहरे बेनकाब हुए हैं तो कुछ को जमीन भी दिखी है।
भारतीय लोकतंत्र से भी ज्यादा खुद को लोकतांत्रिक कहने का दम भरने वाली मध्यप्रदेश भाजपा में टिकट वितरण के बाद आज कुछ बचा है तो उसका श्रेय डिक्टेटर की भूमिका निभाने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को जाता है। शाह की शाहगीरी के सामने उनके खासमखास माने जाने वाले राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पानी भरते नजर आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुडबुक में रहने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भी अपना असली वजन पता चला। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हों या फिर चौथी बार सरकार बनाने के लिए टिकट और रिश्तों की कशीदाकारी कर रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सभी को शाह ने एक तराजू से तौला।
टिकट क्लेश के बाद साफ हो गया है कि कैलाश पुत्र आकाश विजयवर्गीय का सियासी आगाज उनकी मनपसंद सीट इंदौर-2 से नहीं होने वाला, भले ही दो बार के विधायक और कैलाश के खास साथी रमेश मेंदोला कुर्बानी देने के लिए तैयार बैठे रहे। आकाश के लिए भाजपा स्टार प्रचारक विजयवर्गीय को अब कांटे की टक्कर वाली सीट इंदौर-3 में समय देना होगा। एक परिवार से एक टिकट की सुल्तानी लकीर के आगे प्रदेश के भावी मुख्यमंत्रियों में गिने जाने वाले कैलाश विजयवर्गीय को अपनी महू सीट के साथ ही समर्थकों के टिकट भी गंवाने पड़े, सो अलग। बेटे के लिए पिता का यह बलिदान पांच माह बाद लोकसभा चुनाव में कमल की तरह खिलेगा या नहीं, फिलहाल कहना मुश्किल है। 'भाई’  कैलाश की ही तरह सुमित्रा 'ताईभी अपने बेटे के लिए मनपसंद सीट नहीं जुगाड़ पाईं तो इस बार भी मंदार महाजन विधानसभा की चौखट लांघने की तमन्ना दिल में ही रख कर रह गए।
मालवा से दूर ग्वालियर-चंबल अंचल में अपने पुत्र देवेंद्रप्रताप सिंह 'रामू के लिए दिमनी की जमीन तैयार करना केंद्रीय पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को भारी पड़ गया। अंदरखाने की फुसफुसाहटों को सही मानें तो चुनाव समिति की बैठक में ही शाह ने कह दिया कि तोमर अपने मंत्री पद या बेटे की विधानसभा टिकट में से एक चुन लें। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की बैसाखी भी रामू का सहारा नहीं बन सकी। बस क्या था, दिमनी देवेंद्र की न हो सकी, लेकिन रही पुराने पारिवारिक रखवाले के ही पास। कांग्रेसी से भाजपाई बने चौधरी राकेश सिंह की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की बलि उनके भाई मुकेश चतुर्वेदी को अपनी सीट गंवा कर देनी पड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के भांजे अनूप मिश्रा को भी सांसदी छोड़ कर फिर विधायकी का टिकट हासिल करने के लिए दिल्ली दरबार के बजाए मंदिरों में हाजिरी लगानी पड़ी, तब कहीं जाकर उनकी लाटरी खुली।
भोपाल में गौर पर गौर हुआ क्योंकि बाबूलाल ने एक तो गोविंदपुरा के साथ हुजूर सीट पर भी भाजपा का गणित बिगाडऩे की चेतावनी दे डाली। दूसरे, कार्यकर्ता महाकुंभ के मंच पर माइक से दूर नरेंद्र मोदी द्वारा मुलाकात में सहज कहे गए जुमले 'गौर एक बार और’  को सार्वजनिक कर उन्होंने अपने टिकट को प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। मोदी की प्रतिष्ठा को अमित शाह चाह कर भी ठेस नहीं पहुंचा सकते। पचास साल की अपनी जमीनी जमावट और भाजपाई सियासती अनुभव के दम पर गौर ने बहू कृष्णा का टिकट तय कराया और खुद के लिए मार्गदर्शक मंडल का रास्ता चुना। दिग्गज हों या जवां खून वाले दावेदार शाहगीरी की तलवार ने सभी को आईना दिखाने में संकोच नहीं किया। सिंधिया घराने की मामी माया सिंह और लोधी नेता कुसुम महदेले मंत्री रहते हुए टिकट नहीं बचा पाईं तो मंत्री गौरीशंकर शेजवार और हर्ष सिंह ने अपने बेटों के लिए राजनीतिक वानप्रस्थ स्वीकार किया। मंत्री गोपाल भार्गव का रहली से बेटे को टिकट दिलाने का देवरी विजय का पांसा बेकार गया तो दमोह से जयंत मलैया भी शाह की परख में बेटे सिद्धार्थ से ज्यादा जिताऊ निकले। एक परिवार एक टिकट नीति के अपवाद हैं तो केवल शाह बंधु- विजय और संजय शाह। दोनों पिछली बार भी भाजपा से विधायक थे इस बार भी उम्मीदवार हैं।     



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