Monday, November 30, 2015

यूंही दिग्विजयी नहीं हुए शिवराज...

‘पांव में चक्कर...मुंह में शक्कर...माथे पर बर्फ...और सीने में आग’। ये शिवराज सिंह चौहान के पसंदीदा डायलॉग में से एक है। पार्टी का कोई कार्यक्रम हो या फिर जनता के बीच भाषण शिवराज लोगों को ये नसीहत देना नहीं भूलते। शायद उनकी सफलता का राज भी यही है। इसी ‘पांव में चक्कर...मुंह में शक्कर’ ने उन्हें 60 साल पूरे कर रहे मध्यप्रदेश का पहला ऐसा मुख्यमंत्री बना दिया है, जो दस साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान है।

शिवराज ने वो इतिहास रच दिया। जिसकी चाह हर मुख्यमंत्री को होती है, लेकिन अवसर किसी बिरले को ही मिलता है। शिवराज मध्यप्रदेश के 17 वें मुख्यमंत्री हैं...कार्यकाल के लिहाज से गिनें तो 30 वें। दस साल तक मुख्यमंत्री निवास में रहने वाले के तौर पर देखें तो दूसरे और दस साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद भी मुख्यमंत्री होने के नाते पहले और अब तक के एकमात्र। उनसे पहले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने लगातार दो कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहते हुए दस साल पूरे किए थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी के चुनाव हारने के कारण दिग्विजय सिंह केवल दस साल वाले मुख्यमंत्री बन कर रह गए और 29 नवंबर 2005 को शपथ लेने वाले शिवराज ने मुख्यमंत्री के तौर पर दिग्विजयी पताका फहरा दी। ये तो रही तथ्य और आंकड़ों की जुबान। सवाल ये है कि शिवराज में ऐसा क्या है? जो उनसे पहले के मुख्यमंत्रियों में नहीं था! क्या समीकरण और कारण हैं जिन्होंने शिवराज को प्रदेश के मुख्यमंत्रियों में सिकंदर बना दिया।
मुकद्दर के सिकंदर तो शिवराज शुरूआत से ही हैं। सरस्वती की कृपा की बात वे करते हैं। उन पर सरस्वती ने इतनी कृपा की है कि शुरूआती अभावों के बावजूद उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री ली, वह भी गोल्ड मेडल के साथ। जिव्हा में सरस्वती का ऐसा वास है कि दस साल से शिवराज का भाषण सुनने के बाद भी प्रदेश की जनता में ऊब नहीं हुई। आरएसएस, जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी की रीढ़ रहे नेताओं के सानिध्य में राजनीति का ककहरा सीखते-सीखते शिवराज ने कब राजनीति का गोल्ड मेडल भी अपने नाम कर लिया उनके संगी-साथियों को भी इसका भान नहीं हुआ। बुधनी से पहली बार चुनाव लड़ने के चंद महीनों बाद विदिशा में अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा खाली की गई लोकसभा सीट के उपचुनाव से संसद तक का उनके सफर को गंभीरता से नहीं लेने वाले नेताओं ने शिवराज के मुख्यमंत्री बनने के बाद जरूर इस 'बायचांस' हुए बदलाव को गंभीरता से लिया होगा। शिवराज की मुख्यमंत्री के तौर पर ताजपोशी से ठीक एक दिन पहले प्रदेश भाजपा कार्यालय दीनदयाल परिसर में विधायक दल नेता के चुनाव के मौके पर अनुशासित बीजेपी के कार्यकर्ताओं के विरोध और शक्ति प्रदर्शन ने साबित कर दिया था कि शिवराज कोई पैराशूट सीएम नहीं हैं। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उनके पहले विदिशा प्रवास में उमड़े जनसैलाब और उसके बाद जनता के बीच जाने के उनके सतत कार्यक्रम ने शिवराज को वो नेता बना दिया कि भोपाल के अन्नानगर झुग्गी बस्ती की आंगनवाड़ी की अबोध बिटिया से लेकर दूरदराज के मंडला, अलीराजपुर या फिर बुंदेलखंड के किसी गांव के बच्चों तक शिवराज की पैठ हो गई। मुख्यमंत्री बनने के पहले तक पांव-पांव वाले भैया के नाम से विदिशा और सीहोर में मशहूर रहे शिवराज की अब पहचान बदल गई है। वे महिलाओं के भाई हैं तो प्रदेश भर के बच्चों के मामा। इन दस सालों में रिश्तों की ऐसी जबरदस्त कशीदाकारी शिवराज ने की है कि उनकी पैठ अनपढ़ किसानों से लेकर गांव के चूल्हे-चौके तक हो गई है। सोशल इंजीनियरिंग के इस नायाब खेल में शिवराज ने सरकार की प्राथमिकताएं ही बदल डालीं। उनसे पहले सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा के विकास को आम आदमी की सेवा माना जाता था। प्रदेशवासियों की भलाई की इस स्कीम में शिवराज ने लोगों को सीधे और नकद लाभ पहुंचाने की चाशनी डाली और विकास की वो मिठाई तैयार की है, जिसकी काट फिलवक्त तक किसी के पास नहीं दिखती।
अपने इस हुनर के दम पर ही शिवराज उस भारतीय जनता पार्टी के लिए अपरिहार्य बन गए हैं, जिसने 2003 में सरकार बनने के दो साल के भीतर तीन मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश को दिए। प्रदेश में भाजपा और उसकी पूर्वज सरकारों का इतिहास भी यही रहा है। इमरजेंसी के बाद जब सरकार बनी तो तीन साल में तीन मुख्यमंत्री बनाने पड़े थे। 1990 में बनी सुंदरलाल पटवा सरकार भी ढाई साल में चलती बनी थी। पटवा शिवराज के सियासी गुरू हैं और गुरू की गलतियों से सबक लेकर शिवराज ने अपनी अलग सोशल इंजीनियरिंग चलाई। वे कन्यादान योजना लाए। लाडली लक्ष्मी योजना लाए। विभिन्न वर्ग की पंचायतों के जरिए सीएम हाउस के दरवाजे आम लोगों के लिए खोले गए। इन सबसे ऊपर उन्होंने‘पांव में चक्कर’ रखा गांव-खेड़े के गरीब-गुरबों के बीच पहुंचे और ‘मुंह में शक्कर’ घोली। पार्टी के बड़े नेता हों या हमउम्र सबके साथ भी शिवराज ठीक वैसे ही पेश आते रहे जैसा व्यवहार रखने की वे कार्यकर्ताओं को सीख देते हैं। नतीजा..! मध्यप्रदेश भाजपा में आज शिवराज की कोई काट नहीं है। उनका कोई विरोधी नहीं। कम से कम खुलेआम विरोध करने वाला तो कोई भी नहीं है। सबको सम्मान देने और खुश करने के अपने हुनर से उन्होंने उन नेताओं को भी जीत लिया जो कभी शिवराज को नापसंद करते रहे थे। 'मुंह में शक्कर' और 'माथे पर बर्फ' के कारण आज पार्टी के भीतर या बाहर उनकी कद काठी का कोई नेता नहीं है, जो उन्हें टक्कर दे सके।  
शिवराज सिंह चौहान को यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं होता कि जब वे मुख्यमंत्री बने थे तब उनका प्रशासनिक अनुभव शून्य था। उन्होंने लगातार मंत्रालय में बैठ कर प्रशासनिक बारीकियां सीखने के बजाए खुद को जननेता बनाना बेहतर समझा। प्रशासनिक कामकाज उन्हें अभी भी रास आता नहीं दिखता। वे जब मीटिंग लेते हैं तो चुनाव प्रचार की तर्ज पर धुआंधार बैठकों की झड़ी लगा देते हैं। नहीं तो मेल मुलाकात फाइलों पर भारी पड़ जाती है। शायद सीएम सचिवालय में आला अफसरों की फौज की मुख्य वजह भी यही है। दस साल पुराने मुख्यमंत्री शिवराज का मिजाज अफसरों पर रूआब गांठने वाला कभी नहीं रहा और न ही यह कला वो सीख पाए। आज भी शिवराज जब अफसरों को हड़काते दिखते हैं तो असामान्य लगते हैं। लेकिन, वही शिवराज किसान, महिलाओं या फिर आम लोगों के बीच होते हैं तो उनके सच्चे हितचिंतक दिखते हैं। उनके बीच के ही नजर आते हैं। कोई बनावट और बुनावट नहीं दिखती। शिवराज की यूएसपी भी यही है।
चुनाव लड़ते शिवराज को देखने का भी अपना अलग अनुभव है। 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जब वो उसी बुधनी से उपचुनाव लड़ रहे थे, जो उनका घर है और जहां से 1990 में वे पहली बार विधायक चुने गए थे, तब उनकी घबराहट देखने लायक थी। मुख्यमंत्री का गांव-गांव जाकर वोट मांगना....लोगों से ध्यान रखने की बात कहना...दिन-रात मेहनत करना...अजीब लगता था। वोट मांगने का ये क्रम इन दस सालों में चलता ही रहा है। 2008 की जनआशीर्वाद यात्रा और 2013 के चुनावी रथ में शिवराज की रिपोर्टिंग करने के दौरान तक शिवराज का जननायक विशाल हो चुका था। रथ में सवार शिवराज बाहर से मामा की आवाज आने पर गाड़ी रूकवा कर बातें करने से खुद को रोक नहीं पाते थे। रथ की खिड़की से हाथ निकाल कर लोगों के हाथ मिलाने का कष्ट झेलना भी केवल उनके बस की बात है। गांव वालों के रूखे नाखूनों से पड़ती खरोंच और उनसे छलक आई खून की बूंदों के बावजूद शिवराज का हाथ रूका नहीं....हर उस शख्स तक पहुंचा जो उनसे हाथ मिलाना चाहता था या फिर छूकर देखना चाहता था। शुजालपुर के बाजार में अल्पसंख्यकों की पुष्पवर्षा देख कर शिवराज ने सवाल किया था -'अब बताओ कौन रोक पाएगा इस रथ को?' उनका यह आत्मविश्वास सच साबित हुआ और तीसरी बार शिवराज मुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के पर्याय भी वही हो गए। अब तो पंचायत के चुनाव तक में शिवराज की डिमांड होती है। रतलाम-झाबुआ के उपचुनाव में भी शिवराज के इसी जादू के दम पर भाजपा ने किला लड़ाया था, लेकिन देवास विधानसभा के उपचुनाव को जीतने वाली भाजपा रतलाम हार गई तो क्या शिवराज के चुनावी मायाजाल की मियाद पूरी हो गई है! क्या 'माथे पर बर्फ' और 'सीने में आग' वाले शिवराज के पांव का चक्कर थम गया? जवाब किसी के पास नहीं है। होगा भी कैसे, शिवराज का जादू...शिवराज के तिलिस्म का तोड़ हर किसी के बस की बात भी नहीं है।
मसला शिवराज के दस साल का है। मील का यह पत्थर गाड़ने के लिए उन्होंने खासी मेहनत की है। यह शिवराज की खूबी है कि वो विपरीत परिस्थितियों को भी अपने पक्ष में करने की काबिलियत रखते हैं। डंपर कांड हो या व्यापमं घोटाला। ऐसे मामले किसी भी नेता के राजनीतिक कैरियर पर विराम लगाने के लिए पर्याप्त होते। लेकिन ये शिवराज की खासियत है कि डंपर संबंधी आरोपों के दाग को जनता के बीच जाकर धोने में कामयाब रहे और 2008 में भाजपा की सरकार बनवा ली। ये और बात है कि अदालत ने भी उनके पक्ष को सही माना। 2013 के चुनाव से पहले व्यापमं का जिन्न सामने आया और शिवराज ने फिर इस मामले को भी अपने पक्ष में कर डाला। तमाम विरोधी, तमाम दावेदार और तमाम राजनीतिक पंडितों की तमाम कयासबाजी और अभिलाषाएं धरी की धरी रह गयीं। सूखे से पीड़ित किसान हों अथवा खड़ी फसल पर ओलों की मार। कहीं कोई सड़क हादसा हो या कोई और आफत आए। शिवराज के खजाने के हाथ जनता के लिए खुले ही रहते हैं। सदाव्रत बांटने की यह अदा और सभी के सुख-दु:ख में सहभागी बनने की शिवराज की खासियत ही वो नुस्खा है, जिसने उन्हें ऐसा 'दिग्विजयी' बनाया है कि दिग्विजय सिंह का रिकार्ड भी टूट गया। प्रदेश में सिंहस्थ का मिथक तो भाजपा सरकार पहले ही तोड़ चुकी है...देखना है सिंहस्थ कराने वाले मुख्यमंत्री से जुड़ा मिथक शिवराज तोड़ते हैं या नहीं।

Wednesday, November 4, 2015

शेरखान पर धारा- 144

 तो साहब, भारत के केंद्र में बसे भोपाल शहर में इन दिनों दहशत और कौतूहल का माहौल है...कोई आतंकवादी नहीं घुसा है मध्यप्रदेश की राजधानी में ! लेकिन आतंक उससे भी कहीं ज्यादा है। खतरा एक नहीं है, एक जैसे अनेक हैं। चिंता में हैं लोग तो सरकार भी चिंतित है। सभी की चिंता का विषय वो बाघ...वो शेरखान है, जो पता नहीं किस सहज वृत्ति से यहां आ टिका है। कभी लोग उसे देखने सड़क की खाक छानते हैं तो कभी वह भी लोगों को देखने सड़क तक चला आता है कि भीड़ छंटे तो वह अपनी प्यास बुझा सके। लेकिन वाह रे हम दो पैर वाले जानवर! हमें अपने भूख-प्यास की तो चिंता है....उस निरीह प्राणी की नहीं, जिसे जंगल का राजा कहा जाता है।
भोपाल और बाघ आजकल एकदूसरे के पर्यायवाची से लगने लगे हैं। अखबारों में नियमित कॉलम फिक्स हो गया है। न्यूज चैनलों के बुलेटिन में बाघ की खबर फर्स्ट सेगमेंट में जरूरी हो गई है। वैसे भी भोपाल के बाशिंदे बाघ से अपरिचित नहीं है। इसी शहर में वन विहार नामक चिड़ियाघरनुमा नेशनल पार्क है, जहां बाड़े में कैद बाघ लोग सालों से देखते आ रहे हैं। लेकिन, ये बाघ महाशय तो पता नहीं क्या खाकर आए हैं चले आए सीधे आबादी के समीप। बिना ये जाने कि जिनके बीच आ धमके हैं वे लोग उनसे भी खतरनाक हैं। दो पैर पर चलने वालों की सुरक्षा के लिए आग उगलने वाली बंदूकों का जखीरा इनके पास है और खाकी वर्दी वालों को किसी को भी मारने का लायसेंस भी। गनीमत है शहरी आबादी के बीच आने के बावजूद बाघ के जंगल के संस्कार अभी तक बचे रह गए हैं। उसने इंसानों से उनकी आदतें नहीं सीखीं। शायद इसीलिए किसी पर अब तक हमलावर नहीं हुआ। लोगों को देख कर खुद छिप जाता है। उनकी नजरों से ओझल रहने की पूरी कोशिश करता है। बावजूद इसके नजर में आ ही जाता है। नजर में आया सो संकट में भी फंसा। अब उसे खदेड़ने के लिए हाथी बुलाए गए हैं। प्रशिक्षित हाथी।

मां-बाप भी शेरखान की तरह किताबी ज्ञान से अनजान थे इसलिए बचपन में उसका नामकरण संस्कार नही हो पाया था। इंसानों के बीच आया तो उसे नाम भी मिल गया टी-1 भले ही वो खुद अपने नाम से अनजान हो, लेकिन उसे इतना तो मालूम होना ही चाहिए कि उसके एक जोड़ीदार को शहर के दूसरे इलाके के एक सुरम्य स्थान में बलात प्रवेश करने की सजा मिल चुकी है। पीटी-1 पुकारे गए इस युवा बाघ को नौ घंटे की मशक्कत के बाद सुरक्षित जिंदा पकड़ लिया गया था। साहब खुशकिस्मत थे जो उन्हें कुछ दिनों की कैद के बाद 400 किमी दूर पन्ना नेशनल पार्क में स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ दिया गया। मेहरबानी देखिए इंसानों की। किसी ने यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि बाघ जंगल छोड़ कर शहर का रूख क्यों कर रहे हैं। आदमखोर हुए होते तो किसी इंसान को मारते, लेकिन किसी को टच तक नहीं किया उन्होंने। उनकी जरूरत बेशक दूसरी है। वो है पानी। सूखे की मार अकेले खेतों पर ही नहीं पड़ी जंगल पर भी पड़ी है, लेकिन खेतों की बदहाली देखने गए जंगलात महकमे के आला अफसरों को अपने मातहत आने वाले जंगलों का सूखा नहीं दिख रहा। सूख चुके तालाब और जलकुण्ड नहीं दिख रहे। ऐसे में पानी की तलाश में अकेले बाघ ही बाहर नहीं निकले होंगे। और भी चौपाये आते होंगे शहरों और बस्तियों की तरफ। लेकिन वो बाघ जितने खुशकिस्मत नहीं। पलायन करने वाली दूसरी नस्लें इतनी भाग्यशाली नहीं....पता नहीं हिरण कहां शिकार हो जाते हों, या खदेड़ दिए जाते हों। चतुर सुजान और सतर्क होने के साथ बलशाली होना बाघ के लिए फायदेमंद साबित हुआ। एक तो वो खुद बच-बच के संभल के चलता है, दूसरे उसका डर। लेकिन बाघ भी कहां सुरक्षित है! इसी भोपाल के पास पहले भी एक शेरखान अपनी सल्तनत जमाने आया था। नाखून और खाल के लालच में इंसानों के फरेब का शिकार हुआ। मारा भी ऐसा गया कि दो टुकड़ों में मिला था। सो भयभीत होने और घबराने की जरूरत बाघ को है न कि इंसानों को। 
बाघ से जुड़ी नकारात्मक खबरों के बीच एक खबर यह भी आई है कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण की भोपाल बेंच को उसके दिन भर प्यासे भटकने की खबरों से रहम आया है। कलेक्टर को तलब कर बाघ के इलाके में इंसानी दखल कम करने के लिए प्रतिबंधात्मक धारा-144 के तहत उपाय करने का फरमान सुनाया गया है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित माना जा सकता है कि कलियासोत का बाघ अब बस कुछ दिन का ही मेहमान है। बालीवुड के सुपर स्टार की तरह फेमस होने के बाद अब वह शिकारियों के हाथों में आने से तो रहा....लेकिन भोपाल की सीमा में भी नहीं रह पाएगा। उसे उसके पुरखों की जमीन से बेदखल होना ही होगा। बाहर से बुलाए गए हाथियों के यहां डेरा डालने का यह साफ संदेशा है। पर मुसीबत....बाघ तक यह खबर पहुंचाए तो कौन पहुंचाए? उसे समझाए तो कौन समझाए कि भैया निकल लो। होगे तुम जंगल के राजा। यहां के राजा तो इंसान ही हैं। जिन्होंने जंगल के बीच घर बना कर तुम्हारी टेरेटरी छीन ली है। इसलिए धारा-144 इंसानों के लिए अभी भले लग जाए, लेकिन असलियत में वह लग रही है बाघ के लिए।

Monday, September 28, 2015

डर की सियासत और मानवता


ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में होता है...कि शादी के मंडप में पुलिस आ धमके। रील लाइफ की कहानी रियल लाइफ में उतरे तो बवाल तो मचना ही था। सो मच गया। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के घर सीबाआई की छापेमारी का यह एंगल घर-घर की कहानी और सास-बहू छाप सीरियल देखने की आदी भारतीय महिलाओं और कई पुरूषों को हजम नहीं होगा। सोचिए, किसी बाप ने कितने अरमानों से बेटी के विवाह की तैयारियां की होंगी। इस मौके को यादगार बनाने के हर संभव इंतजाम किए जाते हैं। फिर यह तो एक मुख्यमंत्री और बड़े नेता की लाड़ली की शादी थी...अविस्मरणीय बनाने के सारे जतन किए ही होंगे, लेकिन ये न सोचा होगा कि ऐन फेरे के वक्त उनके घर पर सीबीआई जैसी 'प्रतिष्ठित' जांच एजेंसी धावा बोलेगी।
घटना ड्रामेटिक है...नाराज करने वाली है और विस्मित करने वाली भी... कुछ दिन बाद लोग सीरियल की कहानी की तरह इसे भी भूल जाएंगे। पर क्या वीरभद्र और उनका परिवार इसे कभी भुला पाएगा। अरे भाई छापा मारने...कार्रवाई करने के लिए केवल एक यही दिन बचा था क्या? वीरभद्र सिंह कहीं भागे जा रहे थे या फिर सीबीआई को उम्मीद थी शादी के मौके पर उनकी वो धन संपदा बेपर्दा मिलेगी, जिसकी शिकायत पर जांच चल रही है। ये कोई सतयुग तो है नहीं। साहब को क्या अंदेशा नहीं रहा होगा खुद पर होने वाली छापेमारी का! सादगी से मंदिर में सप्तपदी करा रहे थे बिटिया की। इस समारोह के लिए वो परिवार समेत घर से निकलते इससे पहले छापा डल गया। रंग में भंग पड़ गया। वीरभद्र तो वीरभद्र हैं। छठवीं बार मुख्यमंत्री बने हैं। राजनीतिक डगर पर संभलने और फिसलने के अनुभवी हैं। इसलिए छापे से डरे नहीं, डिगे नहीं। बेटी को विदा करने के बाद सीबीआई वालों से मिले। पूरे विषाद और क्षोभ के साथ। खुशी के मौके पर अपमान के बाद यही चीजें तो बची हैं उनके पास। यह पहला मौका नहीं है जब किसी बड़े नेता को सीबीआई ने लपेटा है। पर इस तरह से किसी को नहीं लपेटा जैसा वीरभद्र के साथ हुआ।
 बात यहीं नहीं थमती। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी वाला मामला है यह। आज जो लोग इस घटना पर खुश हैं कल दुखी हो सकते हैं। आखिर मामला 'तोते' के कटखना होने का जो है। तोता यानी सीबीआई। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पिंजरे का तोता कह कर नया मुहावरा गढ़ा था। उसी सीबीआई ने 'मानवता' को ताक पर रख कर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के एक दर्जन ठिकानों पर छापा मार दिया। वो भी उस दिन जब उनकी बेटी की शादी थी। अब इस घटना पर कहने वाले कह रहे कि ऐसा तो कोई दुश्मन के साथ भी नहीं करता... दुश्मन भी बेटी की शादी में सहयोग करता है...आदि, इत्यादि। आरोप लग रहे हैं कि सीबीआई में जरा सी भी मानवता नहीं है। पुलिस और पुलिस वालों से बनी इस जांच एजेंसी से मानवता की अपेक्षा भी क्यों? ये कोई आईपीएल मार्का भगोड़े ललित मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बीच वाला 'मानवता' का मामला थोड़े ही है। स्वराज ने मानवीयता के नाते एक बीमार महिला की मदद की तो विपक्ष ने संसद सिर पर उठा ली थी। अरे भाई, माना ललित मोदी की पत्नी है वह महिला पर इसमें मानवीयता भी तो थी। यही तर्क दिया था न लोकसभा में वक्तृत्व कला की माहिर सुषमा स्वराज ने। उनकी पार्टी, जिसकी सरकार है, उसने भी इसी तर्क के सहारे उनका हौसला बढ़ाया था कांग्रेस के आरोपों का मुकाबला करने में। उसी मानवता और मानवीयता की उम्मीद कांग्रेस वीरभद्र के मामले में कर रही थी और सीबीआई में इसका नितांत अभाव निकला।
 भ्रष्टाचार के मामले में पड़े इस छापे पर कोई गुरेज नहीं...ऐतराज है तो उसकी टाइमिंग पर। शादी के मौके पर किसी के घर भी कोई ऐसे धमकता है क्या? सवाल इसी बात को लेकर है। यदि टाइमिंग सही होती तब भी छापे के खिलाफ आवाज उठती, लेकिन उसमें पब्लिक अपील नहीं होती। आखिर हम उस समाज में रहते हैं, जहां किसी बड़े अपराध का आरोपी भी चुनाव जीत जाए तो वह सीना फुला कर दावा करता है कि जनता की अदालत ने उसे बरी कर दिया है। अदालत में चल रहा मामला तो विपक्षी पार्टी का षड़यंत्र है। वीरभद्र के मामले में भी यही दावे हो रहे हैं। होते भी रहेंगे। आखिर जिस मामले में सीबीआई ने उनके खिलाफ प्रकरण दर्ज किया है वह पुराना है, साल 2009 से 2011का। जब वो केंद्र सरकार में मंत्री थे। इन आरोपों का सामना करते हुए उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने 2012 में हिमाचल का चुनाव लड़ा और जीत कर सरकार बनाई। उस चुनाव में भ्रष्टाचार ही मुख्य मुद्दा था। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे। फैसला वीरभद्र के पक्ष में सुनाया था जनता ने। ऐसे ही जनता से अपने हक में फैसले की दुहाई के उदाहरण भरे पड़े हैं भारतीय सियासत में। अब वीरभद्र के खिलाफ सीबीआई की कार्यवाही से उनकी पार्टी की भवें तनना स्वाभाविक है। उस सीबीआई ने यह कार्यवाही की है, जिसे पिजरे का तोता बताया जाता है। यानी केद्र में जिस पार्टी की सरकार होगी सीबीआई उसके इशारे पर काम करेगी। यह जांच एजेंसी इस आरोप को पुष्ट करने के सिवा और कर भी क्या सकती, उस पर बंधन ही इतने ज्यादा हैं। वाकई पिंजरे में कैद।
सीबीआई की वीरभद्र सिंह पर की गई कार्यवाही से भारतीय राजनीति में वह रास्ता और मजबूत हो रहा है, जिस पर वर्तमान में बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें चल रही हैं। विरोधी दल के नेताओं पर शिकंजा कसना। मध्यप्रदेश में 12 साल से भी ज्यादा पुराने भर्ती मामले में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से लेकर तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी तक आरोपी हैं। ऐसे में एक वर्तमान मुख्यमंत्री पर सीबीआई का फंदा पड़ना आगे की राह दिखाता है। कांग्रेस नेता 'आरोप राग' आलाप रहे हैं कि सीबीआई की रेड बीजेपी के मुख्यमंत्रियों के घर क्यों नहीं पड़ रही। उन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। आज स्थितियां भले ही अलग हों, लेकिन एक बात तो तय है कि एक मुख्यमंत्री पर छापेमारी से रिवेंज पॉलिटिक्स का एक नया अध्याय भारतीय राजनीति में खुल गया है। सरकार बदलते ही गड़े मुर्दे उखाड़ कर सीबीआई के तोते से फिर किसी को नहीं कटवाया जाएगा, इसकी गारंटी है क्या? होगी भी कैसे? डर की सियासत में मानवता की गुंजाइश हो भी तो कैसे? राजनीति में बदलापुर संस्कृति जो घर कर गयी है। चलो इसी बहाने राजनीति और सिस्टम की गंदगी छंटती है तो यही सही। कुछ तो सुधार होगा....कोई तो डरेगा...या शर्म खाएगा....

Tuesday, September 22, 2015

बकरा किश्तों पर....

ये पाकिस्तानी हास्य कलाकार उमर शरीफ के मशहूर स्टेज शो का टाइटिल जरूर है....लेकिन मामला कहीं से भी पाकिस्तानी नहीं है। पूर्ण स्वदेशी है। गांधी के स्वराज की तरह स्वदेशी। भारत के संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार जैसा...बकरा किश्तों पर।

तो साहब, हनुमानजी के दिन यानी मंगलवार को भारत भूमि के एक बकरे को जीवनदान मिलने का फरमान मिल गया। पता नहीं वो बकरा इसे सुन कर कितना खुश हुआ होगा। उसके लिए तो कोई विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मिलने वाली खुशी जैसी होगी ये खुशी। राजनीतिक दल में कोई उच्च प्रभावशाली पद हासिल होने पर मिलने वाली प्रसन्नता जैसी अनुभूति हो रही होगी उसे। आखिर वो बकरा किसी गांव खेड़े या गली मोहल्ले का तो है नहीं। उसका नाता तो देश के ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश के ह्दय क्षेत्र में स्थित एक गौरवशाली राजनीतिक दल से जुड़ गया है। उसे बकरीद के दिन राष्ट्रीय दल के इसी प्रादेशिक कार्यालय के सामने कुर्बान करने का जो तय हुआ था। पता नहीं क्यों और कैसे...उसकी इस स्थल पर कुर्बानी देने की ठानने वालों का मन पलट गया। और...वह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने से चूक गया। अब बकरे को जान बचने की खुशी है तो इतिहास के पन्नों तक नहीं पहुंच पाने का गम भी। बेचारा करे तो क्या करे ! उसके बस में होता तो लिंक रोड पर किसी बस के नीचे आकर जान दे देता...लेकिन उससे वह दुर्घटना में हलाक तो साबित हो सकता था...कुर्बान नहीं।
 खैर बकरे की बकरा जाने...हम तो उमर शरीफ के बकरा किश्तों वाले चुटीले हास्य को याद करते हैं...जिसमें एक प्रसंग में आग के चक्कर लगाते...लगाते अचानक नाटक का हीरो रूक जाता है...क्योंकि फेरे डालने से उसके हिंदू हो जाने का खतरा जो उसे दिखता है। बस सियासी बकरे की जान की शामत आने की वजह भी ऐसी ही है। लगातार तीन विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से शिकस्त झेलने के बाद जब मध्यप्रदेश कांग्रेस के कर्णधारों ने बीजेपी के चाल, चरित्र और चेहरे के परे झांक कर देखा तो उन्हें वहां तंत्र, मंत्र और यंत्र के साथ आस्था नजर आई। बस अपने ग्रह नक्षत्र सुधारने के लिए प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में भी बीजेपी टाइप टोटके किए गए। फायदा न हुआ तो दो साल से बीजेपी की तर्ज पर गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। कांग्रेस तो 100 टका वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टी है। गणेशजी बैठेंगे तो ईद भी मनेगी और क्रिसमस भी। सो भाई लोगों ने गणेश का जवाब बकरीद से देने का तय कर लिया।

ये त्योहार भी उस मौके पर आए, जब प्रदेश कांग्रेस में पदों की रेवड़ी बंटने के बाद कलह के कैक्टस उगे हुए हैं। जिन्हें पद नहीं मिला भोपाल और दिल्ली के बीच चलने वाली शान-ए-भोपाल एक्सप्रेस को ही घरौंदा बनाए हुए हैं। एक टांग यहां दूसरी दिल्ली में। इन्हीं में से कुछ पक्के कांग्रेसियों ने विरोध का तरीका ढूंढा। गणेश स्थापना के जवाब में पार्टी कार्यालय के सामने बकरीद मनाने का ! सच है। कोई वहां शंख झालर बजा कर सुबह शाम गणेश भगवान की आराधना कर सकता है तो दूसरे को अपनी आस्था के प्रदर्शन से कैसे रोका जा सकता है। बकरीद पर बकरे की कुर्बानी के जज्बे ने इस पार्टी की साख बढ़ा ही दी होगी ! इसे लेकर नाटक नौटंकी जितनी हो सकती थी, सब हुई। किसी से बकरे की जान को खतरे की चिंता जताई गई तो किसी पर शक जताया गया। कुल जमा उमर शरीफ को शर्मिंदा करने लायक सारे आइटम थे। खैर कोई आकाशवाणी हुई...कोई संदेश आया। या फिर सद्बुद्धि। अचानक कार्यालय में बकरे की कुर्बानी का आइडिया ड्राप कर दिया गया। बाकायदा प्रेस नोट जारी कर 'शाकाहारी ईद मिलन' की घोषणा हो गई। साल भर पहले भी ऐसा ही एपिसोड हुआ था। तब बकरा तो नहीं आया था, पर उसके गोस्त से बने कबाब के चर्चे जरूर थे। धन्य हैं सोशल मीडिया पर छाए एक महानगर के वो बाशिंदे जिन्होंने नमाज अता करते वक्त आधी सड़क गणेश जी के लिए छोड़ दी थी। धन्य वो गणेश भक्त भी, जिन्होंने नमाज का सम्मान करते हुए शांति से जुलुस निकाला। उन्होंने भी तो बकरा किश्तों पर... देखा होगा। हमने भी देखा, पर शायद हमारे चश्मे का नंबर अलग था। 
( संदर्भ- मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में गणेश स्थापना और बकरीद मनाने को लेकर कांग्रेस नेताओं के बीच मचा घमासान और उसका उतना ही रोचक पटाक्षेप।)

Monday, September 21, 2015

रसगुल्ला किसका? हमारा और किसका!


माना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात की सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी मध्यप्रदेश को एशियाटिक लॉयन यानी गिर के बब्बर शेर सिर्फ इसलिए नहीं दे रही, क्योंकि बड़ी बिल्लियों की यह प्रजाति गुजरात की अस्मिता से जुड़ गई है। गिर के जंगल में इन शेरों के कुनबों को स्वच्छंद विचरण करते देखने देश-विदेश से सैलानी आते हैं। इनसे गुजरात के पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। शेर मध्यप्रदेश के बाशिंदे हो गए तो गुजरात का 'गौरव' ही नहीं पर्यटन से होने वाली कमाई भी बंट जाएगी। पर...रसगुल्ला तो शेर नहीं है। इसे तो कहीं भी बनाया और हजम किया जा सकता है। फिर क्यों ओडिसा और पश्चिम बंगाल की सरकारें आमने-सामने हैं...?
यदि रसगुल्ले को 'गुजराती गौरव' चश्मे से देखें तो...आने वाले समय में एक खास प्रदेश से बाहर के बाशिंदे इसका रसास्वादन नहीं कर पाएंगे ! यदि रसगुल्ला उड़िया निकला तो सिर्फ कलिंग प्रदेश के रहवासियों का राजकीय मिष्ठान बन कर रह जाएगा। और यदि पश्चिम बंगाल मूल का हुआ तो केवल बंगालियों को ही नसीब होगा। दीगर राज्य के निवासी यदि रसगुल्ला बनाते या खाते हैं तो उन्हें एक नए किस्म का टैक्स...रायल्टी चुकानी पड़ेगी।
रसगुल्ला महिमा गान ! ये शक-शुभहा ! इसलिए क्योंकि 21 वीं सदी में विकास की होड़ में लगे दो राज्य रसगुल्ले को लेकर तलवारें खींचे हुए हैं। जर,जाेरू और जमीन के लिए झगड़ों की बात पुरानी हो गई। ऩए दौर में इंटलेक्चुअल प्रापर्टी राइट, पेटेंट और जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई ) टैग को लेकर झगड़े हो रहे हैं.....ये संघर्ष का नया दौर है।कुछ समय पहले भारत ने अमेरिका से खुशबूदार बासमती चावल के पेटेंट की जंग जीती तो मध्यप्रदेश राज्य ने अपने बासमती के लिए जीआई टैग हासिल कर पाकिस्तान को नाराज कर दिया। अब इसे लेकर विश्व बिरादरी में एक नई जंग छिड़ गई है कि बासमती किसका असली है....मध्यप्रदेश का या पाकिस्तान का ?  बस ऐसा ही एक संघर्ष हम सब का पसंदीदा रसगुल्ला भी झेल रहा है। ओडिसा सरकार ने इस सफेद, गोल मटोल, रसभरे और मीठे  मिष्ठान पर अपना दावा जताया है। ओडिसा  ने इसके लिए जीआई टैग क्या मांगा हंगामा मच गया। ग्रामीण उत्सवों में बंगाली मिठाई का पर्याय रसगुल्ला...विवाद का गोला बन गया। इसकी मिठास में  कसैलापन आ गया...नर्म मुलायम रसगुल्ला अचानक रूखा और बेस्वाद लगने लगा ! न जाने कब इसे गप करना बौद्धिक संपदा अधिकार कानून का उल्लंघन हो जाए। किसी मेहमान को रसगुल्ला परोस कर पता नहीं कौन सा अपराध हो जाए? डर हो भी क्यों ना! ओडिसा सरकार ने रसगुल्ले के जन्मस्थान की तलाश और उस पर अधिकार जताने के लिए जांच कमेटी गठित कर दी हैं। एक नहीं, दो नहीं। तीन-तीन समितियां रसगुल्ला मामले की जांच करेंगी। हर पहलू की जांच होगी। सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि समितियों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग विभाग के साथ संस्कृति विभाग के अफसर होंगे। पहली समिति ओडिसा में रसगुल्ला के उद्भव से जुड़े तथ्यों और सबूतों को देखेगी। दूसरी समिति रसगुल्ले पर पश्चिम बंगाल के दावे की पड़ताल करेगी। तीसरी समिति ओडिसा के दावे को स्थापित करने के लिए जरुरी दस्तावेज जुटाएगी। मतलब रसगुल्ला अब सिर्फ मिठाई की दुकान पर मिलने वाला मीठा गोला नहीं रहा। उसके व्यवसायिक पहलू को देखा जा रहा है। जीआई टैग क्या ऐसे वैसे ही मांगा जा रहा है?
 ये लालू यादव या किसी और राजनेता की जन्मतिथि का विवाद होता तो समझ आता कि राजनीति है, ये तो रसगुल्ले का मामला है। जलेबी से भी ज्यादा उलझना ही था। इमरती का सिरा पकड़ने से भी ज्यादा कठिन होना ही था। सो हो गया। गुजराती पाककला विशेषज्ञ तरला दलाल से लेकर पंजाबी शेफ संजीव कपूर और विकास खन्ना तक की रेसिपी में कोहिनूर की तरह जगमगाते रसगुल्ले की आखिर हकीकत क्या है? इसे तो हर हलवाई बनाता है। अब तो इंस्टेंट मिक्स भी मिलता है। देशी से लेकर मल्टीनेशनल कंपनियां तक मिक्स बेच मुनाफा कमा रहीं हैं। घर पर भी दूध फाड़ कर इसे बना लिया जाता है। इतना सुलभ...इतना सहज रसगुल्ला आखिर है किसका?  
पश्चिम बंगाल का दावा है कि कलकत्ता के नबीन चंद्र दास ने इस मिठाई की खोज की थी। न्यूटन और आइंस्टीन द्वारा धोखे से की गई बड़ी खोजों की ही तर्ज पर नबीन बाबू बनाते तो प्रसिद्ध बंगाली मिठाई 'सोन्देश' थे पर साल 1868 में एक दिन रोसोगुल्ला की ईजाद हो गई। अब उनके वारिस और बड़े रोसोगुल्ला कारोबारी के.सी. दास इस पर अपना अधिकार जताने और बांग्ला गौरव से इसे जोड़ने इसका इतिहास लिखवा रहे हैं। जिसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपा जाएगा। पड़ोसी से बड़ा जलकुकड़ा भी कोई हो सकता है क्या? ओड़िसा ने भी दांव चल दिया कि रोसोगुल्ला के बंगाली अविष्कार से बहुत पहले से रसगुल्ला उनके घर बनता आ रहा है। तुर्रा ये कि अपने भात के लिए जगप्रसिद्ध पुरी के भगवान जगन्नाथ को इसका भोग लगभग 300 साल से लग रहा है। यानी बंगाल से 150 साल पहले से। इतिहास का कोई जानकर एक हजार साल पुरानी परम्परा की दुहाई दे रहा है तो कोई 13 वीं तो कोई 18 वीं सदी के प्रमाण बता रहा है। धार्मिक आख्यान भी हैं, दलील को मजबूती देने। इसका जन्मस्थान भी खोज लिया गया। कटक और भुवनेश्वर के बीच नेशनल हाइवे नंबर 5 पर स्थित पाहाल गांव को जन्मस्थली बताया जा रहा है, जहां के रसगुल्ले काफी मशहूर हैं। ओडिसा सरकार इसी गांव के रसगुल्ले को जीआई मान्यता दिलाना चाहती है। तो बात बस इतनी सी ही है जियोग्राफिकल इंडिकेशन की। ये हुआ तो...!
न जी बात इतनी सी नहीं है! बात अस्मिता की है। राजनीति की है। जनता को भरमाने की है। गुम हो चुकी सड़क, कागजों में बन रही नहर या हवा में खुद रहे सरकारी कुओं को तलाशने का ऐसा जज्बा क्यों नहीं होता जैसा रसगुल्ले को लेकर है। आम आदमी, विकास और सुविधाएं बेमानी हैं इसकी मिठास के सामने। सरकारों को खोजना है तो सड़क, बिजली और पानी क्यों नहीं खोजा जाता। रसगुल्ले का इतिहास खंगालने की इतनी मशक्कत से हासिल क्या होगा ! जिसकी रेसिपी पर किसी सरकार का कण्ट्रोल नहीं। जिसका जब मन करे खरीद कर लाए...घर में बनाए और गप कर जाए। रसगुल्ला तो रसगुल्ला ही रहेगा। इसकी मिठास, मुलायम सफेदी और लज्जत पर रसगुल्ले के सिवा किसी और का पेटेंट हो सकता है क्या? चिंता नको।वाह रसगुल्ला। वाह रोसोगुल्ला।


Thursday, September 10, 2015

दाग अच्छे भी हों, बुरे होते हैं

विश्व हिंदी सम्मेलन में आए देश और दुनिया भर के हिंदी प्रेमियों के बीच आंध्रप्रदेश से आए एक सज्जन अनायास भोजनशाला में टकरा गए। पंडाल से लेकर सम्मेलन की तमाम विशेषताओं और स्वागत सत्कार के लिए उन्होंने मध्यप्रदेश की तारीफ की। लेकिन, प्रदेश की पहचान के सवाल पर बोले, व्यापमं से है मध्यप्रदेश की पहचान।
तेलगु लहजे की हिंदी बोलने वाले उन विद्वान ने यह बात आयोजनकर्ताओं या इस आयोजन से जुड़े किसी व्यक्ति के सामने कही होती तो शायद तत्काल वापसी का टिकट मिल गया होता। वो खुशकिस्मत थे। पर क्या इतना बड़ा वैश्विक आयोजन करने के बाद भी मध्यप्रदेश खुशकिस्मत बन पाया ? इस प्रदेश पर 31 साल पहले गैस काण्ड का ग्रहण लगा था। गूगल देवता से मध्यप्रदेश या मध्यप्रदेश की राजधानी के बारे में पूछो तो गैस त्रासदी का चेहरा दिखाते अनगिनत पेज वो सामने फेंक देता था। मानो भोपाल जिंदा लोगों का शहर नहीं लाशों का कब्रिस्तान हो! दुनिया भर में काम कर रहे कई एनजीओ से लेकर पर्यावरणवादी, मानवतावादी और मानववादी संगठन और लोग भोपाल को सिर्फ और सिर्फ गैस काण्ड की वजह से जानते आए हैं...पीढी बदलने के बावजूद यह पहचान नहीं बदल सकी थी। उड़ीसा के कालाहांडी जिले के साथ जैसे भुखमरी की पहचान चिपकी हुई है ठीक वही हाल भोपाल का था।
बीमारू प्रदेश की लिस्ट से खुद बाहर होकर इस बीमारू राज्य शब्द का आस्तित्व समाप्त कराने वाले मध्यप्रदेश का यह दुर्भाग्य ही है कि उसे सकारात्मक पहचान मिल ही नहीं पा रही। अब बीमारू नहीं रहा, कहने से काम नहीं चलता। विकासशील हो गया है, कहना भी कोई प्रभाव नहीं डालता। मध्यप्रदेश को नई पहचान मिली है व्यापमं से। इस घोटाले ने लोगों पर जो प्रभाव डाला हो वो अपनी जगह, इसने नकारात्मक ढंग से पूरे प्रदेश को प्रभावित कर दिया है। घोटालेबाजों को सलाखों के पीछे भेजने वाली सरकार की मंशा का भी इसमें अच्छा या बुरा... योगदान तो है ही। क्या कोई अपना ही घाव दुनिया के सामने उघारता है ? नहीं न! घाव का इलाज किया जाता है। डॉक्टर को दिखाया जाता है और मर्ज के कारणों को दूर किया जाता है। घाव की नुमाइश नहीं की जाती। व्यापमं मामले में इलाज की तुलना में नुमाइश ज्यादा हो गई और ये वो नासूर बन गया जिसका दाग आसानी से नहीं मिटता।
शायद ये किस्मत का ही लेख है कि प्रदेश को प्रसिद्धि 'सद्' कार्यों के लिए नहीं मिलती। राष्ट्रीय मीडिया के मित्र बताते हैं कि मध्यप्रदेश की सकारात्मक खबरों के लिए उनके संस्थान में स्थान नहीं है। हां, नकारात्मक समाचार हो तो खूब चलता है। अब विश्व हिंदी सम्मलेन को ही देख लीजिए। वो तवज्जो नहीं, जो होनी चाहिए थी इस अंतर्राष्ट्रीय आयोजन की। इसीलिए गेंहू की पैदावार में पंजाब को पीछे छोड़ने वाला मध्यप्रदेश। देश को लाड़ली लक्ष्मी योजना देने वाला मध्यप्रदेश। कई विशेषताओं वाला प्रदेश जाना जाता है तो व्यापमं घोटाले से। उम्मीद की जानी चाहिए कि आंध्रप्रदेश से आए उन महानुभाव की तरह बाकी भद्रजन सम्मेलन से जब लौटें तो मध्यप्रदेश की नई पहचान लेकर जाएं....कि ये हिंदी प्रदेश है। देश का ह्रदयप्रदेश है। व्यापमं प्रदेश नहीं। ये दाग अच्छा नहीं है। व्यापमं का भर्ती घोटाला भले ही सीबीआई तक पहुंच गया हो, उसके आगे भी मध्यप्रदेश है। आखिर दाग कैसे भी हों वो हमेशा अच्छे नहीं होते। कुछ दाग इतने बुरे होते हैं कि पहचान बदल देते हैं। 

विवादों का जनरल


कुछ लोगों को बखेड़ा खड़ा करने में आनंद आता है। भारत के विदेश राज्य मंत्री जनरल विजय कुमार सिंह भी ऐसे ही लोगों में शुमार हैं। देश में 32 साल बाद हो रहे विश्व हिंदी सम्मलेन से ठीक एक दिन पहले  जनरल
साहब के श्रीमुख पर फिर सरस्वती की जगह कोई आसुरी शक्ति विराजमान हो गई और उन्होंने दे डाला एक और विवादित बयान....जी हां, विवादित बयान, जो इनकी आदत में शुमार रहा है।
जनरल वीके सिंह उस टीम के अहम अंग हैं, जो सम्मेलन का काम देख रही है। वे कुछ दिनों से भोपाल में ही डेरा डाले बैठे हैं और उस मीडिया को घूम-घूम कर इंटरव्यू दे रहे हैं...जिसके लिए उन्हें 'प्रोस्टीट्यूट' जैसे शब्दों के इस्तेमाल से भी परहेज नही रहा है। जनरल साहब ने हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन करने आ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने से एक दिन पहले वो बयान दे दिया, जिसने साहित्य जगत में हलचल मचा दी है। इस आयोजन में आमंत्रित नहीं किए जाने से खफा बैठे कई साहित्य मनीषियों के माथे पर जनरल की बातों से बल पड़ गए हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या साहित्यकार केवल खाने और दारू पीने ऐसे आयोजनों में आते थे ? आते भी थे तो क्या सरकार उनकी खातिरदारी इसी तरह करती थी ?
बंदूक से निकली गोली लौट कर नहीं आती। इस तथ्य से तो सेना प्रमुख रहे वी के सिंह बखूबी वाकिफ होंगे, लेकिन जुबान से निकली बोली का भी यही अंदाज और अंजाम होता है...ये जानने समझने में उन्हें समय लगता है। फौजी जो ठहरे। फौज में राजनीति का स्थान नहीं होता।आम फौजी राजनीति कर भी नहीं सकता। लेफ्ट, राईट, कदमताल, दाहिने मुड़, तेज चल...से समय मिले तो राजनीति करे। पर विजय कुमार तो विजय कुमार हैं। हिंदी सम्मेलन का समापन करने आ रहे महानायक अमिताभ बच्चन की सिल्वर जुबली फिल्मों में हीरो का नाम यूंही तो नहीं विजय रखा जाता था। इस नाम में दम है। सो जनरल भी दमदारी से बोल बचन कर लेते हैं। ये अलग बात है कि नौसिखुआ राजनेता होने के कारण मिसफायर ज्यादा होता है। 
भोपाल से ही पीएचडी कर चुके वी के सिंह तब भी विवाद में थे जब पूरा जीवन नौकरी और कई प्रमोशन लेने के बाद रिटायरमेंट की बेला में उन्हें अपनी असली जन्मतिथि पता चली। शायद कभी जन्मकुंडली बचवाने की जरुरत नहीं पड़ी होगी। विवाद तब भी उनके साथ थे। अब भी हैं। विवाद ही वो वजह हो सकते हैं जिनसे बीजेपी का दिल इन पर आया और फौजी नेता बन गया। जो मन में आए बोलो और बाद में पलट जाओ। नेतागिरी के लिए इससे बड़ा और कौन सा गुण चाहिए ! अतिरिक्त योग्यता अण्णा आंदोलन से मिल गयी। विशेष अहर्ता ये कि जनरल की सरकार जब फौजियों को वन रैंक वन पेंशन पर अड़ रही थी जनरल नींद में थे और उनकी बिटिया पूर्व सैनिकों के साथ धरने पर। यानी राजनीति के सारे गुण सिंह साहब की कुंडली में मौजूद हैं। फिर डर काहे का। बोलिए जो मर्जी हो। दोष दीजिए उस बिरादरी को जिसके दम पर हिंदी सम्मेलन की और खुद की ब्रांडिंग कर रहे हैं। सुर्खियों में बने रहना है... तो बने रहेंगे।

अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसक...