Monday, November 26, 2018

तो क्या कर्जमाफी बनेगी गले की फांस?


खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे....किसानों की आय को तीन साल में दोगुना करेंगे...किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर कर्ज...ब्याज समाधान योजना...संबल योजना में पांच एकड़ तक जमीन वाले किसान को शामिल करना...आदि, इत्यादि ढेरों किसान हितैषी योजनाओं और घोषणाओं पर क्या कांग्रेस की एक घोषणा कर्जमाफी भारी पड़ गई है? चुनाव प्रचार के अंतिम दो दिनों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भाषण इसकी चुगली कर रहे हैं कि कर्जमाफी का इतना अंडर करंट कहीं न कहीं तो है, जो भाजपा को अब डरा रहा है।
डर का कारण है छत्तीसगढ़ से आती हवा। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में भी किसानों का कर्जा दस दिन के भीतर माफ करने और धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया है। इस घोषणा का असर यह हुआ कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी केंद्र तो सजे हुए हैं, लेकिन किसान धान बेचने नहीं आ रहे। उन्हें इंतजार है 11 दिसंबर का, जब चुनाव परिणाम आएंगे। उम्मीद है कि कांग्रेस की सरकार बनी तो वे अपनी धान का ज्यादा दाम अर्जित करेंगे।

पड़ोस के चूल्हे की सुगंध अपने आंगन में महकने जैसा मामला बनता देख भाजपा चौकन्नी हो गई है। फिर यह तो सुगंधित चावल के लिए मशहूर धान के कटोरे से उठी बयार है तो सतर्क होना जरूरी भी है। इसीलिए शिवराज सिंह चौहान ने रविवार से अपने भाषण का टोन और ट्रैक बदल लिया है। अब कांग्रेस द्वारा कर्जमाफी की घोषणा को पंजाब और कर्नाटक के संदर्भ में मजाक बनाने से ज्यादा तवज्जो वे किसानों को भांति-भांति की योजनाओं से कर्जमुक्त करने का भरोसा दिलाने में कर रहे हैं। उन्हें बार-बार याद दिलाना पड़ रहा है कि वे खुद किसान के बेटे हैं और कर्ज का बोझ किसान को किसान को किस हद तक विचलित करता है उसे अच्छी तरह समझते हैं। किसानों को उनके पसीने की भरपूर कीमत दिलाएंगे, जिससे कर्ज का बोझ उन पर कभी नहीं रहेगा। जितना बोनस बड़े किसानों को दिया जा रहा, उतना ही बोनस छोटे किसानों को भी एवरेज के हिसाब से दिया जाएगा। प्रदेश के किसानों को कर्जदार नहीं रहने देंगे। डिफॉल्टर किसान के लिए समाधान योजना के अलावा ऐसे उपाय करेंगे, जिससे वे कर्जमुक्त हो सकें। शिवराज इसके साथ ही यह कहना भी नहीं चूकते कि कांग्रेस ने फूटी कौड़ी तक किसानों को नहीं दी, बोनस दूर की बात है। कांग्रेस अध्यक्ष 10 दिन में यह कर देंगे, वह कर देंगे बोलते हैं, उनसे बोलो चंदा मामा तोड़ कर ले आओ, शायद 10 दिन में दे देंगे। कर्नाटक, पंजाब में एक पैसा किसानों का कर्ज माफ नहीं किया।
 कांग्रेस पर चुनावी हमले अपनी जगह। किसानों के कर्ज को लेकर शिवराज की बदली भाषा बताती है कि मंदसौर में पुलिस गोलीकांड के बाद से राजनीति के केंद्र में आए किसानों पर कर्जमाफी का मुद्दा गले की फांस बनता जा रहा है। भाजपा इससे पहले 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में कर्जमाफी को शामिल कर मंदसौर के लोकसभा चुनाव में उसका खामियाजा भुगत चुकी है। उस घोषणा से पार पाने के लिए मुख्यमंत्री और सरकार को तब कर्जमाफी को ही अनुपयुक्त बताना पड़ा था। दूसरी ओर कांग्रेस है, जिसके अध्यक्ष राहुल गांधी के मंदसौर की धरती से ही कर्जमाफी का राग छेड़ा था और उसे मध्यप्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ और राजस्थान तक ले गए। 

कर्जमाफी कांग्रेस के वचनपत्र का सबसे ज्यादा लुभावना नारा बन गया है। इसीलिए कमलनाथ भी शिवराज सिंह की बदली बोली पर तंज कसने से नहीं चूके। जनसभा से ज्यादा ट्वीटर पर बोलने वाले कमलनाथ ने ट्वीट किया है- जो पिछले 15 वर्ष से खेती को घाटे का धंधा बनाते चले गए... किसानों को कर्ज के दलदल में धकेलते चले गए...हक मांगने पर सीने में गोलियां व लाठियां दागते रहे...कर्ज माफी की मांग पर उनका मजाक उड़ाते रहे...वो चुनाव के दो दिन पूर्व फिर किसान भाइयों को अगले 5 साल के झूठे सपने दिखा रहे है। यह और बात है कि सरकार में होने के कारण शिवराज को किसानों के कर्ज माफ करने के बजाए अन्य उपाय ज्यादा फायदेमंद दिख रहे हैं, क्योंकि खजाने पर इसके असर का आकलन उनके पास है। सरकार बनी तो कांग्रेस को भी इसे लेकर चिंतित होना ही पड़ेगा।





Tuesday, November 20, 2018

राहुल को राफेल तो मोदी-शाह को कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की चिंता


एमपी की धरती पर सेट हो रहा है 2019 चुनाव का एजेंडा! 


मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों में अभी विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों में प्रत्याशी, जिले के नेता, प्रदेश के नेता और राष्ट्रीय नेता तक प्रचार में अपनी आहुति दे रहे हैं। चुनाव में मुद्दा तो इन प्रदेशों का विकास होना चाहिए था, लेकिन दिल्ली से आने वाले नेताओं के एजेंडे पर प्रदेश की समस्याएं और वो मुद्दे नहीं हैं, जो जनता से सीधे जुड़े हैं। मध्यप्रदेश की धरती पर कोई राफेल की डील की कहानी लिख रहा है तो किसी को 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की चिंता सता रही है। नेताओं के यह बोल यूंही नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के बहाने वे पांच माह बाद होने वाले आम चुनाव के एजेंडा सेट कर रहे हैं।
बैतूल हो या खातेगांव, वहां के आदिवासी एवं ग्रामीण जनता को कांग्रेस के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी

बनने से क्या फर्क पड़ता है? वे तो उम्मीदवार में अपनी समस्याओं को दूर करने की काबिलियत तलाश रहे हैं। फिर भी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उन्हें कांग्रेस पार्टी के प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनने का पाठ पढ़ा गए। शाह ने अपनी चुनावी सभाओं में कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की जितनी चिंता की है उतनी बार तो उन्होंने भाजपा प्रत्याशियों को जिताने की अपील भी नहीं की। वे यह स्थापित करने की कोशिश करते दिख रहे हैं कि 133 साल पुरानी गौरवशाली कांग्रेस का इतिहास जैसे कुछ हो ही नहीं। इस पार्टी पर नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा होना भाजपा को पाक अधिकृत कश्मीर से भी ज्यादा नुकसानदायक दिख रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कमलनाथ के छिंदवाड़ा में राहुल गांधी पर तंज कसते हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस के नेता कंफ्यूज हो गए हैं और पूरी की पूरी पार्टी फ्यूज हो गई है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके परिवार पर भाजपा के शीर्ष नेताओं के यह हमले अकारण नहीं हैं। मई में होने वाले लोकसभा के चुनाव के लिए मुद्दों का लिटमस टेस्ट हो रहा है। पांच साल तक पूर्ण बहुमत से देश चला रही भाजपा को चुनाव मैदान में विरोधी पार्टी के खिलाफ बोलने के लिए कुछ तो चाहिए। कांग्रेस केंद्र तो क्या देश के अधिकांश प्रदेशों में भी सत्ता से बाहर है, ऐसे में उसकी खामियां या गलत नीतियां कैसे गिनाई जा सकती हैं? यूपीए राज से अपने विकास की तुलना को तूल देंगे तो नोटबंदी और जीएसटी के साथ पेट्रोल-डीजल के दाम संकट खड़ा करते हैं। बस इसीलिए कुछ और की तलाश कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र पर आकर ठहर गई है। आजादी के बाद बने कांग्रेस के कुल 17 अध्यक्षों में से चार राहुल गांधी के पूर्वज हों, यह मुद्दा कांग्रेस के लिए गौरव की बात हो सकती है, लेकिन भाजपा को इसमें ही राहुल की कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का मटेरियल दिख रहा है। इसीलिए शाह के बयान पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर मंत्री नरोत्तम मिश्र तक सवाल उठा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र होना चाहिए या नहीं? क्या प्रधानमंत्री पद भी किसी घराने से चलेगा?
पाक-साफ होने के मोदी और उनकी सरकार के दावे ने ही कांग्रेस और राहुल गांधी को राफेल का सिरा पकड़ाया है। कभी बोफोर्स घोटाले की आंच में जल चुकी कांग्रेस वैसे ही मुद्दे राफेल के बहाने मोदी के झक सफेद कुर्ते की असलियत खोलने को बेताब हैं। राहुल हों या मोदी और शाह, उनके मुद्दे मध्यप्रदेश के मुद्दे नहीं हैं। ये नेता गावों के शत-प्रतिशत ओडीएफ होने के दावे की असलियत नहीं बताते। हर साल बनतीं-उखड़ती सड़कों और रोजगार एवं बेरोजगारी के दावों की सच्चाई पर नहीं जाते, क्योंकि इन मुद्दों पर किए गए दावे आगे चल हर खाते में 15 लाख रुपए का काला धन आने जैसा जुमला साबित हो सकते हैं। इसलिए लोगों के घर में चूल्हा जला या नहीं यह देखने के बजाए विरोधियों के घर में आंतरिक लोकतंत्र है या नहीं यह देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि शुरू से ही भाजपा के लिए मध्यप्रदेश राजनीति की वह प्रयोगशाला रहा है। इसीलिए भाजपा प्रदेश के चुनाव में भी राममंदिर, तीन तलाक, कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र समेत कई नए मुद्दों का टेस्ट कर रही है।



Monday, November 19, 2018

छिंदवाड़ा यदि विकास का पैमाना है तो गढ़ाकोटा के गोपालजी भी हैं दावेदार

जब से कमलनाथ कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष बने हैं, आदिवासी क्षेत्र छिंदवाड़ा राजनीति का केंद्रबिंदु बनने को बेताब हो गया है। कमलनाथ भी विकास के हर पैमाने पर छिंदवाड़ा को प्रदेश के किसी भी शहर, गांव या जिले से इक्कीस साबित करने का कोई मौका नहीं चूक रहे। यदि किसी एक क्षेत्र विशेष में तीस-चालीस सालों की साध ही समग्र विकास का पैमाना है तो कमलनाथ ही क्यों, गढ़ाकोटा के गोपालजी यानी भाजपा के गोपाल भार्गव भी मुख्यमंत्री पद की इस रेस में मुकाबला कर सकते हैं, और कर भी रहे हैं।
जैसे छिंदवाड़ा का समूचा विकास कमलनाथ की देन है, ठीक उसी प्रकार गढ़ाकोटा की 'सबै भूमि गोपालजी' की है। रहली विधानसभा क्षेत्र में तामीर हुई हर इमारत, पुल, पुलिया से लेकर खेल मैदान और बॉडी बिल्डर
कार्यकर्ता तैयार करने की फैक्ट्री (जिम) तक गोपालजी के नाम पर है। यहां तक कि इस क्षेत्र से कोई युवा पुलिस भर्ती में चुन लिया जाए तो वह भी गोपालजी के जिम की कृपा ही मानी जाती है। मुफ्त भोजनालय से लेकर क्षेत्रवासियों की हर दिक्कत का हल 'गणनायक' से निकलता है। गणनायक में ही अलसुबह तक गोपालजी का नियमित और अनवरत दरबार लगता है। पिछले विधानसभा चुनाव में एक दिन भी वोट मांगने के लिए न निकल कर गोपाल भार्गव ने अनूठा रिकॉर्ड बनाया था। वो पूरे समय घर या गणनायक में ही बैठे रहे और सातवीं बार विधानसभा में पहुंच गए थे। भार्गव के पास एक रिकॉर्ड और है कि वे अकेले ऐसे मंत्री हैं जो बीते 15 साल से लगातार कैबिनेट में शामिल हैं। भले ही इस दौर में तीन मुख्यमंत्री बदल गए हों। बस इसीलिए, उनके क्षेत्र में पोस्टर दिख रहे हैं- 'मंत्री नहीं संतरी है आगामी मुख्यमंत्री है'। भार्गव की यह तमन्ना और वरिष्ठतम मंत्री, अनुभवी, उच्चशिक्षित राजनेता वाले समर्थकों के तर्क चुनावी दांव-पेंच से ज्यादा तब तक कुछ नहीं, जब तक कि उनकी पार्टी बहुमत न हासिल कर ले और विधायक दल अथवा हाईकमान मुख्यमंत्री पद के लिए उनका चयन न कर ले।
बात करें कमलनाथ की तो। सपने वहां भी मुख्यमंत्री पद के ही हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश का कैसा विकास करेंगे इसकी बानगी वे छिंदवाड़ा के विकास से दिखा रहे हैं। छिंदवाड़ा में यस बैंक एवं स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक खुल गया है या हनुमान जी की 101 फीट की अलौकिक प्रतिमा बन गई है। गिनती की ट्रेन और मुसाफिरों वाला छिंदवाड़ा रेलवे स्टेशन मॉडल स्टेशन है। यह कमलनाथ और छिंदवाड़ा के साथ प्रदेश के लिए गौरव की बात है, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि कमलनाथ मुख्यमंत्री बने तब हर शहर में 101 फीट के हनुमानजी स्थापित हो जाएंगे। हर स्टेशन मॉडल बन जाएगा। यस बैंक और स्टैण्डर्ड चार्टर्ड बैंक की शाखाएं गांव-मोहल्लों तक खुल जाएंगी। छिंदवाड़ा में चल रहे उद्योग और काम-धंधों के लिए इनकी जरूरत हो सकती है इसलिए वहां ये हैं। जरूरी नहीं कि छिंदवाड़ा के सभी गांवों में यस बैंक हो और सरकार बनी तो प्रदेश भर के निपट किसानों वाले गांव में भी विदेशी बैंक की शाखा खुले, जहां किसान का सारा काम सोसायटी या ग्रामीण बैंक से ही चल जाता है। कमलनाथ के संसदीय क्षेत्र के हर गांव या कस्बे में विदेशी बैंक हों यह भी आवश्यक नहीं है। उनका यह कथन तो शो-केस में सजे डिस्प्ले के सामान जैसा है।
 छिंदवाड़ा से चालीस साल के अपने जुड़ाव में कमलनाथ ने विकास की कई उल्लेखनीय सौगातें दी हैं, यह अच्छी बात है। विकास के मामले में छिंदवाड़ा की बुदनी से उनकी तुलना जायज तो है, किंतु ये दोनों स्थान पूरा मध्यप्रदेश नहीं हैं। बस इसीलिए पूरे प्रदेश को छिंदवाड़ा बनाने का उनका सपना और छिंदवाड़ा चैलेंज अतिश्योक्तिपूर्ण लगता है। छिंदवाड़ा में चुनाव प्रचार करने आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां का विकास मॉडल देखने का न्यौता देना सकारात्मक पहल है, किंतु इसी विकास में मदान्ध होना कतई उचित नहीं है। ठीक ऐसा दावा गढ़ाकोटा को लेकर गोपाल भार्गव कर सकते हैं। खुरई की अपने पांच साल की विधायकी में भूपेंद्र सिंह और दस साल में दतिया के विकास की दुहाई नरोत्तम मिश्र भी कुछ इसी तर्ज पर दे सकते हैं। लंबे समय तक केद्रीय मंत्री रहे कमलनाथ और प्रदेश के मंत्री गोपाल भार्गव भी जानते होंगे कि किसी क्षेत्र की किस्मत न तो सीधे केंद्र सरकार बदल सकती है और न ही अपने दम पर राज्य सरकार। जिन कार्यों को ये नेता गिना रहे हैं उसमें केंद्र और राज्य का पैसा और संसाधन लगा है, तब कहीं जाकर उनके नाम का शिलालेख लग पाया है। पूरे प्रदेश के चुनाव में एक क्षेत्र विशेष की इस ब्रांडिंग से सवाल उठता है कि क्या 50 साल के अपने शासनकाल में कांग्रेस ने प्रदेश के विकास का कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसका जिक्र कर सके। क्या दस साल की दिग्विजय सरकार की भी कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है, जिसका बखान कर पूरे प्रदेश को 15 साल के भाजपा-राज को आईना दिखाया जा सके? 



Sunday, November 18, 2018

साले संजय सिंह को हराने वोट मांगेंगे शिवराज



 सूबे की चुनावी जंग का सबसे रोचक मुकाबला 21 नवंबर को वारासिवनी में

 योगी आदित्यनाथ और उमा भारती के साथ अमित शाह भी ठोकेंगे ताल


विधानसभा चुनाव में प्रचार का सबसे रोचक मुकाबला 21 नवंबर को होने जा रहा है, जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पहली बार अपने साले संजय सिंह मसानी के खिलाफ जनता के बीच जाकर बोलेंगे। इस दौरे में शिवराज के साथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी होंगे। अभी तक संजय के मामले में खामोश रहे चौहान अपनी इस सभा में उनको हराने और भाजपा प्रत्याशी को जिताने की अपील करेंगे।
चुनाव प्रचार के दौरान हेलीकॉप्टर में घर से आया भोजन करते शिवराज
मुख्यमंत्री के करीबी रहे उनके साले संजय सिंह मसानी बालाघाट जिले की वारासिवनी सीट के भाजपा का टिकट चाहते थे, पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया तो वे कांग्रेस में शामिल हो गए और प्रदेश को शिवराज नहीं कमलनाथ जैसे मुख्यमंत्री की जरूरत है कह कर राजनीतिक सनसनी मचा दी थी। कांग्रेस ने भी उनके इस त्याग को ध्यान में रख कर अपने दमदार प्रत्याशी और पूर्व विधायक एवं पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप जायसवाल को अनदेखा कर संजय को उम्मीदवार बनाया। अब वारासिवनी में संजय अपनी जीत के साथ राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। इस क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे संजय के कांग्रेस से चुनाव लडऩे के कारण भाजपा प्रत्याशी डा. योगेंद्र निर्मल भी मुश्किल में फंस गए हैं।

मुख्यमंत्री हाल ही में 15 नवंबर को बालाघाट जिले की तीन विधानसभा सीट परसवाड़ा, कटंगी और लांजी में चुनावी सभाएं ले चुके हैं। लोगों को उम्मीद थी कि उनकी जिले की पहली चुनावी सभा वारासिवनी में भाजपा और शिवराज को निशाने पर रख रहे संजय के खिलाफ होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिले के वारासिवनी मे सीएम की डिमांड आने के बाद अब 21 नवंबर को मुख्यमंत्री अपने साले के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए पहुंच रहे हैं। इस क्षेत्र में पार्टी उनके साथ यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को भी उतार रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी 23 तारीख को बालाघाट में सभा लेकर जिले की सभी छह सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों को जिताने की अपील करेंगे। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती को लोधी मतदाताओं के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में उतारा जाएगा।
चतुष्कोणीय मुकाबले में वारासिवनी
दस उम्मीदवार वाली वारासिवनी सीट पर मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है। भाजपा विधायक और प्रत्याशी योगेंद्र निर्मल के खिलाफ पार्टी के बागी युवा नेता गौरव पारधी हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी संजय सिंह की मुश्किल पूर्व विधायक और जिलाध्यक्ष प्रदीप जायसवाल मैदान में निर्दलीय उतर कर बढ़ा रहे हैं।  


Saturday, November 17, 2018

एमपी की तरक्की का अपना-अपना चश्मा


               मोदी को दिखी मैक्सिमम प्रोग्रेस तो नाथ को मिनिमम विकास

विधानसभा चुनाव अभियान पर मध्यप्रदेश आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और जुमला पटक दिया है। अंग्रेजी और हिंदी शब्दों की बाजीगरी की अपनी कला का उम्दा प्रदर्शन करते हुए उन्होंने मध्यप्रदेश का नया अर्थ लोगों को बताया है- मैक्सिमम प्रोग्रेस। मैक्सिमम प्रोग्रेस यानी अधिकतम उन्नति। मध्यप्रदेश के इस नए शब्द संस्कार के साथ नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार को एक बार फिर विकास के उस मुद्दे की तरफ मोडऩे की कोशिश की है, जिसके सहारे वे 2019 आमचुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं।
 अभी तक भाजपा के प्रचार के केंद्र में 'महाराजथे तो कांग्रेस के मुद्दे 'झूठे वादेऔर 'गुस्साआधारित रहे। मोदी के मैक्सिमम के जवाब में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने मध्यप्रदेश का नया अर्थ बताया है- भाजपा राज में मिनिमम (न्यूनतम) प्रोग्रेस। मोदी कांग्रेस पार्टी को चुनौती देते हुए कहते हैं- 55 साल में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश को जितना दिया, हमने 15 साल में उससे कई गुना ज्यादा दिया है। मोदी को 2003 के चुनाव के दौरान सड़क को लेकर भाजपा के लगभग हर बड़े नेता द्वारा सुनाया गया जुमला फिर याद आया कि सड़क देख कर ही पता चल जाता था, मध्यप्रदेश आ गया है। 
 कमलनाथ के तरकश में घोषणाओं, झूठे वादों, अपराध, दुष्कर्म, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अवैध उत्खनन में हुई मध्यप्रदेश की मैक्सिमम तरक्की है। कमलनाथ का दावा है कि प्रदेश में विकास की प्रोग्रेस मिनिमम से भी मिनिमम है। 

अधिकतम और न्यूनतम विकास की इस नई बहस में अब एक बार फिर दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान की बिजली, सड़क और पानी की स्थिति का खाका सामने आए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विकास के सपने दिखाती भाजपा के पास गिनाने के लिए भले ही बहुत कुछ हो, कांग्रेस के पास भी कमियां बताने के लिए कम मुद्दे नहीं हैं। सवा सात करोड़ की आबादी और तीन लाख वर्ग किमी से अधिक क्षेत्रफल वाले प्रदेश में महज डेढ़ दशक में कायापलट करने का दावा हजम होने वाला नहीं है। फिर मोदी सरकार के ही नीति आयोग से लेकर विभिन्न एजेंसियों ने कुपोषण, महिला अपराध, विकास के मामले में पिछड़ेपन आदि को लेकर अपनी रिपोर्ट में मध्यप्रदेश की जो स्थिति रेखांकित कर रखी है वह मैक्सिमम प्रोग्रेस के मोदी के दावे से कतई मेल नहीं खाती। मिनिमम प्रोग्रेस का कमलनाथ का तंज भी मुफीद नहीं बैठता है। विकास तो हुआ है। किसी विकासशील राज्य में विकास तो होता ही है, लेकिन उसकी रफ्तार सरकार की मंशा और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है। 
चुनावी दावे और जुमलेबाजी अपनी जगह। मध्यप्रदेश में डेरा जमाए बैठे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा के पास भी विज्ञापन में दिखाई जा रही उस चमचमाती सड़क को लेकर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब नहीं हैं, जिसको लेकर कांग्रेस ने आपत्ति दर्ज करा रखी है। यह सड़क किस जिले में है या मध्यप्रदेश से गुजरने वाला कौन सा राष्ट्रीय या राजमार्ग है? सवाल सुनते ही मैक्सिमम बोलने वाले प्रवक्ताजी भी मिनिमम वाइस के साथ इधर-उधर हो जाते हैं।  


Friday, November 16, 2018

कमलनाथ की पाती और संस्कारी कांग्रेस!



विधानसभा चुनाव की तकरार चरम पर आने के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की अपने प्रत्याशियों और पार्टीजनों को लिखी गई एक पाती सार्वजनिक हुई है। पाती क्या है, चुनाव प्रचार की कमलनाथ द्वारा तैयार आचार संहिता है। यह आचार संहिता उस दौर में सामने आई जब खुद कमलनाथ जाति और धर्म विशेष को लेकर बंद कमरे में हुई अपनी बातचीत के वायरल होने से मुश्किल में आ गए हैं। वे कांग्रेसियों से उस सनातनी महाभारतकालीन तरीकों से चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे हैं, जिनका प्रयोग कई चुनाव पहले ही बंद हो चुका है।
 कमलनाथ ने अपनी चिट्ठी के जरिए उस स्वच्छ और पवित्र राजनीति को आत्मसात करने की अपील की है, जो आज के दौर में विलुप्त हो चुकी है। नाथ ने कहा है कि कांग्रेस में घृणा फैलाने और दूसरों को अपमानित करने की जगह नहीं है। उन्होंने पार्टीजनों से चुनाव के दौरान छह बिंदुओं पर सतर्कता बरतने को कहा है। ये बिंदु हैं-
  •         कोई भी कांग्रेस नेता धर्म और जाति से संबंधित किसी तरह की बातचीत,भाषण या मीडिया से चर्चा नहीं करेगा। विशेषकर जो धार्मिक, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील विषय सर्वोच्च
    न्यायालय में लंबित हैं, उन पर किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए।
  •      ज्यों-ज्यों चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है  कांग्रेस का प्रमुख प्रतिद्वंदी दल भाजपा अपनी हार  सुनिश्चित जानकर तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है, उनसे  सावधान रहें।
  •            किसी भी प्रतिद्वंदी पार्टी के नेताओं पर अनर्गल और असंसदीय या अपमानजनक भाषा में  टिप्पणी नहीं करें।
  •         बिना प्रमाण के कोई भी नेता किसी प्रतिद्वंदी  पार्टी पर आरोप नहीं लगाए।
  •         भाजपा चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के  हथकंडे अपना सकती है। कांग्रेस के सभी नेता और कार्यकर्ता जनता के बीच रह कर समाज   को बांटने वाली ताकतों द्वारा फैलाए जाने वाले भ्रम और अफवाहों से मुकाबला करने के लिए तैयार रहें।
  •        यदि किसी तरह के संविधान विरोधी हथकंडे,  दूसरे दलों  द्वारा चुनाव में उपयोग करते देखें   तो तत्काल जिले और प्रदेश के चुनाव अधिकारियों के संज्ञान में लाएं। कांग्रेसजन ऐसी कोई भी गतिविधि न करें जिससे आम जनता या लोगों को असुविधा हो।
कमलनाथ द्वारा दीपावली के मौके पर भेजी गई यह चिट्ठी आज उजागर हुई है। यह खत तब सामने आया है जब एक धर्म विशेष के लोगों के साथ कमराबंद बैठक में कमलनाथ द्वारा कही गई बातों का वीडियो चुनाव आयोग के दरवाजे पर शिकायत के साथ पहुंच चुका है। हालांकि नाथ कैंप का दावा है कि उन्होंने कोई अनर्गल बात नहीं कही थी, वो तो सिर्फ समझाइश दे रहे थे। दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है वाली स्टाइल में कमलनाथ की कांग्रेसियों से संस्कारी चुनाव लड़ने की यह अपील आरएसएस को लेकर उसके वचनपत्र में कही गई घोषणा को भाजपा द्वारा मनचाहा रुप देकर विवादित करने का भी नतीजा हो सकता है। बहरहाल जब चुनाव में दोनों दलों के बड़े नेता मंच पर बाहें चढ़ा कर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का कोई मौका नहीं चूकते तब कमलनाथ की कांग्रेस संस्कारवान बन कर 2018 की जंग जीतने उतरेगी!
कमलनाथ की इस पाती के बाद तो उनके चालीस सवाल भी बेमानी साबित हो सकते हैं, जिनमें से कुछ तो पुख्ता प्रमाण और जांच रिपोर्ट के बिना ही हुए हैं। शिवराज को घेरने वाली कांग्रेस की व्यापमं से लेकर ई-टेंडरिंग जैसे घोटालों को जनता के बीच उछालने की तैयारी भी बिना प्रमाण प्रतिद्वंदी पर आरोप नहीं लगाने की लक्ष्मणरेखा से बंध जाएगी। जब चुनाव में गाय, गंगाजल और राम मंदिर जैसे मुद्दे उछल रहे हों तब किसी धार्मिक मामले पर नहीं बोलने का प्रतिबंध कायम रख पाना क्या कमलनाथ और कांग्रेस के लिए संभव होगा। भाजपा और शिवराज तो कांग्रेस की हर गलती या बयान का भरपूर चुनावी फायदा लेने के लिए उतारू बैठे ही हैं। शिवराज के निशाने पर रोज कांग्रेस के बयान ही होते हैं। फिर चाहे वो कमलनाथ का महिलाओं को सजावट के फूल बताने वाला बयान हो या धर्म विशेष के लोगों द्वारा कांग्रेस को वोट देने की बात।
कमलनाथ ने उम्मीद जताई है कि उनके नेता और कार्यकर्ता पार्टी के इन निर्देशों का पूरी तरह पालन करेंगे। यानी संस्कारी ढ़ंग से चुनाव लड़ेंगे। कमलनाथ को ध्यान रखना चाहिए कि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहने के दौरान प्रभात झा भी कुछ इसीतरह संस्कारी हुए थे। उन्होंने 40 बिंदुओं का शुचिता फार्मूला दिया था, बाद में आरोप लगे कि खुद अध्यक्ष ने ही शुचिता संस्कार नहीं माने।


Thursday, November 15, 2018

भाजपा: दिग्गजों के पट्ठे और पद-प्रतिष्ठा वाले ही बागी


आम कार्यकर्ता माने, खास बने खटाई का सबब



भाजपा से नाराज जबलपुर उत्तर के निर्दलीय उम्मीदवार धीरज पटैरिया की बगावत समझ में आती है। भाजपा की युवा इकाई के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके धीरज पार्टी के घनघोर समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। वे दो चुनाव से टिकट की उम्मीद लगाए चुपचाप बैठे थे, इस बार भी उपेक्षा हुई तो पोखरण होना ही था और हुआ भी। लेकिन, 76 साल की पकी उम्र वाले रामकृष्ण कुसमरिया को क्या कहें? जो 46 साल से जनसंघ और भाजपा के विभिन्न पदों पर सुशोभित रहे। मार्गदर्शक मंडल वाली उमर में बगावत कर कांग्रेस उम्मीदवार बने सरताज सिंह हों, समीक्षा गुप्ता या फिर नरेंद्र सिंह कुशवाह। बागियों की फेहरिस्त में शामिल ज्यादातर नेता वो हैं, जिन्हें पार्टी ने जमकर उपकृत किया है। कुछ तो उन नेताओं के खासमखास हैं, जिन पर महत्वपूर्ण चुनावी जिम्मेदारी है। ऐसे में भाजपाइयों को पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री अरविंद मेनन याद आ रहे हैं, जो पद-प्रतिष्ठा के लाभ एवं हानि का झुनझुना दिखा कर पिछले चुनाव में बागियों को बैठाते थे। मेनन से जो माना वो मीर, जो न माना वो फकीर तक के किस्से उस दौर में चलते थे।
दमोह से बागी रामकृष्ण कुसमरिया बाबाजी को मनाने लगातार दो दिन तक हेलीकॉप्टर से दमोह के चक्कर काटने वाले पोखरण फ्रेम राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा ग्वालियर की अपनी समर्थक समीक्षा गुप्ता को क्यों नहीं बैठा पाए? प्रभात का ओज न तो बाबाजी को प्रभावित कर पाया और न ही समीक्षा ही इसकी समीक्षा कर पार्टीहित में निर्णय ले सकीं। भिंड के बागी विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह केंद्रीय मंत्री और प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर के दरबारी कहे जाते हैं। विधायक राजकुमार मेव हों या पूर्व मंत्री के.एल. अग्रवाल अथवा कोई और बागी। सभी किसी न किसी नेता से सीधे जुड़े हुए हैं। बड़े नेताओं की सरपरस्ती में ही इन्हें पार्टी मे पद और सत्ता का रसूख हासिल हुआ था।
कुसमरिया का पार्टी के लिए योगदान और पार्टी की कुसमरिया को देन देखें। बाबाजी दमोह से लेकर खजुराहो तक से सांसद रहे और क्षेत्र बदल कर चार बार विधायक बने। मंत्री पद पर भी आसीन हुए। पिछला विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारे। टिकट बांटने वाली कमेटी के कई बार सदस्य रहे। खुद दूसरे क्षेत्र के टिकट के दावेदार बने और पार्टी के सर्वे में फेल हुए तो दमोह और पथरिया दो-दो विधानसभा क्षेत्रों से निर्दलीय पर्चा भर कर खम ठोक दिया। बागी हुए कुसमरिया भाजपा के उन चुनिंदा 40 स्टार प्रचारकों की सूची में विराजमान हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ इस लिस्ट में जगह पाना किसी भी नेता के लिए गौरव की बात होती है।
होशंगाबाद में कांग्रेस के उम्मीदवार बने सरताज सिंह का इतिहास खंगालें, जिनका समूचा राजनीतिक जीवन ही कांग्रेस से लड़ते हुए बीता। साल 1970 में जनसंघ के जिलाध्यक्ष से लेकर नगर पालिका अध्यक्ष, पांच बार सांसद, दो बार विधायक, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश सरकार में मंत्री जैसे पद सरताज के ताज में सजते रहे। पंजाबी होने के बावजूद भाजपा और संघ की जमीनी जमावट में उन्हें हर बार नर्मदांचल में जीत हासिल होती रही। भाजपा में ऐसे कई बागी हैं, जिनका वजूद ही पार्टी या बड़े नेताओं से है। जिन्हें दूसरे नेताओं द्वारा खाली की गई जमीन या किसी नेता को खिसका कर वो ओहदा मिला था, जिसके दम पर वे आज पार्टी को आंख दिखा रहे हैं। क्या इस बगावत की जिम्मेदारी अकेले बागियों पर है या फिर उन्हें अब तक प्रश्रय देने वाले भी इसके भागीदार हैं? तात्कालिक नाराजगी में निर्दलीय पर्चा भरने वाले ललित पोरवाल जैसे कुछ नेता तो नाम वापसी के आखिरी दिन तक उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें भी मन्नू डागा, गणेशीलाल नायक और रवींद्र अवस्थी की तरह मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का फोन आ जाए और वो वापसी कर लें। कुछ फोन से माने, कुछ अपने आप बैठ गए और जो खड़े रह गए, वो सब दिग्गजों की आंखों के तारे हैं।
बागी कांग्रेस में भी कम नहीं हैं। भाजपा जैसी समस्या वहां भी है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के चरित्र में खासा अंतर है। भाजपा खुद को अनुशासित कार्यकर्ताओं की फौज बताती है तो कांग्रेस क्षत्रपों और पार्टी से ज्यादा अपने दम पर नेतागिरी करने वालों का दल है, फिर भी वहां भाजपा से तेज कार्रवाई हो रही बागियों पर। 






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