मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत 1990-96 के दौर के टी. एन. शेषन तो नहीं ही हैं, लेकिन वो उसी कुर्सी पर आसीन हैं जिस पर बैठ कर कभी शेषन ने चुनाव आयोग का ऐसा चाबुक चलाया था कि आज भी उसकी याद कर राजनीतिक दल सिहर जाते हैं। रावत में शेषन का अक्स देखने कीवजह है मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर सरकार और सत्ताधारी दल में व्याप्त भय का वातावरण। यह भय नहीं तो और क्या है कि कुछ पॉवरफुल आला अफसर चुनाव के बीच छुट्टी लेकर घर बैठ गए तो नेताओं से दूर-दराज की रिश्तेदारी वालों का भी तबादला कर दिया गया। आयोग से डर इतना है कि विपक्षी पार्टियों की शिकायतों के जवाब में सत्ताधारी दल ने बाकायदा शिकवा-शिकायत सेल खोल रखा है।
इस बार के चुनाव आम विधानसभा के चुनाव नहीं हुए, बल्कि शिकायती उत्सव
जैसे हो गए हैं। आयोग ने चुनाव को पाक-साफ बनाने के जितने जतन किए, शिकायतों की
भीड़ उतनी ही बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग की फुल बैंच जब पिछली बार मध्यप्रदेश आई
थी उस समय भी शिकवा-शिकायतें थीं और अब जब आई है तब भी ये कम नहीं हैं। वोटर लिस्ट
की गड़बड़ी से शुरू हुआ मध्यप्रदेश का चुनावी महाभारत अब एक-दूसरे को फंसाने के
चक्रव्यूह में तब्दील होता जा रहा है। राजनीतिक दल मतदाताओं के बीच जितना चुनाव लड़
रहे हैं उससे कुछ कम लड़ाई आयोग के दरवाजे पर भी नहीं है। चुनाव गरमाने के बाद
कांग्रेस के जे.पी. धनोपिया ही अकेले तीन दर्जन से ज्यादा शिकायतें दे चुके हैं।
भाजपा के लीगल सेल ने भी भोपाल से लेकर सभी जिलों में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आधा दर्जन से अधिक बड़े अफसर केवल शिकायतों के दम पर ही खिसकाए गए हैं।
कोई अफसर किसी दूसरे जिले में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी का रिश्तेदार था तो किसी पर
सत्ताधारी दल का काम करने के आरोप लगे। चुनावी पवित्रता के आयोग के इस यज्ञ में
जनसंपर्क विभाग के अफसर भी अछूते नहीं रहे। चुनाव तक के लिए इस विभाग के भी कुछ
अफसरों का ठौर बदलना पड़ा है। कांग्रेस के निशाने पर अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चौहान के गृह जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक हैं। इनकी भी शिकायत की गई है।
चुनाव आयोग भी हर शिकायत का स्वागत कर रहा है। लोग बिना बाधा अपनी बात
पहुंचा सकें इसलिए नए साधन और तरीके भी मुहैया कराए गए हैं। सूचना-प्रौद्य़ोगिकी के
इस युग में आयोग का सी-विजिल एप है, जिससे कोई भी कभी भी कहीं से भी शिकायत भेज
सकता है। हाल ही में लांच किए गए इस एप पर अब तक 1428 शिकायतें हो चुकी हैं। कॉल
सेंटर और परंपरागत आवेदन के माध्यम से अब तक 8074 शिकायत हुई हैं। आयोग ने भी इनका
जल्दी निराकरण करने के साथ उसकी जानकारी देने के लिए माड्यूल बनाया है।
चुनाव और शिकायत का जो नाता है उसके महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया
जा सकता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने पिछले भोपाल दौरे में
पार्टी नेताओं को इसका गुरुमंत्र दिया था। तत्काल शिकायत करो, शिकायत और निराकरण
की प्रतियां अन्य जिलों के कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी को भेजो और अगली
शिकायत की तैयारी करो। राजनीतिक दल अपनी जगह, आयोग से ब्यूरोक्रेसी के भयाक्रांत
होने की एक वजह मुख्य चुनाव आयुक्त का मध्यप्रदेश कैडर से होना भी है। वे कई
नौकरशाहों को जानते-पहचानते हैं तो यहां के सियासी और प्रशासनिक समीकरणों से भी
बखूबी वाकिफ हैं।

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