Sunday, November 18, 2018

साले संजय सिंह को हराने वोट मांगेंगे शिवराज



 सूबे की चुनावी जंग का सबसे रोचक मुकाबला 21 नवंबर को वारासिवनी में

 योगी आदित्यनाथ और उमा भारती के साथ अमित शाह भी ठोकेंगे ताल


विधानसभा चुनाव में प्रचार का सबसे रोचक मुकाबला 21 नवंबर को होने जा रहा है, जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पहली बार अपने साले संजय सिंह मसानी के खिलाफ जनता के बीच जाकर बोलेंगे। इस दौरे में शिवराज के साथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी होंगे। अभी तक संजय के मामले में खामोश रहे चौहान अपनी इस सभा में उनको हराने और भाजपा प्रत्याशी को जिताने की अपील करेंगे।
चुनाव प्रचार के दौरान हेलीकॉप्टर में घर से आया भोजन करते शिवराज
मुख्यमंत्री के करीबी रहे उनके साले संजय सिंह मसानी बालाघाट जिले की वारासिवनी सीट के भाजपा का टिकट चाहते थे, पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया तो वे कांग्रेस में शामिल हो गए और प्रदेश को शिवराज नहीं कमलनाथ जैसे मुख्यमंत्री की जरूरत है कह कर राजनीतिक सनसनी मचा दी थी। कांग्रेस ने भी उनके इस त्याग को ध्यान में रख कर अपने दमदार प्रत्याशी और पूर्व विधायक एवं पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप जायसवाल को अनदेखा कर संजय को उम्मीदवार बनाया। अब वारासिवनी में संजय अपनी जीत के साथ राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। इस क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे संजय के कांग्रेस से चुनाव लडऩे के कारण भाजपा प्रत्याशी डा. योगेंद्र निर्मल भी मुश्किल में फंस गए हैं।

मुख्यमंत्री हाल ही में 15 नवंबर को बालाघाट जिले की तीन विधानसभा सीट परसवाड़ा, कटंगी और लांजी में चुनावी सभाएं ले चुके हैं। लोगों को उम्मीद थी कि उनकी जिले की पहली चुनावी सभा वारासिवनी में भाजपा और शिवराज को निशाने पर रख रहे संजय के खिलाफ होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिले के वारासिवनी मे सीएम की डिमांड आने के बाद अब 21 नवंबर को मुख्यमंत्री अपने साले के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए पहुंच रहे हैं। इस क्षेत्र में पार्टी उनके साथ यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को भी उतार रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी 23 तारीख को बालाघाट में सभा लेकर जिले की सभी छह सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों को जिताने की अपील करेंगे। इतना ही नहीं केंद्रीय मंत्री उमा भारती को लोधी मतदाताओं के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में उतारा जाएगा।
चतुष्कोणीय मुकाबले में वारासिवनी
दस उम्मीदवार वाली वारासिवनी सीट पर मुकाबला चतुष्कोणीय हो गया है। भाजपा विधायक और प्रत्याशी योगेंद्र निर्मल के खिलाफ पार्टी के बागी युवा नेता गौरव पारधी हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी संजय सिंह की मुश्किल पूर्व विधायक और जिलाध्यक्ष प्रदीप जायसवाल मैदान में निर्दलीय उतर कर बढ़ा रहे हैं।  


Saturday, November 17, 2018

एमपी की तरक्की का अपना-अपना चश्मा


               मोदी को दिखी मैक्सिमम प्रोग्रेस तो नाथ को मिनिमम विकास

विधानसभा चुनाव अभियान पर मध्यप्रदेश आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और जुमला पटक दिया है। अंग्रेजी और हिंदी शब्दों की बाजीगरी की अपनी कला का उम्दा प्रदर्शन करते हुए उन्होंने मध्यप्रदेश का नया अर्थ लोगों को बताया है- मैक्सिमम प्रोग्रेस। मैक्सिमम प्रोग्रेस यानी अधिकतम उन्नति। मध्यप्रदेश के इस नए शब्द संस्कार के साथ नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार को एक बार फिर विकास के उस मुद्दे की तरफ मोडऩे की कोशिश की है, जिसके सहारे वे 2019 आमचुनाव की वैतरणी पार करना चाहते हैं।
 अभी तक भाजपा के प्रचार के केंद्र में 'महाराज’ थे तो कांग्रेस के मुद्दे 'झूठे वादे’ और 'गुस्सा’ आधारित रहे। मोदी के मैक्सिमम के जवाब में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने मध्यप्रदेश का नया अर्थ बताया है- भाजपा राज में मिनिमम (न्यूनतम) प्रोग्रेस। मोदी कांग्रेस पार्टी को चुनौती देते हुए कहते हैं- 55 साल में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश को जितना दिया, हमने 15 साल में उससे कई गुना ज्यादा दिया है। मोदी को 2003 के चुनाव के दौरान सड़क को लेकर भाजपा के लगभग हर बड़े नेता द्वारा सुनाया गया जुमला फिर याद आया कि सड़क देख कर ही पता चल जाता था, मध्यप्रदेश आ गया है। 
 कमलनाथ के तरकश में घोषणाओं, झूठे वादों, अपराध, दुष्कर्म, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अवैध उत्खनन में हुई मध्यप्रदेश की मैक्सिमम तरक्की है। कमलनाथ का दावा है कि प्रदेश में विकास की प्रोग्रेस मिनिमम से भी मिनिमम है। 

अधिकतम और न्यूनतम विकास की इस नई बहस में अब एक बार फिर दिग्विजय सिंह सरकार के दौरान की बिजली, सड़क और पानी की स्थिति का खाका सामने आए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। विकास के सपने दिखाती भाजपा के पास गिनाने के लिए भले ही बहुत कुछ हो, कांग्रेस के पास भी कमियां बताने के लिए कम मुद्दे नहीं हैं। सवा सात करोड़ की आबादी और तीन लाख वर्ग किमी से अधिक क्षेत्रफल वाले प्रदेश में महज डेढ़ दशक में कायापलट करने का दावा हजम होने वाला नहीं है। फिर मोदी सरकार के ही नीति आयोग से लेकर विभिन्न एजेंसियों ने कुपोषण, महिला अपराध, विकास के मामले में पिछड़ेपन आदि को लेकर अपनी रिपोर्ट में मध्यप्रदेश की जो स्थिति रेखांकित कर रखी है वह मैक्सिमम प्रोग्रेस के मोदी के दावे से कतई मेल नहीं खाती। मिनिमम प्रोग्रेस का कमलनाथ का तंज भी मुफीद नहीं बैठता है। विकास तो हुआ है। किसी विकासशील राज्य में विकास तो होता ही है, लेकिन उसकी रफ्तार सरकार की मंशा और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है। 
चुनावी दावे और जुमलेबाजी अपनी जगह। मध्यप्रदेश में डेरा जमाए बैठे भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा के पास भी विज्ञापन में दिखाई जा रही उस चमचमाती सड़क को लेकर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब नहीं हैं, जिसको लेकर कांग्रेस ने आपत्ति दर्ज करा रखी है। यह सड़क किस जिले में है या मध्यप्रदेश से गुजरने वाला कौन सा राष्ट्रीय या राजमार्ग है? सवाल सुनते ही मैक्सिमम बोलने वाले प्रवक्ताजी भी मिनिमम वाइस के साथ इधर-उधर हो जाते हैं।  


Friday, November 16, 2018

कमलनाथ की पाती और संस्कारी कांग्रेस!



विधानसभा चुनाव की तकरार चरम पर आने के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की अपने प्रत्याशियों और पार्टीजनों को लिखी गई एक पाती सार्वजनिक हुई है। पाती क्या है, चुनाव प्रचार की कमलनाथ द्वारा तैयार आचार संहिता है। यह आचार संहिता उस दौर में सामने आई जब खुद कमलनाथ जाति और धर्म विशेष को लेकर बंद कमरे में हुई अपनी बातचीत के वायरल होने से मुश्किल में आ गए हैं। वे कांग्रेसियों से उस सनातनी महाभारतकालीन तरीकों से चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे हैं, जिनका प्रयोग कई चुनाव पहले ही बंद हो चुका है।
 कमलनाथ ने अपनी चिट्ठी के जरिए उस स्वच्छ और पवित्र राजनीति को आत्मसात करने की अपील की है, जो आज के दौर में विलुप्त हो चुकी है। नाथ ने कहा है कि कांग्रेस में घृणा फैलाने और दूसरों को अपमानित करने की जगह नहीं है। उन्होंने पार्टीजनों से चुनाव के दौरान छह बिंदुओं पर सतर्कता बरतने को कहा है। ये बिंदु हैं-
  •         कोई भी कांग्रेस नेता धर्म और जाति से संबंधित किसी तरह की बातचीत,भाषण या मीडिया से चर्चा नहीं करेगा। विशेषकर जो धार्मिक, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील विषय सर्वोच्च
    न्यायालय में लंबित हैं, उन पर किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए।
  •      ज्यों-ज्यों चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है  कांग्रेस का प्रमुख प्रतिद्वंदी दल भाजपा अपनी हार  सुनिश्चित जानकर तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है, उनसे  सावधान रहें।
  •            किसी भी प्रतिद्वंदी पार्टी के नेताओं पर अनर्गल और असंसदीय या अपमानजनक भाषा में  टिप्पणी नहीं करें।
  •         बिना प्रमाण के कोई भी नेता किसी प्रतिद्वंदी  पार्टी पर आरोप नहीं लगाए।
  •         भाजपा चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के  हथकंडे अपना सकती है। कांग्रेस के सभी नेता और कार्यकर्ता जनता के बीच रह कर समाज   को बांटने वाली ताकतों द्वारा फैलाए जाने वाले भ्रम और अफवाहों से मुकाबला करने के लिए तैयार रहें।
  •        यदि किसी तरह के संविधान विरोधी हथकंडे,  दूसरे दलों  द्वारा चुनाव में उपयोग करते देखें   तो तत्काल जिले और प्रदेश के चुनाव अधिकारियों के संज्ञान में लाएं। कांग्रेसजन ऐसी कोई भी गतिविधि न करें जिससे आम जनता या लोगों को असुविधा हो।
कमलनाथ द्वारा दीपावली के मौके पर भेजी गई यह चिट्ठी आज उजागर हुई है। यह खत तब सामने आया है जब एक धर्म विशेष के लोगों के साथ कमराबंद बैठक में कमलनाथ द्वारा कही गई बातों का वीडियो चुनाव आयोग के दरवाजे पर शिकायत के साथ पहुंच चुका है। हालांकि नाथ कैंप का दावा है कि उन्होंने कोई अनर्गल बात नहीं कही थी, वो तो सिर्फ समझाइश दे रहे थे। ‘दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है’ वाली स्टाइल में कमलनाथ की कांग्रेसियों से संस्कारी चुनाव लड़ने की यह अपील आरएसएस को लेकर उसके वचनपत्र में कही गई घोषणा को भाजपा द्वारा मनचाहा रुप देकर विवादित करने का भी नतीजा हो सकता है। बहरहाल जब चुनाव में दोनों दलों के बड़े नेता मंच पर बाहें चढ़ा कर एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का कोई मौका नहीं चूकते तब कमलनाथ की कांग्रेस संस्कारवान बन कर 2018 की जंग जीतने उतरेगी!
कमलनाथ की इस पाती के बाद तो उनके ‘चालीस सवाल’ भी बेमानी साबित हो सकते हैं, जिनमें से कुछ तो पुख्ता प्रमाण और जांच रिपोर्ट के बिना ही हुए हैं। शिवराज को घेरने वाली कांग्रेस की व्यापमं से लेकर ई-टेंडरिंग जैसे घोटालों को जनता के बीच उछालने की तैयारी भी बिना प्रमाण प्रतिद्वंदी पर आरोप नहीं लगाने की लक्ष्मणरेखा से बंध जाएगी। जब चुनाव में गाय, गंगाजल और राम मंदिर जैसे मुद्दे उछल रहे हों तब किसी धार्मिक मामले पर नहीं बोलने का प्रतिबंध कायम रख पाना क्या कमलनाथ और कांग्रेस के लिए संभव होगा। भाजपा और शिवराज तो कांग्रेस की हर गलती या बयान का भरपूर चुनावी फायदा लेने के लिए उतारू बैठे ही हैं। शिवराज के निशाने पर रोज कांग्रेस के बयान ही होते हैं। फिर चाहे वो कमलनाथ का महिलाओं को सजावट के फूल बताने वाला बयान हो या धर्म विशेष के लोगों द्वारा कांग्रेस को वोट देने की बात।
कमलनाथ ने उम्मीद जताई है कि उनके नेता और कार्यकर्ता पार्टी के इन निर्देशों का पूरी तरह पालन करेंगे। यानी संस्कारी ढ़ंग से चुनाव लड़ेंगे। कमलनाथ को ध्यान रखना चाहिए कि भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहने के दौरान प्रभात झा भी कुछ इसीतरह संस्कारी हुए थे। उन्होंने 40 बिंदुओं का शुचिता फार्मूला दिया था, बाद में आरोप लगे कि खुद अध्यक्ष ने ही शुचिता संस्कार नहीं माने।


Thursday, November 15, 2018

भाजपा: दिग्गजों के पट्ठे और पद-प्रतिष्ठा वाले ही बागी


आम कार्यकर्ता माने, खास बने खटाई का सबब



भाजपा से नाराज जबलपुर उत्तर के निर्दलीय उम्मीदवार धीरज पटैरिया की बगावत समझ में आती है। भाजपा की युवा इकाई के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके धीरज पार्टी के घनघोर समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं। वे दो चुनाव से टिकट की उम्मीद लगाए चुपचाप बैठे थे, इस बार भी उपेक्षा हुई तो ‘पोखरण’ होना ही था और हुआ भी। लेकिन, 76 साल की पकी उम्र वाले रामकृष्ण कुसमरिया को क्या कहें? जो 46 साल से जनसंघ और भाजपा के विभिन्न पदों पर सुशोभित रहे। मार्गदर्शक मंडल वाली उमर में बगावत कर कांग्रेस उम्मीदवार बने सरताज सिंह हों, समीक्षा गुप्ता या फिर नरेंद्र सिंह कुशवाह। बागियों की फेहरिस्त में शामिल ज्यादातर नेता वो हैं, जिन्हें पार्टी ने जमकर उपकृत किया है। कुछ तो उन नेताओं के खासमखास हैं, जिन पर महत्वपूर्ण चुनावी जिम्मेदारी है। ऐसे में भाजपाइयों को पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री अरविंद मेनन याद आ रहे हैं, जो पद-प्रतिष्ठा के लाभ एवं हानि का झुनझुना दिखा कर पिछले चुनाव में बागियों को बैठाते थे। ‘मेनन से जो माना वो मीर, जो न माना वो फकीर’ तक के किस्से उस दौर में चलते थे।
दमोह से बागी रामकृष्ण कुसमरिया ‘बाबाजी’ को मनाने लगातार दो दिन तक हेलीकॉप्टर से दमोह के चक्कर काटने वाले पोखरण फ्रेम राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा ग्वालियर की अपनी समर्थक समीक्षा गुप्ता को क्यों नहीं बैठा पाए? प्रभात का ‘ओज’ न तो बाबाजी को प्रभावित कर पाया और न ही समीक्षा ही इसकी ‘समीक्षा’ कर पार्टीहित में निर्णय ले सकीं। भिंड के बागी विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह केंद्रीय मंत्री और प्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर के दरबारी कहे जाते हैं। विधायक राजकुमार मेव हों या पूर्व मंत्री के.एल. अग्रवाल अथवा कोई और बागी। सभी किसी न किसी नेता से सीधे जुड़े हुए हैं। बड़े नेताओं की सरपरस्ती में ही इन्हें पार्टी मे पद और सत्ता का रसूख हासिल हुआ था।
कुसमरिया का पार्टी के लिए योगदान और पार्टी की कुसमरिया को देन देखें। बाबाजी दमोह से लेकर खजुराहो तक से सांसद रहे और क्षेत्र बदल कर चार बार विधायक बने। मंत्री पद पर भी आसीन हुए। पिछला विधानसभा चुनाव बुरी तरह हारे। टिकट बांटने वाली कमेटी के कई बार सदस्य रहे। खुद दूसरे क्षेत्र के टिकट के दावेदार बने और पार्टी के सर्वे में फेल हुए तो दमोह और पथरिया दो-दो विधानसभा क्षेत्रों से निर्दलीय पर्चा भर कर खम ठोक दिया। बागी हुए कुसमरिया भाजपा के उन चुनिंदा 40 स्टार प्रचारकों की सूची में विराजमान हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ इस लिस्ट में जगह पाना किसी भी नेता के लिए गौरव की बात होती है।
होशंगाबाद में कांग्रेस के उम्मीदवार बने सरताज सिंह का इतिहास खंगालें, जिनका समूचा राजनीतिक जीवन ही कांग्रेस से लड़ते हुए बीता। साल 1970 में जनसंघ के जिलाध्यक्ष से लेकर नगर पालिका अध्यक्ष, पांच बार सांसद, दो बार विधायक, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश सरकार में मंत्री जैसे पद सरताज के ताज में सजते रहे। पंजाबी होने के बावजूद भाजपा और संघ की जमीनी जमावट में उन्हें हर बार नर्मदांचल में जीत हासिल होती रही। भाजपा में ऐसे कई बागी हैं, जिनका वजूद ही पार्टी या बड़े नेताओं से है। जिन्हें दूसरे नेताओं द्वारा खाली की गई जमीन या किसी नेता को खिसका कर वो ओहदा मिला था, जिसके दम पर वे आज पार्टी को आंख दिखा रहे हैं। क्या इस बगावत की जिम्मेदारी अकेले बागियों पर है या फिर उन्हें अब तक प्रश्रय देने वाले भी इसके भागीदार हैं? तात्कालिक नाराजगी में निर्दलीय पर्चा भरने वाले ललित पोरवाल जैसे कुछ नेता तो नाम वापसी के आखिरी दिन तक उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें भी मन्नू डागा, गणेशीलाल नायक और रवींद्र अवस्थी की तरह मुख्यमंत्री या किसी बड़े नेता का फोन आ जाए और वो वापसी कर लें। कुछ फोन से माने, कुछ अपने आप बैठ गए और जो खड़े रह गए, वो सब दिग्गजों की आंखों के तारे हैं।
बागी कांग्रेस में भी कम नहीं हैं। भाजपा जैसी समस्या वहां भी है, लेकिन कांग्रेस और भाजपा के चरित्र में खासा अंतर है। भाजपा खुद को अनुशासित कार्यकर्ताओं की फौज बताती है तो कांग्रेस क्षत्रपों और पार्टी से ज्यादा अपने दम पर नेतागिरी करने वालों का दल है, फिर भी वहां भाजपा से तेज कार्रवाई हो रही बागियों पर। 






Wednesday, November 14, 2018

माफ करो महाराज.... गुस्सा आता है

रेडियो के कान उमेठिये या फिर रिमोट पर अंगुली फिराइये...आवाज सुनाई देगी- 'माफ करो महाराज’... 'गुस्सा आता है’। यह गुस्सा इस तरह बीते 5 साल में कभी नहीं आया! पिछले 10 साल में भी नहीं। और तो और 15 साल बाद अब जाकर फूटा है, चुनाव की रणभेरी बजने के बाद। आगामी 28 नवंबर को मतदान होते ही रेडियो, समाचार चैनल्स के साथ ही गली-मोहल्लों में चिल्ल-पौं मचाता यह गुस्सा वैसे ही गायब हो जाएगा, जैसे सभी 'सियासी महाराज’ महलों में समा जाएंगे।

सवाल यह है कि ये गुस्सा चुनाव में ही क्यों आता है? महाराज से माफी का तीखा स्वर भी अभी ही क्यों गूंज रहा है?  वो भी आगे-पीछे। क्या आज भी मतदाता इतने अशिक्षित हैं, अनभिज्ञ हैं कि उन्हें बताने पर ही पता चलता है कि उनके लिए कोई काम हुआ है या नहीं! क्यों विकसित के बाद प्रचार में समृद्ध होते मध्यप्रदेश के मंदसौर बस अड्डे पर चमचमाती बस के सामने खड़ा आदमी पूछ रहा है कि उसे वॉशिंगटन से अच्छी सड़क वाले मध्यप्रदेश में जाना है? क्यों महाराज कभी एक परिवार की सेवा में व्यस्त थे! चांदी के बर्तन में भोजन कर रहे थे तब केंद्र सरकार से पैसा लाने शिवराज दिल्ली जा रहे थे? विज्ञापन को देख सवाल कौंधता है- इस घटनाक्रम के समय की यूपीए सरकार तो कांग्रेस की ही थी, फिर क्यों पैसा दे रही थी शिवराज को?  चंद सेकंड के चुनावी जिंगल और विज्ञापन ऐसे अनगिनत सवाल वैसे ही छोड़ रहे हैं, जैसे कोई ईवीएम वोटों का हिसाब खोलती है, तब लोग आश्चर्यमिश्रित गुस्सा करते हैं कि इतने वोट जीतने वाले को कैसे मिल गए! लोग इस बात पर भी विस्मित नहीं हैं कि ‘विज्ञापन वाली सरकार’ के खिलाफ उपजा यह गुस्सा विज्ञापन में ही क्यों झलक रहा है।  

 गुस्सा खराब सड़क पर आया है तो अभी ही क्यों आया?  सड़कें तो कई साल से खस्ताहाल हैं। राजधानी का बदहाल आदर्श मार्ग जेके रोड हो अथवा नालियों की तरह सुबह-शाम जाम होतीं कोलार की सड़कें। इनको लेकर नेताओं को इससे पहले गुस्सा नहीं आया। क्यों किसी खराब सड़क पर नेताओं ने धूनी नहीं रमाई? भोपाल के नाले में बह कर हर साल जान गंवाते बच्चों और युवाओं को लेकर नाराजगी नहीं भड़की! गुस्सा बेरोजगारी पर आया है तो रोजगार की गारंटी 15 क्या 25 साल से किसी ने नहीं दी। छोटी बच्चियों पर पाशविक अत्याचार हो या नारी असुरक्षा, गुस्सा फिर भी सही वक्त पर नहीं आया। इसी गुस्से की देन है कांग्रेस की पंच लाइन- 'वक्त है बदलाव का’। गुस्से को रोकने का जतन है- 'सरकार सरकार में फर्क होता है’।
 कलाकारों की कलाकारी का यह गुस्सा उस गुस्से जैसा नहीं है, जो प्रचार के लिए उतरे उम्मीदवारों और उनके साथियों को झेलना पड़ रहा है। तेरह साल के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी साधना सिंह को उनके ही निर्वाचन क्षेत्र में महिलाओं के सवालों के जवाब नहीं सूझ रहे हैं। मंत्री दीपक जोशी के पास भी मतदाताओं के प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं। पंद्रह साल की सरकार और कई बार के विधायकों पर जनता खुद से जुड़े हर उस मुद्दे पर खफा है, जिसकी उम्मीद में उसने वोट दिए थे। आम आदमी का यह गुस्सा एकांगी नहीं है। जनप्रतिनिधि किसी भी दल का हो, उसे गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। लोगों का गुस्सा उस विज्ञापन जैसा भी नहीं, जिसमें एक खास पार्टी को वोट देने पर पिता अपने बेटे की पिटाई कर देता है। जनता जानती है कि 'विकास की नई पारी है अब समृद्धि की बारी है.... 'भविष्य का संदेश समृद्ध मध्यप्रदेश’... 'विजन 2023’ जैसे जुमले और टीवी स्क्रीन पर घर बैठी महिला का तमतमाया चेहरा सिर्फ 28 नवंबर तक ही दिखेगा। इसके बाद लोगों को अपना गुस्सा जज्ब करना ही पड़ेगा। इसकी उन्हें आदत भी है। उसे तो इंतजार है वक्त बदलने का और उसके जीवन को एक्सप्रेसवे की तरह बाधामुक्त एवं आसान बनाने वाली सरकार का। 


Tuesday, November 13, 2018

रावत में शेषन का अक्स और भयाक्रांत ब्यूरोक्रेसी !

मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत 1990-96 के दौर के टी. एन. शेषन तो नहीं ही हैं, लेकिन वो उसी कुर्सी पर आसीन हैं जिस पर बैठ कर कभी शेषन ने चुनाव आयोग का ऐसा चाबुक चलाया था कि आज भी उसकी याद कर राजनीतिक दल सिहर जाते हैं। रावत में शेषन का अक्स देखने की
वजह है मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर सरकार और सत्ताधारी दल में व्याप्त भय का वातावरण। यह भय नहीं तो और क्या है कि कुछ पॉवरफुल आला अफसर चुनाव के बीच छुट्टी लेकर घर बैठ गए तो नेताओं से दूर-दराज की रिश्तेदारी वालों का भी तबादला कर दिया गया। आयोग से डर इतना है कि विपक्षी पार्टियों की शिकायतों के जवाब में सत्ताधारी दल ने बाकायदा शिकवा-शिकायत सेल खोल रखा है।
इस बार के चुनाव आम विधानसभा के चुनाव नहीं हुए, बल्कि शिकायती उत्सव जैसे हो गए हैं। आयोग ने चुनाव को पाक-साफ बनाने के जितने जतन किए, शिकायतों की भीड़ उतनी ही बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग की फुल बैंच जब पिछली बार मध्यप्रदेश आई थी उस समय भी शिकवा-शिकायतें थीं और अब जब आई है तब भी ये कम नहीं हैं। वोटर लिस्ट की गड़बड़ी से शुरू हुआ मध्यप्रदेश का चुनावी महाभारत अब एक-दूसरे को फंसाने के चक्रव्यूह में तब्दील होता जा रहा है। राजनीतिक दल मतदाताओं के बीच जितना चुनाव लड़ रहे हैं उससे कुछ कम लड़ाई आयोग के दरवाजे पर भी नहीं है। चुनाव गरमाने के बाद कांग्रेस के जे.पी. धनोपिया ही अकेले तीन दर्जन से ज्यादा शिकायतें दे चुके हैं। भाजपा के लीगल सेल ने भी भोपाल से लेकर सभी जिलों में कोई कसर नहीं छोड़ी।
आधा दर्जन से अधिक बड़े अफसर केवल शिकायतों के दम पर ही खिसकाए गए हैं। कोई अफसर किसी दूसरे जिले में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी का रिश्तेदार था तो किसी पर सत्ताधारी दल का काम करने के आरोप लगे। चुनावी पवित्रता के आयोग के इस यज्ञ में जनसंपर्क विभाग के अफसर भी अछूते नहीं रहे। चुनाव तक के लिए इस विभाग के भी कुछ अफसरों का ठौर बदलना पड़ा है। कांग्रेस के निशाने पर अब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गृह जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक हैं। इनकी भी शिकायत की गई है।
चुनाव आयोग भी हर शिकायत का स्वागत कर रहा है। लोग बिना बाधा अपनी बात पहुंचा सकें इसलिए नए साधन और तरीके भी मुहैया कराए गए हैं। सूचना-प्रौद्य़ोगिकी के इस युग में आयोग का सी-विजिल एप है, जिससे कोई भी कभी भी कहीं से भी शिकायत भेज सकता है। हाल ही में लांच किए गए इस एप पर अब तक 1428 शिकायतें हो चुकी हैं। कॉल सेंटर और परंपरागत आवेदन के माध्यम से अब तक 8074 शिकायत हुई हैं। आयोग ने भी इनका जल्दी निराकरण करने के साथ उसकी जानकारी देने के लिए माड्यूल बनाया है।
चुनाव और शिकायत का जो नाता है उसके महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने पिछले भोपाल दौरे में पार्टी नेताओं को इसका गुरुमंत्र दिया था। तत्काल शिकायत करो, शिकायत और निराकरण की प्रतियां अन्य जिलों के कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारी को भेजो और अगली शिकायत की तैयारी करो। राजनीतिक दल अपनी जगह, आयोग से ब्यूरोक्रेसी के भयाक्रांत होने की एक वजह मुख्य चुनाव आयुक्त का मध्यप्रदेश कैडर से होना भी है। वे कई नौकरशाहों को जानते-पहचानते हैं तो यहां के सियासी और प्रशासनिक समीकरणों से भी बखूबी वाकिफ हैं।


Monday, November 12, 2018

एमपी की चौथी जंग का नतीजा तो देख जाते ''अनंत गारू''



अनंत कुमार नहीं रहे। मध्यप्रदेश भाजपा के कई बड़े  नेताओं पर यह खबर किसी स्काईलैब केजैसी गिरी। कर्नाटक के अनंत कुमार का मध्यप्रदेश से बड़ा ही गहरा नाता रहा है। कई मिथक तोडऩे वाले भाजपा के लगातार दो विधानसभा चुनाव अभियान के वे अहम किरदार रहे हैं। प्रदेश से जुड़ी कई यादें उनके पास थीं तो 'अनंत-काल ' के कई संस्मरण प्रदेश के नेता और पत्रकारों के पास भी हैं। 
एक हंसता, मुस्कुराता और दमकता चेहरा। कन्नड़ शैली की हिंदी में बतियाते अनंत कुमार मुश्किल पलों में भी वैसे ही बिंदास रहते थे, जैसे वे दिखते थे। दो माह पहले ही भोपाल के दीनदयाल परिसर में प्रेस कान्फ्रेंस के बाद वीआईपी कक्ष के दरवाजे पर खड़े होकर वे अनौपचारिक चर्चा कर रहे थे। कुछ कमजोर दिख रहे हैं, सवाल पर हंसते हुए बोलेे- कर्नाटक चुनाव में ज्यादा घूम लिया ना, इसलिए दुबला हो गया हूं। कुछ देर पहले ही प्रेस वार्ता में प्रदेश में किसानों की आत्महत्या को लेकर पूछे गए तीखे सवालों से घायल अनंत का प्रश्न पूछने वाले पत्रकारों से शिकायती अंदाज था- 'इतने सालों बाद भी आपके सवाल नहीं बदले, दोस्त हो हमारे'। 
अनंत वो नुस्खा थे, जिसका प्रयोग कर पार्टी ने रतलाम की प्रदेश कार्यकारिणी बैठक के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के भांजे और कद्दावर मंत्री अनूप मिश्रा का इस्तीफा लिया था। मिश्रा के पुत्र पर एक हत्या के मामले में आरोप लगे थे और उनका कोई कसूर न होने के बावजूद एक समाज के वोटबैंक की नाराजगी दूर करने के लिए पार्टी उन्हें मंत्री पद से हटाना चाहती थी। अनंत कुमार की हिंदी ने उन्हें प्रदेश में कई बार मुश्किलों में भी डाला है। एक बैठक में उन्होंने कुछ मंत्रियों के लिए 'अय्याश' शब्द का प्रयोग कर दिया था। बवाल मचा तो अपने हिंदी के कमजोर ज्ञान का हवाला देते हुए उन्होंने सफाई देने से भी संकोच नहीं किया था।  
अनंत कुमार का मध्यप्रदेश से नाता शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के साथ जुड़ा था। साल 2008 और 2013 के लगातार दो चुनाव उनके प्रदेश प्रभारी रहते भाजपा ने लड़े और जीते। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और प्रभारी अनंत कुमार की तिकड़ी तब मध्यप्रदेश भाजपा के चुनाव अभियान की धुरी होती थी। अनंत कुमार 2008 के चुनाव में 'मिस्टर बंटाढार' का विलोम शब्द हासिल करने के लिए कई दिन तक खुद शब्दकोश खंगालते रहते थे तो दूसरों से भी पूछते रहते थे। उनकी खोज 'कर्णधार' शब्द पर जाकर रुकी थी और अपने हर भाषण में वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए कर्णधार उपमा का प्रयोग करना पसंद करते थे।
 भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि शिवराज और तोमर की जोड़ी को इस बार भी अनंत कुमार का साथ मिलेगा, लेकिन उनका खराब स्वास्थ्य ही संभवत: वो वजह था जिसके कारण भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अनंत को प्रदेश की चुनावी जद्दोजहद से दूर रखा। किसे पता था कि अनंत अपने दोस्तों के प्रदेश में 'चौथी बार- फिर शिवराज' की जंग के परिणाम को देखने के लिए नहीं आ पाएंगे। ठीक उन अनिल माधव दवे की तरह जिनके साथ चुनावी दौर में वे देर रात तक भाजपा कार्यालय के वॉर रूम में डटे रहते थे। आज सुबह से उनका अपनी भाषा का वो आदरसूचक शब्द बार-बार दिमाग पर चढ़ रहा है, जिसका प्रयोग वो मिलने पर हमेशा संबोधन के लिए करते थे.....गारू.... यानी मालिक, स्वामी, बड़ा भाई।
                                                               ।।अनंत श्रद्धांजलि।।


अशोक, तुम्हारे हत्यारे हम हैं...

अशोक से खरीदा गया वो आखिरी पेन आज हाथ में है, लेकिन उससे कुछ लिखने का मन नहीं है। अशोक... जिसे कोई शोक न हो। यही सोच कर नामकरण किया होगा उसक...