ये पाकिस्तानी हास्य कलाकार उमर शरीफ के मशहूर स्टेज शो का टाइटिल जरूर है....लेकिन मामला कहीं से भी पाकिस्तानी नहीं है। पूर्ण स्वदेशी है। गांधी के स्वराज की तरह स्वदेशी। भारत के संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार जैसा...बकरा किश्तों पर।

तो साहब, हनुमानजी के दिन यानी मंगलवार को भारत भूमि के एक बकरे को जीवनदान मिलने का फरमान मिल गया। पता नहीं वो बकरा इसे सुन कर कितना खुश हुआ होगा। उसके लिए तो कोई विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मिलने वाली खुशी जैसी होगी ये खुशी। राजनीतिक दल में कोई उच्च प्रभावशाली पद हासिल होने पर मिलने वाली प्रसन्नता जैसी अनुभूति हो रही होगी उसे। आखिर वो बकरा किसी गांव खेड़े या गली मोहल्ले का तो है नहीं। उसका नाता तो देश के ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश के ह्दय क्षेत्र में स्थित एक गौरवशाली राजनीतिक दल से जुड़ गया है। उसे बकरीद के दिन राष्ट्रीय दल के इसी प्रादेशिक कार्यालय के सामने कुर्बान करने का जो तय हुआ था। पता नहीं क्यों और कैसे...उसकी इस स्थल पर कुर्बानी देने की ठानने वालों का मन पलट गया। और...वह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने से चूक गया। अब बकरे को जान बचने की खुशी है तो इतिहास के पन्नों तक नहीं पहुंच पाने का गम भी। बेचारा करे तो क्या करे ! उसके बस में होता तो लिंक रोड पर किसी बस के नीचे आकर जान दे देता...लेकिन उससे वह दुर्घटना में हलाक तो साबित हो सकता था...कुर्बान नहीं।
खैर बकरे की बकरा जाने...हम तो उमर शरीफ के बकरा किश्तों वाले चुटीले हास्य को याद करते हैं...जिसमें एक प्रसंग में आग के चक्कर लगाते...लगाते अचानक नाटक का हीरो रूक जाता है...क्योंकि फेरे डालने से उसके हिंदू हो जाने का खतरा जो उसे दिखता है। बस सियासी बकरे की जान की शामत आने की वजह भी ऐसी ही है। लगातार तीन विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से शिकस्त झेलने के बाद जब मध्यप्रदेश कांग्रेस के कर्णधारों ने बीजेपी के चाल, चरित्र और चेहरे के परे झांक कर देखा तो उन्हें वहां तंत्र, मंत्र और यंत्र के साथ आस्था नजर आई। बस अपने ग्रह नक्षत्र सुधारने के लिए प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में भी बीजेपी टाइप टोटके किए गए। फायदा न हुआ तो दो साल से बीजेपी की तर्ज पर गणेशोत्सव मनाया जाने लगा। कांग्रेस तो 100 टका वाली धर्मनिरपेक्ष पार्टी है। गणेशजी बैठेंगे तो ईद भी मनेगी और क्रिसमस भी। सो भाई लोगों ने गणेश का जवाब बकरीद से देने का तय कर लिया।

ये त्योहार भी उस मौके पर आए, जब प्रदेश कांग्रेस में पदों की रेवड़ी बंटने के बाद कलह के कैक्टस उगे हुए हैं। जिन्हें पद नहीं मिला भोपाल और दिल्ली के बीच चलने वाली शान-ए-भोपाल एक्सप्रेस को ही घरौंदा बनाए हुए हैं। एक टांग यहां दूसरी दिल्ली में। इन्हीं में से कुछ पक्के कांग्रेसियों ने विरोध का तरीका ढूंढा। गणेश स्थापना के जवाब में पार्टी कार्यालय के सामने बकरीद मनाने का ! सच है। कोई वहां शंख झालर बजा कर सुबह शाम गणेश भगवान की आराधना कर सकता है तो दूसरे को अपनी आस्था के प्रदर्शन से कैसे रोका जा सकता है। बकरीद पर बकरे की कुर्बानी के जज्बे ने इस पार्टी की साख बढ़ा ही दी होगी ! इसे लेकर नाटक नौटंकी जितनी हो सकती थी, सब हुई। किसी से बकरे की जान को खतरे की चिंता जताई गई तो किसी पर शक जताया गया। कुल जमा उमर शरीफ को शर्मिंदा करने लायक सारे आइटम थे। खैर कोई आकाशवाणी हुई...कोई संदेश आया। या फिर सद्बुद्धि। अचानक कार्यालय में बकरे की कुर्बानी का आइडिया ड्राप कर दिया गया। बाकायदा प्रेस नोट जारी कर 'शाकाहारी ईद मिलन' की घोषणा हो गई। साल भर पहले भी ऐसा ही एपिसोड हुआ था। तब बकरा तो नहीं आया था, पर उसके गोस्त से बने कबाब के चर्चे जरूर थे। धन्य हैं सोशल मीडिया पर छाए एक महानगर के वो बाशिंदे जिन्होंने नमाज अता करते वक्त आधी सड़क गणेश जी के लिए छोड़ दी थी। धन्य वो गणेश भक्त भी, जिन्होंने नमाज का सम्मान करते हुए शांति से जुलुस निकाला। उन्होंने भी तो बकरा किश्तों पर... देखा होगा। हमने भी देखा, पर शायद हमारे चश्मे का नंबर अलग था।
( संदर्भ- मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में गणेश स्थापना और बकरीद मनाने को लेकर कांग्रेस नेताओं के बीच मचा घमासान और उसका उतना ही रोचक पटाक्षेप।)
2 comments:
शानदार प्रभु जी
बकरा किस्तो पर....धार्मिक राजनीति को व्यंगात्मक चश्मे से पेश करना कमाल की प्रस्तुति.....शानदार ।।
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