Thursday, November 15, 2018

भाजपा: दिग्गजों के पट्ठे और पद-प्रतिष्ठा वाले ही बागी


आम कार्यकर्ता माने, खास बने खटाई का सबब



भाजपा से नाराज जबलपुर उत्तर के निर्दलीय उम्मीदवार धीरज पटैरिया की बगावत समझ में आती है। भाजपा की युवा इकाई के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके धीरज पार्टी के घनघोर समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। वे दो चुनाव से टिकट की उम्मीद लगाए चुपचाप बैठे थे, इस बार भी उपेक्षा हुई तो पोखरण होना ही था और हुआ भी। लेकिन, 76 साल की पकी उम्र वाले रामकृष्ण कुसमरिया को क्या कहें? जो 46 साल से जनसंघ और भाजपा के विभिन्न पदों पर सुशोभित रहे। मार्गदर्शक मंडल वाली उमर में बगावत कर कांग्रेस उम्मीदवार बने सरताज सिंह हों, समीक्षा गुप्ता या फिर नरेंद्र सिंह कुशवाह। बागियों की फेहरिस्त में शामिल ज्यादातर नेता वो हैं, जिन्हें पार्टी ने जमकर उपकृत किया है। कुछ तो उन नेताओं के खासमखास हैं, जिन पर महत्वपूर्ण चुनावी जिम्मेदारी है। ऐसे में भाजपाइयों को पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री अरविंद मेनन याद आ रहे हैं, जो पद-प्रतिष्ठा के लाभ एवं हानि का झुनझुना दिखा कर पिछले चुनाव में बागियों को बैठाते थे। मेनन से जो माना वो मीर, जो न माना वो फकीर तक के किस्से उस दौर में चलते थे।
दमोह से बागी रामकृष्ण कुसमरिया बाबाजी को मनाने लगातार दो दिन तक हेलीकॉप्टर से दमोह के चक्कर काटने वाले पोखरण फ्रेम राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा ग्वालियर की अपनी समर्थक समीक्षा गुप्ता को क्यों नहीं बैठा पाए? प्रभात का ओज न तो बाबाजी को प्रभावित कर पाया और न ही समीक्षा ही इसकी समीक्षा कर पार्टीहित में निर्णय ले सकीं। भिंड के बागी विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह केंद्रीय मंत्री और प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर के दरबारी कहे जाते हैं। विधायक राजकुमार मेव हों या पूर्व मंत्री के.एल. अग्रवाल अथवा कोई और बागी। सभी किसी न किसी नेता से सीधे जुड़े हुए हैं। बड़े नेताओं की सरपरस्ती में ही इन्हें पार्टी मे पद और सत्ता का रसूख हासिल हुआ था।
कुसमरिया का पार्टी के लिए योगदान और पार्टी की कुसमरिया को देन देखें। बाबाजी दमोह से लेकर खजुराहो तक से सांसद रहे और क्षेत्र बदल कर चार बार विधायक बने। मंत्री पद पर भी आसीन हुए। पिछला विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारे। टिकट बांटने वाली कमेटी के कई बार सदस्य रहे। खुद दूसरे क्षेत्र के टिकट के दावेदार बने और पार्टी के सर्वे में फेल हुए तो दमोह और पथरिया दो-दो विधानसभा क्षेत्रों से निर्दलीय पर्चा भर कर खम ठोक दिया। बागी हुए कुसमरिया भाजपा के उन चुनिंदा 40 स्टार प्रचारकों की सूची में विराजमान हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ इस लिस्ट में जगह पाना किसी भी नेता के लिए गौरव की बात होती है।
होशंगाबाद में कांग्रेस के उम्मीदवार बने सरताज सिंह का इतिहास खंगालें, जिनका समूचा राजनीतिक जीवन ही कांग्रेस से लड़ते हुए बीता। साल 1970 में जनसंघ के जिलाध्यक्ष से लेकर नगर पालिका अध्यक्ष, पांच बार सांसद, दो बार विधायक, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश सरकार में मंत्री जैसे पद सरताज के ताज में सजते रहे। पंजाबी होने के बावजूद भाजपा और संघ की जमीनी जमावट में उन्हें हर बार नर्मदांचल में जीत हासिल होती रही। भाजपा में ऐसे कई बागी हैं, जिनका वजूद ही पार्टी या बड़े नेताओं से है। जिन्हें दूसरे नेताओं द्वारा खाली की गई जमीन या किसी नेता को खिसका कर वो ओहदा मिला था, जिसके दम पर वे आज पार्टी को आंख दिखा रहे हैं। क्या इस बगावत की जिम्मेदारी अकेले बागियों पर है या फिर उन्हें अब तक प्रश्रय देने वाले भी इसके भागीदार हैं? तात्कालिक नाराजगी में निर्दलीय पर्चा भरने वाले ललित पोरवाल जैसे कुछ नेता तो नाम वापसी के आखिरी दिन तक उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें भी मन्नू डागा, गणेशीलाल नायक और रवींद्र अवस्थी की तरह मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का फोन आ जाए और वो वापसी कर लें। कुछ फोन से माने, कुछ अपने आप बैठ गए और जो खड़े रह गए, वो सब दिग्गजों की आंखों के तारे हैं।
बागी कांग्रेस में भी कम नहीं हैं। भाजपा जैसी समस्या वहां भी है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के चरित्र में खासा अंतर है। भाजपा खुद को अनुशासित कार्यकर्ताओं की फौज बताती है तो कांग्रेस क्षत्रपों और पार्टी से ज्यादा अपने दम पर नेतागिरी करने वालों का दल है, फिर भी वहां भाजपा से तेज कार्रवाई हो रही बागियों पर। 






1 comment:

madisynpablo said...

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