अनंत कुमार नहीं रहे। मध्यप्रदेश भाजपा के कई बड़े नेताओं पर यह खबर किसी स्काईलैब केजैसी गिरी। कर्नाटक के अनंत कुमार का मध्यप्रदेश से बड़ा ही गहरा नाता रहा है। कई मिथक तोडऩे वाले भाजपा के लगातार दो विधानसभा चुनाव अभियान के वे अहम किरदार रहे हैं। प्रदेश से जुड़ी कई यादें उनके पास थीं तो 'अनंत-काल ' के कई संस्मरण प्रदेश के नेता और पत्रकारों के पास भी हैं।
एक हंसता, मुस्कुराता और दमकता चेहरा। कन्नड़ शैली की हिंदी में बतियाते अनंत कुमार मुश्किल पलों में भी वैसे ही बिंदास रहते थे, जैसे वे दिखते थे। दो माह पहले ही भोपाल के दीनदयाल परिसर में प्रेस कान्फ्रेंस के बाद वीआईपी कक्ष के दरवाजे पर खड़े होकर वे अनौपचारिक चर्चा कर रहे थे। कुछ कमजोर दिख रहे हैं, सवाल पर हंसते हुए बोलेे- कर्नाटक चुनाव में ज्यादा घूम लिया ना, इसलिए दुबला हो गया हूं। कुछ देर पहले ही प्रेस वार्ता में प्रदेश में किसानों की आत्महत्या को लेकर पूछे गए तीखे सवालों से घायल अनंत का प्रश्न पूछने वाले पत्रकारों से शिकायती अंदाज था- 'इतने सालों बाद भी आपके सवाल नहीं बदले, दोस्त हो हमारे'।
अनंत वो नुस्खा थे, जिसका प्रयोग कर पार्टी ने रतलाम की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भांजे और कद्दावर मंत्री अनूप मिश्रा का इस्तीफा लिया था। मिश्रा के पुत्र पर एक हत्या के मामले में आरोप लगे थे और उनका कोई कसूर न होने के बावजूद एक समाज के वोटबैंक की नाराजगी दूर करने के लिए पार्टी उन्हें मंत्री पद से हटाना चाहती थी। अनंत कुमार की हिंदी ने उन्हें प्रदेश में कई बार मुश्किलों में भी डाला है। एक बैठक में उन्होंने कुछ मंत्रियों के लिए 'अय्याश' शब्द का प्रयोग कर दिया था। बवाल मचा तो अपने हिंदी के कमजोर ज्ञान का हवाला देते हुए उन्होंने सफाई देने से भी संकोच नहीं किया था।
अनंत कुमार का मध्यप्रदेश से नाता शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के साथ जुड़ा था। साल 2008 और 2013 के लगातार दो चुनाव उनके प्रदेश प्रभारी रहते भाजपा ने लड़े और जीते। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और प्रभारी अनंत कुमार की तिकड़ी तब मध्यप्रदेश भाजपा के चुनाव अभियान की धुरी होती थी। अनंत कुमार 2008 के चुनाव में 'मिस्टर बंटाढार' का विलोम शब्द हासिल करने के लिए कई दिन तक खुद शब्दकोश खंगालते रहते थे तो दूसरों से भी पूछते रहते थे। उनकी खोज 'कर्णधार' शब्द पर जाकर रुकी थी और अपने हर भाषण में वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए कर्णधार उपमा का प्रयोग करना पसंद करते थे।
भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि शिवराज और तोमर की जोड़ी को इस बार भी अनंत कुमार का साथ मिलेगा, लेकिन उनका खराब स्वास्थ्य ही संभवत: वो वजह था जिसके कारण भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अनंत को प्रदेश की चुनावी जद्दोजहद से दूर रखा। किसे पता था कि अनंत अपने दोस्तों के प्रदेश में 'चौथी बार- फिर शिवराज' की जंग के परिणाम को देखने के लिए नहीं आ पाएंगे। ठीक उन अनिल माधव दवे की तरह जिनके साथ चुनावी दौर में वे देर रात तक भाजपा कार्यालय के वॉर रूम में डटे रहते थे। आज सुबह से उनका अपनी भाषा का वो आदरसूचक शब्द बार-बार दिमाग पर चढ़ रहा है, जिसका प्रयोग वो मिलने पर हमेशा संबोधन के लिए करते थे.....गारू.... यानी मालिक, स्वामी, बड़ा भाई।
।।अनंत श्रद्धांजलि।।
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