रेडियो के कान उमेठिये या फिर रिमोट पर अंगुली फिराइये...आवाज सुनाई देगी- 'माफ करो महाराज’... 'गुस्सा आता है’। यह गुस्सा इस तरह बीते 5 साल में कभी नहीं आया! पिछले 10 साल में भी नहीं। और तो और 15 साल बाद अब जाकर फूटा है, चुनाव की रणभेरी बजने के बाद। आगामी 28 नवंबर को मतदान होते ही रेडियो, समाचार चैनल्स के साथ ही गली-मोहल्लों में चिल्ल-पौं मचाता यह गुस्सा वैसे ही गायब हो जाएगा, जैसे सभी 'सियासी महाराज’ महलों में समा जाएंगे।
सवाल यह है कि ये गुस्सा चुनाव में ही क्यों आता है?
महाराज
से माफी का तीखा स्वर भी अभी ही क्यों गूंज रहा है? वो भी आगे-पीछे। क्या आज भी मतदाता इतने
अशिक्षित हैं, अनभिज्ञ हैं कि उन्हें बताने पर ही पता चलता है
कि उनके लिए कोई काम हुआ है या नहीं! क्यों विकसित के बाद प्रचार में समृद्ध होते
मध्यप्रदेश के मंदसौर बस अड्डे पर चमचमाती बस के सामने खड़ा आदमी पूछ रहा है कि
उसे वॉशिंगटन से अच्छी सड़क वाले मध्यप्रदेश में जाना है?
क्यों
महाराज कभी एक परिवार की सेवा में व्यस्त थे! चांदी के बर्तन में भोजन कर रहे थे
तब केंद्र सरकार से पैसा लाने शिवराज दिल्ली जा रहे थे?
विज्ञापन
को देख सवाल कौंधता है- इस घटनाक्रम के समय की यूपीए सरकार तो कांग्रेस की ही थी,
फिर
क्यों पैसा दे रही थी शिवराज को? चंद सेकंड के चुनावी जिंगल और विज्ञापन ऐसे
अनगिनत सवाल वैसे ही छोड़ रहे हैं, जैसे कोई ईवीएम
वोटों का हिसाब खोलती है, तब लोग
आश्चर्यमिश्रित गुस्सा करते हैं कि इतने वोट जीतने वाले को कैसे मिल गए! लोग इस
बात पर भी विस्मित नहीं हैं कि ‘विज्ञापन वाली
सरकार’ के खिलाफ उपजा यह गुस्सा विज्ञापन में ही क्यों झलक रहा है।
गुस्सा खराब सड़क पर आया है
तो अभी ही क्यों आया? सड़कें तो कई
साल से खस्ताहाल हैं। राजधानी का बदहाल आदर्श मार्ग जेके रोड हो अथवा नालियों की
तरह सुबह-शाम जाम होतीं कोलार की सड़कें। इनको लेकर नेताओं को इससे पहले गुस्सा
नहीं आया। क्यों किसी खराब सड़क पर नेताओं ने धूनी नहीं रमाई? भोपाल के नाले
में बह कर हर साल जान गंवाते बच्चों और युवाओं को लेकर नाराजगी नहीं भड़की! गुस्सा
बेरोजगारी पर आया है तो रोजगार की गारंटी 15 क्या 25 साल से किसी ने
नहीं दी। छोटी बच्चियों पर पाशविक अत्याचार हो या नारी असुरक्षा,
गुस्सा
फिर भी सही वक्त पर नहीं आया। इसी गुस्से की देन है कांग्रेस की पंच लाइन- 'वक्त है बदलाव
का’। गुस्से को रोकने का जतन है- 'सरकार सरकार में
फर्क होता है’।
कलाकारों की कलाकारी का यह
गुस्सा उस गुस्से जैसा नहीं है, जो प्रचार के
लिए उतरे उम्मीदवारों और उनके साथियों को झेलना पड़ रहा है। तेरह साल के
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी साधना सिंह को उनके ही निर्वाचन
क्षेत्र में महिलाओं के सवालों के जवाब नहीं सूझ रहे हैं। मंत्री दीपक जोशी के पास
भी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। पंद्रह साल की सरकार और कई बार के
विधायकों पर जनता खुद से जुड़े हर उस मुद्दे पर खफा है,
जिसकी
उम्मीद में उसने वोट दिए थे। आम आदमी का यह गुस्सा एकांगी नहीं है। जनप्रतिनिधि
किसी भी दल का हो, उसे गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। लोगों का
गुस्सा उस विज्ञापन जैसा भी नहीं, जिसमें एक खास
पार्टी को वोट देने पर पिता अपने बेटे की पिटाई कर देता है। जनता जानती है कि 'विकास की नई
पारी है अब समृद्धि की बारी है.... 'भविष्य का संदेश
समृद्ध मध्यप्रदेश’... 'विजन 2023’ जैसे जुमले और
टीवी स्क्रीन पर घर बैठी महिला का तमतमाया चेहरा सिर्फ 28 नवंबर तक ही
दिखेगा। इसके बाद लोगों को अपना गुस्सा जज्ब करना ही पड़ेगा। इसकी उन्हें आदत भी
है। उसे तो इंतजार है वक्त बदलने का और उसके जीवन को एक्सप्रेसवे की तरह बाधामुक्त
एवं आसान बनाने वाली सरकार का।
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